24’ में भी ‘लूटा’, ‘25’ में भी ‘लूटा’, ‘26’ में भी ‘लूटेगें’!

 ‘24’ में भी ‘लूटा’, ‘25’ में भी ‘लूटा’, ‘26’ में भी ‘लूटेगें’!

बस्ती। पिछले कई सालों से भ्रष्टाचारियों के नाम रहता आ रहा साल। इन लोगों ने 24 में भी लूटा, 25 में भी लूटा और 26 में भी लूटेगें। जिले को लूटने की इन लोगों की आदत सी पड़ गई, जब तक यह लोग जिले को पूरी तरह लूट नहीं लेगें, तब तक इनका लूटने का सिलसिला जारी रहेगा। साल तो बदल जाते हैं, लेकिन जिले को लूटने वाले नहीं बदलते। पूरे साल सदन से लेकर सड़क तक, ग्राम पंचायत से लेकर जिला पंचायत तक और ब्लॉक से लेकर विकास भवन तक सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों का ही बोलबाला रहा। यही स्थित बीडीए की भी रही, यहां पर तो पूरी तरह भ्रष्टाचारियों का कब्जा रहा। लूटने पाटने का जो सिलसिला आज से आठ साल पहले षुरु हुआ, वह आज भी हो रहा। यहां के चार-पांच मेट, प्रभारी एक्सईएन, एई और जेई मिलकर हजारों भवन स्वामियों को इतना लूटा कि वे कंगाल हो गए। भवन की लागत से अधिक उनका चढ़ावा में चला गया। नगर पंचायतों में तो मानो लूटने की खुली छूट रही हो। जो लोग अपने आप को ईमानदार कहते हुए नहीं थकते थे, उन्हीं लोगों ने सबसे अधिक लूटपाट किया। रही बात क्षेत्र पंचायतों की तो यहां के नकली प्रमुखों ने लूट का ऐसा रिकार्ड बनाया, जिसे असली षायद ही कभी तोड़ पाए। जिला पंचायत को तो संगठित गिरोह की तरह लूटा गया। 100-50 करोड़ की लूट नहीं बल्कि सैकड़ों करोड़ की लूट हुई, जिला पंचायत अध्यक्ष से लेकर एएमए और जिला पंचायत सदस्यों ने लूटा। लूट के मामले में षायद ही कोई पीछे रह गए हो। लूट पाट के लिए जो ब्लैकमेल का रास्ता अपनाया गया, उसे जिले वाले कभी नहीं भूल पाएगें, और इस साल जब कार्यकाल समाप्त होगा तो पूरे कार्यकाल को काला अध्याय के रुप में जाना जाएगा। कितने सदस्य दूबारा जिले के सबसे बड़े सदन में दिखाई देगें, इसकी कोई गांरटी नहीं दे रहा है। वे भी गांरटी नहीं दे पा रहे हैं, जिनकी अगुवाई में जिला पंचायत बर्बाद हुआ। सदस्यों को भ्रष्ट बनाने में ब्लैकमेल करने वाले मुखिया का बहुत बड़ा हाथ रहा। सदस्य पैसे के लिए इतना नीचे तक जा सकते हैं, यह सच क्षेत्र की जनता ने अवष्य देखा होगा। कुछ ऐसे भी हैं, जो जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने और विधायक बनने का सपना देख रहे हैं। अगर कोई ईमानदार सपना देखे तो समझ में आता है, लेकिन अगर कोई ब्लैकमेलर सपना देखे तो किसी के समझ में नहीं आएगा। बहरहाल, जिला पंचायत को जितना लूटना था, लूट लिया, जितना ब्लैकमेल करना था, कर लिया, अब तो छोड़ दीजिए। जिला पंचायत का लगभग अब तक पूरा कार्यकाल भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के हवाले रहा। जिले के लोगों को इस बात की हैरानी हो रही है, कि अरबों की लूट हो गई, और