सदस्य ‘चाय-समोसा’ खाते ‘रहें’ और बीडीए ‘लुटता’ ‘रहा’


सदस्य ‘चाय-समोसा’ खाते ‘रहें’ और बीडीए ‘लुटता’ ‘रहा’

-सदस्यों को ‘चाय समोसा’ में फंसाकर, पंकज पांडेय एंड टीम ने 20 अवैध कालोनियों के मानचित्र को स्वीकृति कर कालोनाइजर्स से कमाया करोड़ों

-अवैध कालोनियों का मैपिंग के नाम पर बीडीए ने रिमोट सेंसिगं एप्लीकेषन संेटर को किया सात लाख का भुगतान, सर्वे में निकला 37 अवैध कालोनी, 17 कालोनी को अवैध दिखाया और 20 अवैध कालोनी को छिपा लिया, बाद में भारी रकम लेकर सभी का मानचित्र अवैध रुप से स्वीकृति कर दिया

-बीडीए ने सर्वे करने वाली फर्म को तो भुगतान पूरा किया, लेकिन पंकज पांडेय एंड टीम ने सर्वे रिपोर्ट ही नहीं लिया, इस तरह पंकज पांडेय एंड टीम ने सात लाख का वित्तीय नुकसान किया, जो कि जांच का विषय

-इतना ही नहीं बीडीए ने रिमोट सेंसिगं एप्लीकेषन संेटर से अवैध निर्माण पर अंकुष लगाने के लिए अवैध कालोनियों के अतिरिक्त आवास, होटर्स, नर्सिंग होम सहित अन्य अवैध निर्माण होने वाले प्रतिष्ठानों की मैपिंग के लिए 33.69 लाख का एग्रीमेंट किया, प्रथम किष्त के रुप में 16.84 लाख का चेक भी दिया, लेकिन उस चेक को पंकज पांडेय एंड टीम ने जानबूझकर चेक को बाउंस करवा दिया, ताकि अवैध निर्माण के नाम पर लूटपाट किया जा सके

-जिले की जनता का कहना है, कि अगर तीनों बीडीए के सदस्य सरकार और जनता के प्रति वाकई ईमानदार हैं, तो उन्हें 20 अवैध कालोनियों के मानचित्र स्वीकृति और सात लाख के किए गए भुगतान की जांच ही नहीं करानी होगी, अलबत्ता वित्तीय अनियमितता और करोड़ों का बंदरबांट करने वालों को जेल तक पहुंचाना होगा

बस्ती। अगर अब भी बीडीए के तीनों सदस्य नहीं जागे तो जनता उन्हें माफ नहीं करेगी और मान लेगी कि यह लोग भी उस पंकज पांडेय एंड टीम का हिस्सा रहें, जिन्होंने बीडीए और क्षेत्र की जनता को उनकी आंख में धूल झांेक कर करोड़ों लूटा, और बीडीए को बर्बाद कर दिया। जनता की नजर में यह सदस्य लोग 15 बैठकों में चाय और समोसा खाने के आलावा अन्य षायद ही कोई काम किया हो। इन लोगों का न तो विकास में और न बीडीए के भ्रष्टाचार को समाप्त करने में कोई खास योगदान रहा। जनता आज तक सदस्यों की उपयोगिता समझ ही नहीं पाई। बहरहाल, अभी भी इन लोगों के पास जनता और सरकार में छवि सुधारने का अवसर है। इनमें सबसे अधिक छवि सुधारने की आवष्यकता रामनगर ब्लॉक प्रमुख यषंकात सिंह को हैं, क्यों इन्हें अभी राजनीति में बहुत आगे जाना हैं, बाबा की तरह विधायक बनना है। जिले की जनता का कहना है, कि अगर तीनों बीडीए के सदस्य सरकार और जनता के प्रति वाकई ईमानदार हैं, तो इन्हें 20 अवैध कालोनियों के स्वीकृति मानचित्र


