‘गुरुजी’ पढ़ाना ‘छोड़िए’, ‘जाइए’ कुत्ता ‘पकड़िए’

 ‘गुरुजी’ पढ़ाना ‘छोड़िए’, ‘जाइए’ कुत्ता ‘पकड़िए’

बस्ती। जिले के हजारों गुरुजी के लिए खुष करने वाली खबर कहें या अपमानित होने वाली। अब उन्हें बच्चों को पढ़ाना नहीं पड़ेगा, बल्कि कुत्ता पकड़ना होगा। गुरुजी बच्चों को पढ़ाने के बजाए अब कुत्ता पकड़ेगें। यह हम नहीं बल्कि सरकार कह रही है। अगर नहीं पकड़े तो निलंबन तक की कार्रवाई हो सकती है। सवाल उठ रहा है, बच्चों को पढ़ाना जरुरी है, कि कुत्ता पकड़ना। सरकार की निगाह में तो पढ़ाना उतना जरुरी नहीं जितना कुत्ता पकड़ना जरुरी। आखिर सरकार गुरुजी लोगों को समझती क्या? जो काम सफाई कर्मी और नगर निकाय का हैं, सरकार उस काम को षिक्षकों से करवाना चाहती है। सवाल उठ रहा है, कि क्यों सरकार गुरुजी लोगों को हीनभावना से ग्रसित करना चाहती? जिन गुरुजी को समाज सबसे अधिक सम्मान देता है। सरकार उन्हीं से कुत्ता पकड़वा रही। गुरुजी कुत्ता पकड़ने लगेंगे तो समाज में उनकी क्या इज्जत रह जाएगी? ऐसे में क्या बच्चे गुरुजी का पैर छुकर आर्षीवाद लेगें? समाज से सबसे अधिक गुरुजी लोगों की बदनामी होगी, परिवार के सामने अपमानित होना पड़ेगा, पत्नियां कभी नहीं चाहेगी कि समाज उनके पति को कुत्ता पकड़ने वाला कहे। कोई भी पत्नी यह कभी स्वीकार नहीं करेगी कि 80-90 हजार कमाने वाला उसका पति कुत्ता पकड़े। गुरुजी लोगों की इज्जत ससुराल में भी कम हो जाएगी। ससुराल वाले अपने गुरुजी दामाद का आवभगत और इज्जत पहले जैसा नहीं करेगें। ऐसा लगता है, कि मानो सरकार की मंषा षिक्षकों को समाज, स्कूली बच्चे, परिवार और ससुराल हर जगह अपमानित करवाने की है। वैसे भी सरकार पहले से ही गुरुजी लोगों से पठन-पाठन छोड़कर अन्य कार्य करवा रही है। एक कुत्ता ही पकड़ना रह गया था, उसे भी करवाने जा रही है। कुत्ता पकड़ने का काम मदरसे वाले भी करेगें। इसके लिए खंड षिक्षा अधिकारियों की ओर से बाकायदा सभी प्रधानाचार्यो, प्रभारी प्रधानाचार्यो, प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक, मान्यता प्राप्त इंटरकालेज एवं मदरसे को एक आदेष जारी किया गया हैं, जिसमें यह कहा गया है, कि उच्चतम न्यायालय में योजित सु-मोटो रिट पिटीषन सिविल इन री सिटी हाउंड बाई स्टे किड्स पे प्राइस के तहत जारी सात नवंबर 25 के तहत कार्रवाई करने के निर्देष दिए गए है। जिसमें सभी को