प्रषासन मूकदर्षक बना रहा। जिन नेताओं ने विरोध किया, वह भी बाद में न जाने क्यों षंात हो गए। पूरे साल किसान कभी धान, तो कभी गेहूं, तो कभी खाद तो कभी गन्ना घटतौली को लेकर चिल्लाता और रोता रहा, लेकिन नेता और अधिकारी खामोष रहें, अधिकारियों के चुप होने की तो बात समझ में आती है, क्यों कि यह तो मेहमान बनकर आते और चले जाते हैं, इनसे किसानों के दुख और पीड़ा से कोई सरोकार नहीं होता, लेकिन नेताओं का चुप रहना इस लिए समझ में नहीं आता, क्यों कि इन्हें तो किसानों के बीच में रहना और चुनाव में जाना है। आखिर यह लोग 27 में क्या मुंह लेकर किसानों के पास जाएगें? किसानों के नाम पर जिला कृषि अधिकारी से लेकर एआर तक और पीसीएफ के डीएस से लेकर सचिव तक लूटते रहें। जिले में इतना बड़ा धान का घोटाला हो गया, फिर भी किसी ने कोई सबक नहीं लिया, बल्कि और तेजी से लूटपाट यह सोचकर करने लगे, कि जब उन लोगों का नाम भ्रष्टाचारी में षामिल हो ही गया तो क्यों न जितना हो सके, लूट लें। जिले में इतना सबकुछ हो गया, लेकिन प्रषासन का इकबाल नहीं दिखा। जिले के लोगों को जितना प्रषासन पर भरोसा था, उतना पूरा नहीं हुआ। जिले के मुखिया की ओर से एक भी मामले में ऐसी कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई, जिससे प्रषासन के होने का एहसास लोगों को हो सके। कोडिन सीरप के मामले में भी प्रषासन ने उन लोगों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं किया, जिससे यह पता चल सके, कि प्रषासन इस मामले में कितना गंभीर है। इस मामले में मीडिया की ओर से सवाल भी किए गए, लेकिन जबाव और कार्रवाई के बजाए नाराजगी जताई गई। साल के अंतिम दिनों में जिस तरह चंद लोगों ने जिले के माहौल को खराब करने का प्रयास किया, उससे जिले की छवि खराब हुई। रेडक्रास सोसायटी का जिक्र न हो, यह हो नहीं हो सकता। जिस रेडक्रास सोसायटी के क्रियाकलापों को लेकर पूरे दुनिया में चर्चा होती रही, वहीं बस्ती में पहली बार हुए चुनाव और उसके बाद के क्रियाकलापों की भी खूब चर्चा हुई। कहा गया कि चंद लोगों के कारण रेडक्रास सोसायटी का मकसद पूरा नहीं हो पाया, जिस रेडक्रास सोसायटी को लोग कोरोना काल में जानते हैं, वह पहचान अब कहीं खो सा गया है। जिस तरह यह संगठन और इसके सभापति सहित अन्य पदाधिकारी विवादों के घेरे में रहे, वह काफी चर्चा का विषय रहा। जिले के लोगों ने यह भी देखा कि लोग जितना पद के लिए लालायित रहते उतना सेवा करने के लिए नहीं। चुनाव जीत कर पदाधिकारी बन जाना अलग बात हैं, और पदाधिकारी बनकर दिखाना अलग बात है। इसी लिए बार-बार कहा जा रहा हैं, कि पद मोह छोड़कर समाज सेवा में लग जाइए, और इस सेवा में चंद लोग ही न लगे, बल्कि पूरी टीम लगे, तभी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस आ सकती है। वरना यूं ही अविष्वास प्रस्ताव आते रहेगें