और सात लाख के किए गए भुगतान की जांच ही नहीं करानी होगी, अलबत्ता वित्तीय अनियमितता और करोड़ों का बंदरबांट करने वालों को सजा भी दिलवानी होगी। यह काम करना/करवाना सदस्यों के लिए बहुत कठिन नहीं हैं, बस इच्छा षक्ति और ईमानदारी होना चाहिए। क्यों कि यह सभी तीनों भाजपा के हैं, और सरकार भी भाजपा की है? इन्हें चाय और समोसा वाली छवि से बाहर आना होगा। सदस्यों को यह याद रखना होगा कि उन लोगों को ‘चाय समोसा’ में फंसाकर, पंकज पांडेय एंड टीम ने 20 अवैध कालोनियों के मानचित्र को स्वीकृति कर कालोनाइजर्स से करोड़ों कमाया। अवैध कालोनियों की मैपिंग के नाम पर बीडीए ने ‘रिमोट सेंसिगं एप्लीकेषन संेटर’ को सात लाख का भुगतान किया, सर्वे में 37 अवैध कालोनी सामने आया, लेकिन टीम ने सिर्फ 17 कालोनी को अवैध बताया और 20 अवैध कालोनी को छिपा लिया, बाद में भारी रकम लेकर सभी का मानचित्र अवैध रुप से स्वीकृति कर दिया, जिसमें टीम ने करोड़ों कमाया। बीडीए ने सर्वे करने वाली फर्म को तो पूरा भुगतान किया, लेकिन पंकज पांडेय एंड टीम ने सर्वे रिपोर्ट ही नहीं लिया, बिना सर्वे रिपोर्ट लिए सात लाख का भुगतान कर दिया, इसके पीछे की टीम की साजिष छिपी हुई थी। सर्वे रिपोर्ट अगर ले लिया होता तो सभी 37 कालोनाइजर्स के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ती, इस लिए सर्वे रिपोर्ट को ही नहीं लिया, और उसी की आड़ में पंकज पांडेय एंड टीम ने करोड़ों तो कमाया, साथ ही सात लाख का वित्तीय नुकसान भी किया, जो कि जांच का विषय है। पंकज पांडेय एंड टीम की चालाकी देख बड़े-बड़े दंग रह गए। बीडीए ने ‘रिमोट सेंसिगं एप्लीकेषन संेटर’ से अवैध निर्माण पर अंकुष लगाने के लिए अवैध कालोनियों के अतिरिक्त आवास, होटर्ल, नर्सिंग होम सहित अन्य होने वाले प्रतिष्ठानों की मैपिंग के लिए 33.69 लाख का एग्रीमेंट किया, प्रथम किष्त के रुप में 16.84 लाख का चेक भी दिया, लेकिन उस चेक को पंकज पांडेय एंड टीम ने जानबूझकर इस लिए बाउंस करवा दिया, ताकि अवैध निर्माण के नाम पर लूटपाट किया जा सकें। फर्म लिखती रही, कि चेक बाउंस हो गया, इस लिए दूसरा चेक दिया जाए, ताकि अवैध निर्माण का सर्वे किया जा सके। फर्म ने बाउंस चेक को यह कहते हुए वापस कर दिया, कि आरटीजीएस किया जाए। हैरानी होती है, कि पांच साल हो गए, लेकिन एक भी कमिष्नर, डीएम और सचिव ने इस ओर देखा ही नहीं और न ही जांच करवाने की जरुरत ही महसूस किया। ऐसा लगता हैं, पंकज पांडेय एंड टीम का जादू अधिकारियों पर भी चढ़कर खूब बोला, तभी तो किसी ने जांच नहीं करवाया, हर बैठक में कमिष्र को सिर्फ 17 अवैध कालोनियों के बारे में बताया जाता रहा, और हर बार कमिष्नर ध्वस्तीकरण का आदेष देते रहें, लेकिन आज तक एक भी कालोनी ध्वस्त नहीं हुई। बीडीए के सदस्यों को यही देखना है। बैठक में उन 37 अवैध कालोनियों का कोई जिक्र नहीं करता, जो सर्वे में आया, और जिसकी मैपिगं कराने के लिए बीडीए ने सात लाख खर्च किया। बीडीए के सदस्यों के अतिरिक्त जो अन्य नेता आवाज उठाते थे, और पंकज पांडेय को जेल भेजवाने को कहते थे, उनकी भी आवाज न जाने क्यों बंद हो गई? इसी का फायदा पंकज पांडेय एंड टीम ने खूब उठाया। षिकायत करके और यह कहते हुए षिकायत को निराधार बताने वाले नेताओं की कमी नहीं रही कि, किसी ने उनके पैड का दुरुपयोग किया। जिस जिले में ऐसे नेता और बीडीए सदस्य हों, उस जिले को हर कोई लूटना चाहेगा। अगर ऐसा नहीं होता तो एक अधिकारी यह न कहते कि उन्होंने बीडीए से इतना कमाया जितना वह पूरी जिंदगी नहीं कमा पाते।