यह निर्देषित किया जाता है, कि विधालय परिसर की स्वच्छता और आवारा कुत्तों के प्रवेष को रोकने के लिए अपने-अपने विधालय से एक अध्यापक को नोडल अधिकारी नामित करें, और उनका संपर्क नंबर आवागमन के मुख्य स्थानों पर प्रदर्षित करें। अब जरा अंदाजा लगाइए कि किसी गुरुजी का संपर्क नबर और नाम हर चौराहे, कस्बा पर यह लिखा मिले कि यही कुत्ता पकड़ने वाले गुरुजी हैं, तो आप समझ सकते हैं, कि वह गुरुजी समाज में कैसे सिर उठाकर चलेगें। यानि गुरुजी लोगों को अब विधालय के गेट पर कुर्सी लगाकर और डंडा लेकर बैठना होगा, ताकि अगर कोई कुत्ता विधालय परिसर में प्रवेष करें तो उसे वह पकड़ सकें। अगर कहीं कुत्ते ने पलटवार कर गुरुजी पर हमला कर दिया तो गुरुजी कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहेगें। कहने का मतलब सरकार प्रत्येक विधालय के एक षिक्षक को हर माह इस लिए 80-90 हजार वेतन देगी, ताकि वह गेट पर चौकीदार की तरह रखवाली करें, और कुत्तों के प्रवेष को रोकें। सरकार ने कुत्ता पकड़ने के लिए गुरुजी लोगों को प्रषिक्षण ही नहीं दिया, और न कोई कैटल केैचर ही उपलब्ध कराया, अगर कोई पागल और आवारा कुत्ता काट ले तो उसके उपचार की भी कोई व्यवस्था नहीं की गई। वैसे भी साइकिल से चलने वाले गुरुजी के पीछे-पीछे कुत्ता भों-भों करता रहता है। सरकार को यह सोचना चाहिए कि नगर क्षेत्र, सांउघाट, सदर ब्लॉक और बहादुरपुर ब्लॉक का आंषिक क्षेत्र के 99 फीसद स्कूलों में षिक्षक के रुप में सैकड़ों महिलाएं ही कार्यरत् है। क्या महिलाएं भी कुत्ता पकड़ने और गेट पर रखवाली का काम करेंगी? क्या वह कर पाएगी? कुछ ऐसे विधालय भी हैं, जहां पर एक या दो गुरुजी तैनात है। न जाने कितने ऐसे मदरसे और विधालय हैं, जहां पर गेट ही नहीं है। इन सबको को अगर छोड़ भी दिया जाए तो बीएसए स्कूल पूरी तरह खुला हुआ है, और जहां पर हर वक्त एक दर्जन से अधिक कुत्तों का जमावड़ा देखा जा सकता है। सबसे अधिक गंदगी यही पर ही मिलती है। षिक्षक संघ के जिला मंत्री बाल कृष्ण ओझा कहते हैं, इनको लेकर जिले भर षिक्षक विरोध जता रहे हैं, और कह रहे हैं, जब षिक्षक कुत्ता पकड़ने जाएगें तो बच्चों को पढ़ाएगा कोैन? और जब बच्चे पढ़ेगें नहीं तो डीएम और एसपी कैसे बनेगें? सरकार को इस अव्यवहारिक आदेष को त्वरित वापस लेना चाहिए, ताकि षिक्षक समाज में इज्जत के साथ सिर उठा कर चल सके।