आखिर ‘अवैध’ निर्माण ‘का’ जिम्मेदार ‘कौन’?


बस्ती। जिले की जनता पिछले लगभग आठ सालों से यह जानना चाह रही है, कि आखिर अवैध निर्माण के लिए कौन जिम्मेदार? भवन स्वामी, बीडीए का सख्त नियम कानून या फिर बीडीए के जिम्मेदार? यह भी सवाल उठ रहा है, कि आखिर इतने सालों में बीडीए को क्या लाभ हुआ? देखा जाए तो बीडीए के हाथ तो कुछ नहीं लगा, अलबत्ता बीडीए के जिम्मेदारों की लाटरी अवष्य निकल गई। सबसे अहम सवाल कि आखिर बीडीए का खजाना इतने सालों में क्यों खाली रहा? और बीडीए के जिम्मेदारों की तिजोरी कैसे भर गई? किसने तिजोरी भरी और इसके पीछे उसकी क्या मंषा रही? रही बात तिजोरी भरने वाले धन्ना सेठों की तो उन्होंने भी कोई षौक से बीडीए वालों की तिजोरी को नहीं भरा, बल्कि बीडीए के नियम कानून ने उन्हें भरने के लिए मजबूर कर दिया, वरना कौन कमबख्त अवैध निर्माण के चक्कर में पड़ कर रातों की नींद हराम करना चाहेगा? नुकसान तो सबसे अधिक भवन स्वामियों का ही हुआ। यह भी सच है, कि अगर बीडीए का नियम कानून सरल होता तो बीडीए का विकास भी होता और सरकारी खजाना भी भरता। तब कोई अधिकारी यह नहीं कहता कि उन्होंने बस्ती से जितना कमाया, उतना पूरी नौकरी में भी नहीं कमाया। इसी लिए बार-बार भवन स्वामियों की ओर से यह कहा जा रहा है, कि जब तक सरकार बीडीए के नियम कानून को भवन स्वामियों के हित में नहीं बनाएगी, तब तक अवैध निर्माण होते रहेंगे, और पंकज पांडेय जैसे लोग जिले को लूटते रहेगें। अनेक अवैध निर्माण को अंजाम देने वाले भवन स्वामियों का कहना है, कि उन्होंने षौक से अवैध निर्माण नहीं करवाया, बल्कि बीडीए के नियम कानून ने उन्हें मजबूर किया। सवाल के लहजे और अपना दर्द बयां करते हुए कहते हैं, कि अगर कोई कारोबारी रोजगार के लिए किसी भवन का निर्माण करता है, और इसी बीच बीडीए वाले आकर खड़े हो जाते हैं, और कहते हैं, कि निर्माण बंद करो, नहीं तो सील कर दूंगा। ऐसे में वह कारोबारी जिसने बैंक से लोन लेकर भवन बनाना चाह रहा है, क्या करेगा? जाहिर सी बात हैं, वह गलत रास्ता ही चुनेगा, क्यों कि उसे अपने धन के साथ इज्जत की भी चिंता रहती है, तब वह पंकज पांडेय, संदीप कुमार, हरिओम गुप्त, अरुण कुमार षर्मा, आरसी षुक्ल, केडी चौधरी जैसे लोगों के पास नोटों की गडडी लेकर जाता है, और कहता है, कि चाहें जितना पैसा लग जाए, लेकिन निर्माण नहीं रुकना चाहिए। ऐसे में इनकी सबसे अधिक मदद आउटसोर्सिंग वाले मेट करते हैं। जब इन सभी को अपना-अपना हिस्सा मिल जाता है, तो अवैध निर्माण भी पूरा हो जाता हैं, और कोई नोटिस भी नहीं जाती, और न सील ही होता है। अगर जेई अनिल कुमार त्यागी के कारण सील भी हो भी गया तो रातों-रात खुल भी जाता है, यह अलग बात हैं, सील खोलने के लिए कोई लिखित में आदेष नहीं होता। अब जरा अंदाजा लगाइए कि बाजार स्टीट यानि गंाधीनगर में अगर किसी को प्रतिष्ठान का निर्माण करना है, और उसके पास कुल 100 फिट. ही जमीन हैं, और अगर उसने बीडीए के नियम कानून का पालन किया तो उसे सबसे पहले 100 में 60 फीट बीडीए के लिए छोड़ना पड़ेगा, तभी उसका मानचित्र स्वीकृति होगा, पहले 60 था, अब 50 फिट छोड़ने का नियम हैं, तो क्या वह 50 फिट जमीन छोड़ पाएगा, अगर उसने छोड़ भी दिया तो 40 या 50 फिट में कौन सी दुकान का निर्माण हो जाएगा? अब इसी 40 या 50 फिट बचाने के लिए वह 20-25 फिट जमीन की कीमत बीडीए के भ्रष्ट लोगों को देने के लिए तैयार हो जाता है। हालांकि 10-20-50 लाख देने के बाद भी दुकानदार बीडीए की नजर में चोर ही कहलाएगा। आज आप लोग जो गांधीनगर में अवैध निर्माण देख रहे हैं, उसके लिए भवन स्वामियों को करोड़ों का चढ़ावा बीडीए के लोगों को चढ़ाना पढ़ा। बीडीए वाले भी उन अवैध निर्माण करने वालों के प्रति पूरी ईमानदारी दिखाते हैं, जिसने चढ़ावा चढ़ा दिया। अब जरा अंदाजा लगाइए कि दो हजार से अधिक आवास, प्रतिष्ठान, नर्सिगं होम और होटलर्स का अवैध निर्माण हो गया, लेकिन आज तक एक भी अवैध निर्माण को बीडीए वालों ने नियमानुसार ध्वस्तीकरण की कार्रवाई नहीं किया। इतना ही नहीं जो सरकारी कर्मचारी बीडीए वाले की काली कमाई में रोड़ा बनते हैं, उन्हें यह लोग रास्ते से हटाना भी जानते है। जैसे इन लोगों जेई अनिल कुमार त्यागी को हटा दिया। एक कारोबारी का कहना था, कि किसी भी भवन स्वामी को उस समय अच्छा नहीं लगेगा, जब कोई जेई आता है, और डायरी और पेन निकालकर नाम और पता पूछने लगता हैं, जाहिर सी बात हैं, कि अगर ऐसे में कोई कारोबारी हमला करता है, तो वह गलत नहीं करता, भले ही चाहें कानून की निगाह में गलत ही क्यों न हो? हां अगर कोई ईमानदार सवाल जबाव करता है, तो उसका सम्मान करना चाहिए। ईमानदारी और बेईमानी दोनों एक साथ नहीं चलेगी। कहते हैं, कि जब पूरा बीडीए ही बेईमान हैं, तो ऐसे लोगों के प्रति हमदर्दी कैसी और क्यों? जब नोटों की गडडी ही देनी है, तो ऐसे लोगों से लगाव कैसा? अब जरा अंदाजा लगाइए कि बीडीए के पहले कितना विकास होता था, और अब कितना हो रहा है। कहा भी जाता है, कोई भी विकास सरल नियम कानून से होता है। लेकिन यहां पर तो सरकार ने नियम कानून को इतना सख्त बना दिया, कि विकास ही ठप्प हो गया, ऐसे नियम कानून से क्या फायदा जो लोगों को अवैध निर्माण करने को मजबूर करे।