मत करिए, ‘रेडक्रास सोसायटी’ को ‘प्राइवेट कंपनी’ की तरह ‘चलाने’ का ‘प्रयास’!

बस्ती। अगर समाज सेवा के क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी संस्था रेडक्रास सोसायटी का सभापति कार्यकारिणी की बैठक तक न करवा सके, तो ऐसे सभापति को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए, ताकि संस्था की छवि खराब न हों। जिस तरह चंद लोगों के चलते रेडक्रास सोसायटी की छवि खराब हो रही है, उससे लगता है, कि चंद लोग इस संस्था को मनमानी तरीके से संचालित करना चाहते हैं, अगर ऐसा नहीं होता तो पहले दस में से सात कार्यकारिणी के सदस्य अविष्वास प्रस्ताव न लाते और न नए साल के दूसरे दिन बुलाई गई बैठक का बहिष्कार ही करते। सवाल उठ रहा है, कि आखिर क्या समझकर सभापति डा. प्रमोद कुमार चौधरी, सचिव रंजीत श्रीवास्तव, कोषाध्यक्ष राजेष ओझा और उप सभापति लक्ष्मीकांत पांडेय रेडक्रास सोसायटी का संचालन करना चाहते हैं, क्या इन लोगों के दिमाग में इतनी छोटी सी बात क्यों नहीं समझ में आती कि इतनी बड़ी संस्था का संचालन बिना सबके सहयोग के नहीं चल सकता? एक केजी क्लास में पढ़ने वाला बच्चा समझ सकता है, तो क्यों नहीं पढ़े लिखे लोग समझ पा रहे हैं, आखिर समस्या कहां हैं, और क्या है? क्यों कि संस्था को नियम कानून से संचालित किया जा रहा है? सच तो यह है, कि चार लोगों को उसी दिन यह बात समझ में आ जानी चाहिए थी, जिस दिन कार्यकारिणी के अषोक कुमार सिंह, संतोष सिंह, हरीष सिंह, कुलवेंद्र सिंह मजहबी, इमरान, उमेष श्रीवास्तव और राहुल श्रीवास्तव ने नई कार्यकारिणी के प्रति अविष्वास प्रकट किया था। अगर उसी दिन सच को स्वीकार कर लेते तो दो जनवरी 26 की बैठक में सभी सदस्य मौजूद होते। जबकि अषोक कुमार सिंह ने सचिव को लिखा भी था, कि कार्यकारिणी की पहली बैठक डीएम की अध्यक्षता में होनी चाहिए, और बैठक होटल में न करके डीएम सभागार में होनी चाहिए। बैठक को स्थगित करने की अपील भी की गई। बैठक होने से पहले अगर सभी सदस्यों को विष्वास में लिया गया तो बैठक सफल भी होती, और संस्था को बेहतर तरीके से चलाने में सहयोग और सुझाव भी मिलता। लेकिन ऐसा लगता है, मानो कुछ लोग इस सामाजिक संस्था को एक प्राइवेट कंपनी की तरह संचालित करना चाहते है। अगर कुछ लोगों को यह गलतफहमी है, कि वह बस्ती सें लेकर लखनउ तक मैनेज कर लेगें, तो वे लोग गलत सोच रहे हैं, और गलत दिषा की ओर जा रहे है। ऐसे लोगों को कम से कम अपने उस षपथ को याद कर लेना चाहिए, जो उन्होंने लिया था। बहुत ही किस्मत वालों को रेडक्रास सोसायटी के जरिए समाज की सेवा करने का मौका मिलता है, अगर उपर वाले ने यह मौका दिया है, तो उसका उपयोग करें, न कि दुरुपयोग। रेडक्रास सोसायटी के हर सदस्य का यह दायित्व हैं, कि वह मिलजुल कर संस्था के नाम के अनुरुप समाज के अंतिम पायदान वाले व्यक्ति तक पहुंचे और उसकी सेवा करें। कार्यकारिणी के बैठक की अध्यक्षता डीएम कराते हैं, या फिर नहीं कर सकते हैं, इस पर तो सवाल उठ सकता है, लेकिन बैठक का बहिष्कार करना बड़ी बात हैं, और वह भी पहली बैठक। नई कार्यकारिणी को इस पर विचार करना चाहिए न कि यह कहना चाहिए, कि डीएम कार्यकारिणी की बैठक की अध्यक्षता नहीं बल्कि एजीएम की करतें है। अगर नई कार्यकारिणी यह चाहती है, कि रेडक्रास सोसायटी की बदनामी न हो तो इसके लिए सभापति डा. प्रमोद कुमार चौधरी, सचिव रंजीत श्रीवास्तव, कोषाध्यक्ष राजेष ओझा और उप सभापति लक्ष्मीकांत पांडेय को पहल करनी चाहिए, क्यों कि सात सदस्यों ने अविष्वास उन पर जताया है। जिस संस्था को समाज सेवा के क्षेत्र में काम करने पर मीडिया की सुर्खियों में होना चाहिए, वह संस्था आज अपने लोगों के ही सवालों के घेरें में है।