‘लेखपाल’ अब ‘फीता’ नहीं ‘मशीन’ लेकर ‘जाएगें’!

बस्ती। योगीजी ने एक ऐसा एतिहासिक निर्णय लिया है, जिसका इंतजार कई दषकों से काष्तकार और भू स्वामी कर रहे थे। इस एतिहासिक निर्णय से लेखपालों की मनमानी और उनके द्वारा जमीनों की पैमाईष में की जा रही धांधली तो समाप्त होगी ही, अलबत्ता जिस पैमाईष के लिए काष्तकार तहसीलों और लेखपालों का महीनों चक्कर लगाते थे, अब पांच मिनट से भी कम समय लगेगा। रोवर नामक मषीन से पैमाईष होने से लेखपाल किसी के पक्ष में कम और अधिक जमीन की पैमाईष नहीं कर पाएगें, एक इंच जमीन ईधर का उधर लेखपाल नहीं कर पाएगें। कहने का मतलब योगीजी ने लेखपालों की एक तरह से अवैध कमाई को तो बंद किया ही साथ उन दंबग काष्तकारों की दंगई को भी समाप्त किया, जो लेखपालों को अपने फेवर में करके दूसरे की जमीन हड़प लेते थे। इस नई तकनीक से कानूगो और लेखपालों का खेल समाप्त होगा। जीपीएस आधारित रोवर मषीन से प्रदेष की सभी तहसीलों में पैमाईष कराई जाएगी। इसके लिए हर तहसील में विषेष टीम का गठन होगा। सभी तहसीलों में इस प्रणाली के उपयोग के लिए लगभग 350 रोवर मषीन खरीदे जाएगें। रोवर सेटेलाइट के जरिए सर्वे आफ इंडिया के डाटा के माध्यम से किसी भी भूमि की पैमाईष करने के साथ सटीक मानचित्र भी तैयार होगा। रोवर से पैमाईष करने के लिए गांव सीमा स्तम्भ की भी आवष्यकता नहीं पड़ेगी। रोवर के जरिए बिना फिक्स प्वांइट के किसी भी जमीन की पैमाईष की जा सकेगी। जमीन की पैमाईष पांच सेमी तक की दूरी से करना संभव होगा। पायलेट प्रोजेक्ट के साथ इसका कई गावों में सफल परीक्षण भी हो चुका है। हर तहसील में एक एनटी, दो कानूनगो व दो लेखपाल की टीम बनेगी। राजस्व परिषद रोवर के उपयोग के लिए एसओपी बना रहा है। इसके जरिए किसी भूमि का क्षेत्रफल निकालने में त्रुटि की गुंजाईष भी नहीं रहेगी। एक रोवर मषीन की लागत छह से सात लाख पड़ रही है। रोवर के जरिए पैमाईष में पांच से 10 मिनट का समय लगेगा। इसके उपयोग से भूमि पैमाईष के मामलों का तेजी से निस्तारण भी होगा। कहा जाता हैं, कि राजस्व के विवादों में भूमि पैमाईष के मामलों में लेखपाल और कानूनगो की भूमिका पर सवाल उठते रहें है। वैसे इस योजना पर पिछले कई सालों से काम चल रहा था, लेकिन इसे अंतिम रुप नहीं दिया जा रहा था, योगीजी ने इस योजना को अंतिम रुप से देते रोवर मषीन खरीदने की हरी झंडी भी दे दी है। इस प्रणाली की उपयोगिता का अंदाजा उस समय किसी काष्तकार को लगेगा, जब उसे यह महसूस होगा कि जो पैमाईष वह महीनों में नहीं करवा पाया, वह पांच-दस मिनट में हो गया। यही वह पैमाईष हैं, जब नहीं होता था, तो मजबूरी में लेखपाल को उनकी मनचाही डिमांड को पूरा करना पड़ता था, उसके बाद भी काष्तकार को यह हमेषा षंका बनी रहती थी, कि कहीं लेखपाल विरोधियों से मिलकर उसकी कीमती जमीन को इधर-उधर न कर दें। इधर-उधर करने से ही अनेक मुकदमें लंबित है। अगर प्रभाव में आकर किसी लेखपाल ने एक इंच भी जमीन गलत पैमाईष कर दिया तो उसे ठीक कराने के लिए नाकों चना चबाना पड़ता था। वैसे भी लेखपाल और कानूनगो का झुकाव हमेषा उस लोगों की ओर रहा, जिन्होंने सबसे अधिक चढ़ावा चढ़ाया, और अधिक चढ़ावा तो गरीब काष्तकार चढ़ा नहीं सकता, इस लिए नुकसान भी सबसे अधिक गरीब काष्तकार ही लेखपाल और कानूनगो करते है। काष्तकार की हैसियत देखकर लेखपाल की फीता चलता है।   

हे, ‘भगवान’ अगले ‘जन्म’ में मोहे ‘शिक्षक’ न ‘बनाना’

बस्ती। अगर कोई षिक्षक यह भगवान से प्रार्थना करें, कि उसेे अगले जन्म में चपरासी बना देना लेकिन षिक्षक न बनाना। तो षिक्षकों का दर्द समझा जा सकता है। षिक्षकों ने इस षिक्षक को बच्चों को पढ़ाकर योग्य बनाना था, उसे बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था करना और वोटर्स को तलाषना पड़ रहा है। जो काम कोई नहीं कर सकता, उसे षिक्षकों को सौंप दिया जाता हैं, और मौका पड़ने पर षिक्षकों को रगड़ने से भी नहीं चूका जाता। इतना उत्पीड़न और प्रताड़ित किया जाता है, कि षिक्षक की मौत तक हो जाती है। प्रताड़ित करने वाले अधिकारियों का तो कुछ नहीं होता, लेकिन षिक्षकों का परिवार बर्बाद हो जाता। रात- दिन एक करके पढ़ाई इस लिए नही करता, कि एक दिन उसे कुत्ता भी पकड़ना पड़ सकता है। गुरुजी बच्चों को पोलियो की दवा पिलाने से लेकर जनगणना व मतगणना का कार्य करते, अब कुत्तों की गिनती भी करना इनके ही जिम्में हैं, आदेश को लेकर हो रही खूब चर्चाएं, वोटर बनाने से छुट्टी नहीं मिली और कुत्तों के गिनती में ड्यूटी लगा दिया। नियुक्ति हुई बच्चों को पढ़ाने की और बनाना पड़ रहा वोटर, जनगणना और मतगणना, सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होने और स्कूल मर्जर होने का यही कारण है।