केस’ दर्ज ‘करने’ को ‘सूद’ पर लिया ‘छह हजार’

बनकटी/बस्ती। अगर किसी घायल परिवार को मुकदमा दर्ज कराने के सूद पर पैसा लेना पड़े तो आप समझ सकते है, कि जिले में भ्रष्टाचार किस सीमा तक पहुंच चुका है। एक सप्ताह पहले विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय ने योगीजी से कहा था, कि योगीजी जाकर देखिए आप के राज में पीड़ित परिवार का मुकदमा तब लिखा जाता है, जब वह पैसा नहीं दे देता। योगीजी के जीरो टालेंरस नीति पर कटाक्ष करते हुए यह भी कहा कि अगर आप के जीरो टालरेंस नीति की यह हालत है, तो आपको समीक्षा करनी चाहिए। माता प्रसाद पांडेयजी की कही हुई बातों को मुंडेरवा पुलिस ने चरित्रार्थ कर दिया। यहां के परिवार का केस तब दर्ज हुआ, जब उसने छह हजार दिया, हैरान करने वाली बात यह है, कि यह पैसा उसने 10 फीसद सूद पर लेकर पुलिस को दिया। अगर इसी को सुषासन कहते हैं, तो फिर सुषासन को क्या कहते है? मामला मुन्डेरवा थाना क्षेत्र के मदरा उर्फ बाघापार गांव का है। निवासी पूरा विपन्न परिवार एक विशेष समुदाय द्वारा मार खाने की वजह से जिंदगी-मौत से जूझ रहा हैं। इस परिवार का सुनने वाला कोई नहीं। यह घटना 25 दिसंबर सायं 5 बजे का बताया गया। एक प्राइमरी स्कूल है, जिसमें कुछ बच्चे गेंद खेल रहे थे। गेंद बगल में रहने वाले रामबरन के घर में पहुँच गया। जहां उनकी लड़की बन्दनी स्नान कर रही थी। गेंद लेने बच्चे पहुंचे तो बंदनी बोली अभी मैं स्नान कर रही हूं। यहां मत आना स्नान करने के बाद गेंद दे दूंगी।