‘सुबह’ की ‘सर्दी’ से ‘बचे’, नहीं ‘तो’ मार देगा ‘लकवा’

बस्ती। जाने माने समाज सेवी एवं होम्योपैथ के विषेषज्ञ डा. वीके वर्मा का कहना है, कि सर्दी के दिनों में सबसे अधिक लकवा, पक्षाघात या (पैरालिसिस) के अटैक होने का खतरा रहता है। सबसे अधिक लकवा का अटैक सुबह की सर्दी में होता है। इसी लिए उन लोगों को सलाह दी जाती है, कि सुबह की सर्दी में किसी तरह की लापरवाही न करें, यहां तक मार्निगं वाक से भी लोगों को बचना चाहिए। कहते हैं, कि जितने भी लकवाग्रस्त मरीज आ रहे हैं, उन पर उनमें 99 फीसद सुबह के सर्दी के समय अटैक हुआ। कहते हैं, कि खराब लाइफस्टाइल, खान पान की बदलती आदतें और तनाव, भागदौड़ भरी जिंदगी बीमारियों का सबसे प्रमुख कारण है। लकवा, पक्षाघात या (पैरालिसिस) एक ऐसी बीमारी है, जिसके बारे में पहले लोगों को पता नहीं चलता है, और अचानक से परेशानी हो जाती है। लकवाग्रस्त मरीजों का सफल इलाज हो सकता है, और किया भी जा चुका है।

कहते हैं, कि लकवा एक वायु रोग है, जिसे पैरालिसिस, लकवा और पक्षाघात के नाम से भी जानते हैं। इसमें मांसपेशियों की कार्यविधि प्रभावित हो जाती है। मस्तिष्क् से अंगों में संदेश पहुंचाने वाली तंत्रिकाओं और रीढ़ की हड्डी प्रभावित होने की स्थिति में लकवा होता है। लकवा किसी एक मांसपेशी या समूह या शरीर के बड़े क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है। इसका प्रभाव ये होता है कि शरीर के किसी एक भाग की मांसपेशियां काम करनी बंद कर देती है। यानी ऐसी अवस्था में लकवा से ग्रस्त व्यक्ति एक से ज्यादा मांसपेशियों को हिलाने में असमर्थ होता है। यह स्थिति तब आती है, जब मांसपेशियों और मस्तिष्क के बीच संचार सही से नहीं हो पाता है। लकवा शरीर के एक क्षेत्र में या पूरे शरीर में हो सकता है यानी शरीर के एक तरफ या दोनों तरफ हो सकता है।