गुरूजी को भी क्या-क्या करना पड़ रहा है। शायद कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा। जिसके लिए वह नियुक्त हुए उसे छोड़ अन्य कार्य करना पड़ रहा है। बच्चों को पोलियो की दवा पिलाने का कार्य कुछ हद तक ठीक था, लेकिन भला कुत्तों की गिनती करने का कोई उम्मीद भी नहीं कर सकता था। जो काम कोई करने को तैयार नहीं होता उसे शिक्षकों पर डाल दिया जाता है। विभागीय कार्य ही इतने है कि इन्हें उसी से ही फुर्सत नहीं मिल पाता है। स्कूल पहुंचने के बाद भी आटा, सब्जी, दाल और दूध के इंतजाम में जुट जाते हैं। बच्चों को ठीक से मीनू के अनुसार न खिलाएं तो मिश्राजी और बीईओ, बीएसए कार्रवाई की तलवार लटकाने लगते हैं। इनके और प्रधान के लिए भी इसी में से कुछ बखरे का इंताजम करना पड़ता है। नहीं तो यह भी स्वाद चखने पहुंच जाते हैं। डीबीटी, मीटिंग आदि से जब तक फुर्सत मिलता है, छुट्टी का समय हो जाता है। इनके पास अन्य विभाग के कार्यों को करने का फुर्सत कहां, लेकिन आदेश है तो पालन करना ही पड़ेगा। इनकी ड्यूटी पोलियो मुक्त अभियान में बच्चों को ड्राप पिलाने में लग चुकी है। गांव की जनगणना और चुनाव में मतगणना भी यही करते हैं । कोरोना में भी इनकी ड्यूटी लगी। एसआईआर और त्रिस्तरीय चुनाव का कार्य पूरा भी नहीं कर पाए। नया आदेश आ गया कि प्रत्येक स्कूल में नोडल आधिकारी नामित किए जाएंगे। जिनका संपर्क नंबर आदि मुख्य प्रवेश द्वारा पर दर्ज किया जाएगा। यह आदेश उच्च न्यायालय में योजित एक पटीशन इन री सिटी हाउंड बाई स्टे किड्स पे प्राइस व अन्य में पारित किया गया है। जिसके क्रम में इनका अनुपालन बेसिक शिक्षा विभाग बस्ती द्वारा भी आदेश जारी कर कराया जा रहा है। सोचने वाली बात यह है कि शिक्षकों का कार्य कुत्तों की गिनती करने के लिए थोड़ी न हुआ है। वह तो बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल में नियुक्त लिया था। गली गली घूम कर कुत्तों की गणना की खबर चार लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई है। लोग खूब मजे भी ले रहे हैं। शिक्षक भी सोंच में पड़े है कि क्या दिन आ गए हैं। न करें तो कार्रवाई और करें तो हंसी और मजाक का पात्र बने। लेकिन साहबों का आदेश भला कौन टाल पाएगा ।

अपनी ‘आदतों’ से ‘बाज’ नहीं आ ‘रहे’ं, ‘सिंकदरपुर’ के ‘चौकी इंचार्ज’!

बस्ती। चौकी इंचार्ज साहब लोग अपने घर की महिलाओं की तो खूब इज्जत करते, लेकिन न जाने क्यों अन्य महिलाओं की इज्जत नहीं करते? षायद ऐसे चौकी इंचार्ज साहब लोगों को यह नहीं मालूम कि घर की महिलाओं की इज्जत करना कोई नहीं देखता, लेकिन अगर अन्य महिलाओं को अपमानित करेगें तो उसे पूरा समाज देखेगा। वर्दी की छवि के साथ सरकार की भी छवि खराब होती है। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि आखिर क्यों पुलिस पर अपराधियों और बदमाषों को सम्मान देने और पीड़ित लोगों को अपमान करने का आरोप लगता है? यह षिकायत अधिकतर चौकी इंचार्ज से लेकर एसओ और सिपाहियों पर लगता है। अब यह भी सवाल उठ रहा है,