जिस पर कुछ बच्चे झगड़ा करते हुए अंदर प्रवेश कर गए थे। जिसे लेकर बच्चों को घर की दादी डांट दी थी, जिस पर लाल बहादुर की पत्नी अपने बच्चों को डांट-फटकार कर अपने घर लेकर चली गई। नन्दनी के घर पर एक समुदाय गाली-गुप्ता करता रहा। गाली गुप्ता देने की वजह से नन्दनी के परिवार वालों से कुछ कहासुनी हो गई थी। मामला शांत हो गया था। परिवार की माली स्थिति बिल्कुल ठीक नहीं है। पिता राम बरन का दोनों पैर का कुल्हा पहले से ही टूट चुका, चलने फिरने में असमर्थ है। बीमार रहने की वजह से नंदिनी का एकलौता भाई जितेंद्र ठेला पर चाट की दुकान लगाता है। जब अपनी रोजी-रोटी में दुकान लगाने के लिए बघाडी चौराहे पर जा रहा था तो बीच रास्ते में एक समुदाय के नूरसलीम, अफसाना खातून, मुस्तफा, गुड़िया खातून, सीमा खातून, आसतरून निशा आदि लोग गोलबंद होकर आए और लाठी डंडे लात घूँसों व मोटर साइकिल की चेन से पटक कर मारने लगे। जिस पर पडोस की रहने वाली महिलाओं ने गुहार लगाना शुरू किया। गुहार सुनकर नन्दनी पहुचीं और अपने भाई के ऊपर लेट गयी। दरिदों ने उसे भी मार करके लहुलुहान कर दिया। दोनों हाथ टूट गया है, रीड की हड्डी काम नहीं कर रही है। मां ठकुरा देवी का सिर इस प्रकार फटा हुआ था, कि डाक्टर ने टांका लगाने से ही मना कर दिया। जितेंद्र के सिर में आठ टांका लगा। पूरे परिवार में सभी को गंभीर चोटे आई हैं। मामला थाने पर पहुंचा लेकिन गाँव के चौकीदार इबराहीम की मिलीभगत से मुकदमा पंजीकृत नहीं हुआ। तीसरे दिन जब सूद पर लेकर 6000 पहुंचे, तब जाकर मामूली धाराओं में मुकदमा पंजीकृत कर हुआ। आरोप है कि जितने मुलजिमान है, उन सब का नाम प्राथमिकी में दर्ज नहीं किया गया है। थाने के कोई दीवानजी हैं जिनका मोबाइल नंबर 9935814629 है। कहे तुम्हारे कहने के हिसाब से मुकदमा नहीं लिखा जाएगा जो लिखवा रहा हूं वही लिखा जाएगा। लिखवाना हो तो लिखवा लो नहीं तो तहरीर फाड़ कर फेंक दूंगा, जहां जाना है जाओ। विपन्न परिवार मुख्यमंत्री से भी न्याय की गुहार लगाई है। वहीं दूसरे पक्ष ने बताया कि यह लोग शराब पीकर आपस में ही मार पीट किए हैं। वही गांव वालों ने बताया उनके घर का कोई शराब नहीं पीता है।

‘संविधान’ के ‘नाम’ पर ‘अत्याचार’ कब ‘तक’?