मोनोप्लेजिया, इस प्रकार के लकवे में शरीर का केवल एक अंग प्रभावित होता है। हेमीप्लेजिया इस पेरालिसिस में शरीर के एक तरफ का हाथ और पैर लकवाग्रस्त होते हैं। पैराप्लेजिया कमर से नीचे के अंग लकवाग्रस्त होने को पैरापलेजिया लकवा कहा जाता है। इस रोगी के दोनों पैर प्रभावित होते हैं। सामान्यतौर पर लकवा के लक्षण को पहचानना बहुत आसान होता है। ऐसे में मरीज को किसी विशिष्ट भाग में कुछ भी महसूस होना बंद हो जाता है। कई बार अंग में पैरालिसिस होने से पहले झुनझुनी या सुन्नता जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं। पैरालिसिस में शरीर का तकवा ग्रस्त हिस्सों की मांसपेशियों पर कंट्रोल खत्म हो जाता है। लकवा के दौरान आपको निम्नलिखित लक्षण देखने को मिल सकते हैं। कभी-कभी मांसपेशियों में ऐठन व दर्द होना, मांसपेशियों में कमजोरी होना, मुंह से लार गिरना,. सिर दर्द, सोचने-समझने की क्षमता में कमी, चेहरे के एक साइड के हिस्से में कमजोरी होना, देखने और सुनने की क्षमता में बदलाव मूड और व्यवहार में बदलाव होना, सांस लेने में परेशानी आदि इसके लक्षण हैं।

ऐसे कई संभावित कारण है, जिनकी वजह से किसी व्यक्ति का शरीर परमानेंट या टेंपरेरी रूप से लकवा ग्रस्त हो सकता है। कई मामलों में यह रीढ की हड्डी में चोट या नुकसान के कारण होता है। इसके अलावा निम्नलिखित कारण है, जिनके कारण लकवा हो जाता है। जैसे किसी तरह का अटेक या स्ट्रोक, पोलियो, हड्डी, पीठ या सिर में गहरी चोट, ट्रामा, मल्टीपल स्केलरोसिस, शरीर के एक हिस्से में, हांथ या हाथ-पैर दोनों में कमजोरी महसूस होना। . लकवा के कुछ निम्नलिखित घरेलू उपाय है, जिसे आप घर पर आसानी से कर सकते हैं। दवाओं और इलाज के माध्यम से लकवा को नियंत्रित और ठीक किया जा सकता है। गिली मिट्टी का लेपः गिली मिट्टी का लेप पैरालिसिस में बहुत उपयोगी माना जाता है। आप नियमित रूप से लकवा रोगियों में गिली मिट्टी का लेप लगा सकते हैं। यदि आप इसे रोजाना कर सकते हैं तो एक दिन का गैप ले सकते हैं। मिट्टी का लेप लगाने के बाद मरीज को कटीस्नान करना जरूरी होता है। यह उपाय लकवा मरीज के लिए बहुत लाभकारी साबित होता है। लकवा से ग्रसित अंगों में ऑयल लगाने के लिए आपको एक तरह का तेल तैयार करना होगा। इसके लिए आप आधा लीटर सरसों का तेल लें और उसमें 50 ग्राम लहसुन डालें। उसके बाद लोहे की कड़ाही में उसे तब तक पकाएं, जब तक की पानी जल न जाए। उसके बाद उसे ठंडा होने दे और ठंडा होने के बाद डिब्बे में छान कर रख लें। इस तेल से आप रोजाना लकवे वाले अंग पर मालिश करें, इससे आपको फायदा मिलेगा। करेला पैरालिसिस में करेला बहुत ही फायदेमंद माना जाता है। ऐसे में मरीज को करेले की सब्जी या करेले का जूस का सेवन करना चाहिए। यह आपके शरीर के प्रभावित अंगों में सुधार करता है। यह जरूर ध्यान रखें की इस घरेलू उपाय को रोजाना करना होगा, इससे आपको जल्दी आराम मिल सकता है। 