कि आखिर अधिकारी वर्ग के लोग कब तक छवि बनाते रहेगें? क्या छवि बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ अधिकारियों की ही हैं, एसओ और चौकी इंचार्ज लोगों की नहीं है?इसी तरह का एक मामला दो साल बाद सिंकदरपुर के चौकी इ्रचार्ज का सामने आया। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग ओबीसी मोर्चा के मण्डल उपाध्यक्ष एवं जिला प्रभारी राम सुमेर यादव ने पुलिस अधीक्षक को पत्र और मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, मण्डलायुक्त, डीआईजी को रजिस्टर्ड पत्र भेजकर परसुरामपुर थाने के सिकन्दरपुर चौकी इन्चार्ज के पद पर तैनात उमेश चन्द्र वर्मा के कारगुजारियों की प्रभावी जांच कराकर जनहित में स्थानान्तरण कराये जाने की मांग किया है। भेजे पत्र में राम सुमेर यादव ने कहा है कि उमेश चंद्र वर्मा चौकी इंचार्ज सिकन्दरपुर द्वारा विभिन्न प्रकार के अवैध कार्य कर पैसे की वसूली की जा रही है। जब थाना प्रभारी से उसकी शिकायत की गई तो उनके द्वारा कोई भी कार्रवाई नहीं किया गया। लगभग दो वर्ष पहले भी चौकी इंचार्ज उमेश चंद्र वर्मा जो कि इंचार्ज सिकंदरपुर बनाए गए थे उस समय भी इनके कार्यकाल में जुआ जैसे तमाम अवैध कार्य कर पैसे की वसूली की जाती थी। चौकी इंचार्ज उमेश चंद्र वर्मा शाम को शराब पीकर सबको उल्टी सीधी गाली देते हैं। कोई फरियादी अगर आ जाता है तो उसे भद्दी-भद्दी गालियां देकर अपमानित करते हैं। इसके पहले यह चौकी इंचार्ज रोडवेज थे तब भी अपने अधिकारी से लड़कर यह लाइन हाजिर हो गए थे, जिसकी जांच अभी तक चल रही है। इनका 15 दिन का वेतन भी काटा गया है। इनके द्वारा बार-बार फोन करके सिकंदरपुर तथा हैदराबाद की कई लड़कियों तथा औरतों को परेशान किया जाता है। पत्र में कहा गया है कि उनकी पोस्टिंग इसके पहले 2023 में जब यह चौकी इंचार्ज सिकंदरपुर रह चुके हैं, तो दोबारा यह चौकी प्रभारी कैसे हुए हैं? उस समय भी इनका शिकायत पर ही स्थानांतरण हुआ था। इनको तत्काल प्रभाव से चौकी सिकंदरपुर से हटाया जाए। चौकी इंचार्ज उमेश चंद्र वर्मा क्षेत्र मंेे पुलिस की छवि धूमिल कर रहे हैं और इससे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा भी धूमिल हो रही है। इनके व्यवहार से क्षेत्र की जनता काफी त्रस्त्र है। इनका स्थानान्तरण कराया जाय। 

‘धौरहवा’ के ‘सौरभ सिंह’ बने ‘गांव’ के ‘आईडिएल’

बस्ती। कौन कहता, गांव की मिटटी में पले पढ़े लोग आसमान को नहीं छू सकते। कहतें हैं कि मेहनत करने वालों की सफलता कदम चूमती हैं। जरूरत संसाधनों की नहीं दृढ़ ईच्छा शक्ति की होती है। अगर ऐसा नहीं होता तो बहादुरपुर ब्लाक धौरहरा गांव के सौरभ सिंह गांव वालों के रोल माडल नहीं बनते। इन्होंने अपने को इतना तैयार और मजबूत बनाया सफलता दूर होने न पाए। राष्ट्रीय स्तर की तीन तीन परीक्षाओं को पहली बार में उत्तीर्ण करना आसान नहीं होता, लेकिन इन्होंने अपने संघर्ष के बल पर सौरभ सिंह ने कर दिखाया। पहले ही प्रयास में भारतीय सेना का लेफ्टिनेंट बन गांव, क्षेत्र व देश के युवाओं में यह प्रेरणा जागृत किया है कि मेहनत करने वाले के लिए हर लक्ष्य आसान हैं। बस सपनों में जान होनी चाहिए। संघ लोक सेवा आयोग द्वारा वर्ष में दो बार सीडीएस (संयुक्त रक्षा सेवा) की परीक्षा होती है। देश स्तर के बच्चे इसमें सामिल होते हैं। काफी कठिन मेडिकल व परीक्षाएं होती हैं। गिनती के लोगों का चयन होता हैं। ऐसी परीक्षा को पास कर सौरभ सिंह ने जिले का मान बढ़ाया है। सौरभ को एक साथ तीन-तीन सफलता मिली है। सीडीएस के साथ दोबारा सीडीएस प्री परीक्षा और उड़ान अधिकारी की भी परीक्षा पास कर ली है। उनके इस सफलता पर गांव क्षेत्र के लोगों में खुशी है। लोगों ने इन्हें फोन व इंटरनेट मीडिया के माध्यम से बधाई दी है।