‘मीडिया’ से हारा ‘प्रशासन’  

बस्ती। स्टेडियम में शनिवार को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रशासन एकादश के बीच सद्भावना क्रिकेट मैच खेला गया। इसमें मीडिया ने प्रषासन को हरा दिया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कप्तान सतीश श्रीवास्तव ने टॉस जीत कर पहले गेंदबाजी करने का फैसला किया। हेमंत पांडेय और विवेक कुमार मिश्र ने गेंदबाजी की अच्छी शुरुआत की। दोनों ने शुरुआत के चार ओवर में कसी हुई गेंदबाजी करते हुए प्रशासन की टीम को खुलकर खेलने का मौका नहीं दिया। इसके साथ ही विवेक गुप्ता, कृष्ण द्विवेदी और कप्तान सतीश श्रीवास्तव ने बढ़िया गेंदबाजी करते हुए प्रशासन की टीम को 110 रन पर रोक दिया। विवेक मिश्र ने एक, विवेक गुप्ता ने दो, सतीश श्रीवास्तव ने एक विकेट हासिल किया। प्रशासन की टीम की तरफ से कप्तान डीआईजी संजीव त्यागी ने सलामी बल्लेबाज के रूप में 33 रनों की बढ़िया पारी खेली। इसके साथ ही भूमि संरक्षण अधिकारी राज मंगल ने 17, सीडीओ सार्थक अग्रवाल ने छह, सीआरओ कीर्ति प्रकाश भारती ने 19, अपर पुलिस अधीक्षक श्याम कांत ने 13, सुनील छह और बीएसए अनूप कुमार तिवारी ने चार रनों की पारी खेली। प्रशासन की टीम ने निर्धारित 12 ओवर में 6 विकेट होकर 110 रन बनाया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की टीम को जीत के लिए 111 रनों का लक्ष्य दिया। लक्ष्य का पीछा करने उतरी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सलामी बल्लेबाज कृष्णा द्विवेदी और शनि सिंह ने बेहतर तालमेल के साथ मैदान के चारों तरफ चौके छक्के लगाए। कृष्णा द्विवेदी ने सात चौके और दो छक्के की बदौलत 22 गेदों में 51 रनों की शानदार पारी खेली। सनी सिंह ने एक छक्के के साथ 13 रन बनाया। इसके साथ ही हेमंत पांडेय ने 19 रनों की पारी खेली।


आखिरी ओवर में मुकाबला काफी रोमांचक दौर में पहुंच गया। 6 गेंदों पर 8 रनों की जरूरत थी, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के हेमंत लगातार दो गेंद बीट हो गए, इसके बाद उन्हें वापस पवेलियन बुला कर बल्लेबाज अनुज सिंह को भेजा गया, दो व्हाइट गेंद और एक चौके की मदद से स्कोर दो गेंद पर दो रन पर आ पहुंचा, विकेटकीपर बल्लेबाज अनुज प्रताप सिंह ने एक गेंद पर एक रन लेकर मैच टाई कर दिया, इसके बाद अंतिम गेंद पर सलामी बल्लेबाज जीत यादव ने डीआईजी की गेंद पर चौका लगाते हुए जीत हासिल कर ली। बल्लेबाजों की सूझबूझ खेल ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को जीत दिला दी। मैच में सलामी बल्लेबाज के रूप में 51 रनों की शानदार पारी खेलने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कृष्णा द्विवेदी को मैन ऑफ द मैच घोषित किया गया। प्रशासन की तरफ से संजीव त्यागी, श्याम कांत, सार्थक अग्रवाल, सुनील शाह, कीर्ति प्रकाश भारती और राज मंगल ने गेंदबाजी में हाथ आजमाया। ज्ञान उपाध्याय और आशुतोष ओझा बतौर अंपायर मौजूद रहे वहीं पंकज श्रीवास्तव ने स्कोरर की जिम्मेदारी निभाई और एम काशिफ ने कमेंट्री किया।

‘पुलिस’ आई, ‘लेन-देन’ करके चली ‘गई’

बनकटी/बस्ती। मुंडेरवा पुलिस की चर्चा जितनी भी की जाए कम होगी। यह वहीं थाने की पुलिस हैं, जिससे घायल परिवार का मुकदमा तब लिखा जब सूद पर छह हजार लाकर नहीं दे दिया। पता नहीं क्यों मंुडेरवा की पुलिस पीड़ितों की तभी सुनती है, जब वह चढ़ावा चढ़ाते है। अंधेर नगरी चौपट राजा वाली कहावत मुंडेरवा की पुलिस, शासन-प्रशासन सिद्ध कर रहा है। मुन्डेरवा थाना क्षेत्र के कुरियार गांव के पौराणिक कुटी पर धड़ल्ले से हरे आमों के पेड़ की कटाई हो रही है। महाराज जी वृद्ध हो चुके हैं और कहीं अन्यत्र जगह कुटी पर रहते हैं। उनके स्थान पर कुटी पर कर्मचारी रहता है जो लगभग लाखों रुपए का बेसकीमती पेडों को बेचकर पर्यावरण का दुश्मन बन चुका है। जिसमें गांव के प्रधान की संलिप्तता को नकारा नहीं जा सकता। मजे की बात तो यह है की मौके पर मुंडेरवा की पुलिस आई, और लेन-देन करके चली गई। पेड़ कट रहा था लेकिन जान-समझ कर वापस चली गई। पुनः जब वन विभाग के उडाका दल, वन दरोगा व वनमाली से बात किया गया तो किसी ने फोन रिसीव नहीं किया। रेंजर अजय प्रताप सिंह से बात करने का प्रयास किया गया तो इनका नम्बर बिजी बताया, वनमाली श्रीकान्त मौके पर पहुंच कर कारवाई करवाने की बात कही है।


क्षेत्र के लोगों का कहना है, कि सांय होते ही हरे पेड़ो की कटान षुरु हो जाती है। कोई सुनने वाला नहीं हैं, पुलिस से कहो तो वह आती जरुर, मगर कार्रवाई करने के बजाए लेन-देन करके चली जाती है, जैसे पुलिस जाती फिर से कटान षुरु हो जाता है। कहती है, कि व विभाग के जिम्मेदारों को जब भी फोन करो उनका मोबाइल बिजी मिलता है। वन विभाग वाले कार्रवाई तो करते हैं, लेकिन तब तक देर हो जाती है। पर्यावरण के दुष्मन तब तक इतना नुकसान कर चुके होते हैं, कि उसकी भरपाई नहीं हो सकती। वनमाली श्रीकांत ने बताया कि हरे पेड़ काटने वालों पर दस हजार का जुर्माना लगाया गया, कल इसकी रसीद दिखा दूंगा। पुलिस वालो ने भी कार्रवाई की लेकिन अपने के लिए। गांव वाले कहते हैं, कि जुर्माना लगाने या फिर नकदी जेब में रख लेने से पर्यावरण को सुरक्षित नहीं किया जा सकता है।

‘धोखाधड़ी’ में ‘अनूप खरे’ और ‘दिव्यांशु खरे’ पर ‘केस’

बस्ती। धोखाधडी के आरोप में कोतवाली में अनूप खरे और दिव्याषु खरे के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है। यह मुकदमा नमन श्रीवास्तव पुत्र श्री संजय श्रीवास्तव निवासी बेलवाडाड़ी ने दर्ज कराया। नमन का कहना है, कि उन्होंने वर्ष 2023 व 2024 में व्यापार के लेन देन में दो करोड़ अठ्ठाईस लाख चौदह हजार छः सौ तिरानवे रुपये विपक्षी व विपक्षी के सम्बन्धित खाते में दिया गया। उसके बाद विपक्षीगण द्वारा एक करोड़ एक्यासी लाख ग्यारह हजार चार सौ अट्ठानवे रुपये वापस किया, शेष सैंतालीस लाख रुपये बकाया है। अक्टूबर 2025 को लिखित रुप से पांच चेक के माध्यम से दिये विपक्षी के खाते में पैसा न होने के कार चेक वाउंस हो गया तथा अभी तक शेष रुपये वापस नही दिया।


 


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