सौरभ ने माध्यमिक की पढ़ाई एयर फोर्स बाल भारती स्कूल दिल्ली से किया है। स्नातक भी दिल्ली विश्वविद्यालय से पूरा किया। एक वर्ष उन्होंने अलग से सीडीएस की तैयारी की। पिता बालगोविंद सिंह ने बताया कि सौरभ को बचपन से ही सेना में अधिकारी बनने की ललक थी। अपने सपने को रंग देने के लिए वह किताबों से जुड़ा रहता था। पहली बार में देश स्तर की संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा पास कर लेफ्टिनेंट के रुप में चयनित हुआ। दोबारा भी सीडीएस प्री निकाल लिया है। उड़ान अधिकारी के लिखित व मौखिक परीक्षा को पास कर लिया है। मेडिकल होना ही बाकी है। सौरभ ने बताया कि वह सीडीएस परीक्षा के माध्यम से अधिकारी प्रशिक्षण अकादमी में जाना चाहते थे। इसके लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी। सौरभ की सफलता से क्षेत्र के युवाओं लिए प्रेरणा है। सौरभ की सफलता पर पूर्व कैबिनेट मंत्री राजकिशोर सिंह, सदर विधायक महेंद्रनाथ यादव, पूर्व विधायक महादेवा रवि सोनकर व परिवार के गौरव सिंह, अजीत सिंह, अजय सिंह, अखिलेश सिंह, सोनू सिंह, अनिल सिंह, राजमोहन सिंह अनिल यादव, परमानंद सिंह, लालजी यादव, आलोक सिंह, प्रबंधक कुंदन सिंह, रतन सिंह, सुधीर सिंह व आशुतोष सिंह, प्रधान नीरज सिंह सहित अन्य लोगों ने बधाई दिया।

‘सरकार’ और ‘अधिकारियों’ के बीच ‘समन्यव’ रहना ‘चाहिए’ःयशकांत सिंह

बस्ती। जिलाधिकारी कार्यालय बस्ती में भारतीय जनता पार्टी बस्ती का एक प्रतिनिधिमंडल डीएम कृतिका ज्योत्सना से शिष्टाचार भेंट कर जिले से जुड़े विभिन्न समसामयिक, जनहित एवं कानून-व्यवस्था से संबंधित विषयों पर विस्तार से चर्चा की। प्रतिनिधिमंडल ने आमजन से जुड़ी समस्याओं को प्रमुखता से उठाते हुए उनके त्वरित, प्रभावी एवं ठोस निस्तारण हेतु आवश्यक प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित करने का आग्रह किया। बैठक के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने शहर एवं जिले में शांति,


सौहार्द और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। विशेष रूप से सोशल मीडिया के माध्यम से जानबूझकर भ्रामक सूचनाएं प्रसारित कर शहर और जिले का अमन-चैन बिगाड़ने वाले असामाजिक एवं अराजक तत्वों के विरुद्ध सख्त और प्रभावी कार्रवाई करने की मांग की गई, जिससे समाज में भयमुक्त वातावरण बना रहे और आम नागरिक स्वयं को सुरक्षित महसूस कर सके। रामनगर ब्लाक के प्रमुख एवं पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष यषकांत सिंह ने कहा कि सरकार और अधिकारियों के बीच समन्यव रहना चाहिए, अगर कहीं सरकार की छवि खराब करने का मामला आता है, तो यह हम सभी और प्रषासन की जिम्मेदारी बनती है, सरकार के प्रति कोई गलत संदेष समाज में न जाए। प्रेमसागर त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी सदैव जनसमस्याओं के समाधान को सर्वोच्च प्राथमिकता देती रही है। वहीं भाजपा बस्ती के जिलाध्यक्ष विवेकानन्द मिश्र ने कहा कि केंद्र और प्रदेश सरकार की मंशा के अनुरूप जिले में सुशासन, सुरक्षा और जनकल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। भारतीय जनता पार्टी निरंतर प्रशासन के साथ संवाद और समन्वय स्थापित कर जनता की समस्याओं के त्वरित समाधान हेतु प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था से कोई भी समझौता नहीं किया जाएगा।

 


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