बस्ती। श्री राजपूत करणी सेना के पूर्वांचल प्रवक्ता पूर्वांचल प्रवक्ता चंद्रेश प्रताप सिंह का कहना है, कि उत्तर प्रदेश में पुलिस की 32,000 भर्ती निकली है, लेकिन उसकी आयु सीमा देखकर आँखों में आँसू आ जाते हैं। सामान्य वर्ग और ईडब्ल्यूएस के गरीब युवाओं के लिए आयु सीमा मात्र 18 से 22 वर्ष, जबकि ओबीसी और एससीएसटी के लिए 18 से 27 वर्ष। क्या यह न्याय है? क्या सामान्य वर्ग का युवा 22 वर्ष में ही बूढ़ा हो जाता है, और पिछड़े वर्ग के युवा 27 तक जवान रहते हैं? यह भेदभाव नहीं तो क्या है?संविधान की धारा 14 सबको समानता का अधिकार देती है। कहते हैं, कि धारा 16 सरकारी नौकरियों में समान अवसर की गारंटी देता है। फिर क्यों सामान्य वर्ग के गरीब छात्रों को इतनी कम आयु सीमा में बाँध दिया जाता है? ईडब्ल्यूएस तो गरीब सामान्य वर्ग के लिए ही बनाया गया था, फिर उन्हें भी यह सजा क्यों? क्या वे अपराधी हैं? क्या वे गुलाम हैं? वे भी इस देश के नागरिक हैं, जिन्होंने सदियों से समाज को मजबूत बनाया है। लेकिन आज सरकारें और संविधान की व्याख्या उन्हें ही दंडित कर रही है। सोचिए, एक गरीब सवर्ण परिवार का लड़का। बचपन से संघर्ष, पढ़ाई के लिए कर्ज लेकर कोचिंग करके यी सपना देखता है, कि एक दिन उसके मेहनत का फल अवष्य मिलेगा। अगर 22 वर्ष तक नौकरी नहीं मिली तो जीवन भर का सपना चूर-चूर हो जाएगा। जबकि आरक्षित वर्ग को पाँच साल अतिरिक्त मिलते हैं। कहते हैं, कि यह आरक्षण नहीं, यह सवर्णों का शोषण है। सदियों से सवर्णों ने देश की रक्षा की, ज्ञान दिया, लेकिन आज उन्हें ही अपराधी मान लिया गया है। ईडब्ल्यूएस गरीब भी सामान्य की तरह ही पीड़ित हैं। उसे न आरक्षण का लाभ, न आयु में छूट का पूरा फायदा। यह भेदभाव सिर्फ नौकरी तक नहीं, यह आत्मसम्मान पर चोट है। युवा निराश हो रहे हैं, आत्महत्या कर रहे हैं। परिवार टूट रहे हैं। कहते हैं, कि सरकारें वोट बैंक की राजनीति के लिए सवर्णों को कुचल रही हैं। संविधान के नाम पर यह अत्याचार कब तक? अब चुप नहीं रहेंगे। समान अवसर चाहिए, समान आयु सीमा चाहिए। सामान्य और ईडब्ल्यूएस के युवाओं को भी न्याय चाहिए। अगर संविधान सबको समान कहता है, तो यह भेदभाव क्यों? हम इस देश के बराबर के नागरिक हैं। बहुत सहा है, बहुत प्रताड़ित हुए हैं। अब समय आ गया है कि आवाज उठाएं। शांतिपूर्ण तरीके से, लेकिन दृढ़ता से। समान अधिकार या फिर संघर्ष। यह पीड़ा हर सवर्ण युवा के दिल में है। उठो, जागो, और अपने हक की लड़ाई लड़ो। भारत माता के सच्चे सपूतों, अब समय है न्याय मांगने का। अगर यह संविधान है तो फिर बहु विधान किसे कहते हैं?

‘जाते-जाते’ तुमने कैसा ‘देश’ का हाल ‘बनाया’

बस्ती। कवि साहित्यकार और डाक्टर वीके वर्मा ने बीते साल की बिदाई और नए साल का आगमन पर कविता के जरिए संदेष दिया है। जब जाना तय है तो जाओ, पर जाते क्षण भी हरषाओ, एक साल में जाना ही था, मत आँखों में आँसू लाओ। कभी हँसाया कभी रुलाया। अपना हर जलवा दिखलाया, लेकिन जाते-जाते तुमने कैसा देश का हाल बनाया। सन् पच्चीस की शाम सुहानी, आज लग रही कैसी ज्ञानी।

जाते वक्त संदेशा देती, करो सुबह की तुम अगुवानी। नया वर्ष जो आयेगा, तुमको सुख पहुँचायेगा। नफरत की दीवार ढहाकर गीत प्रेम का गायेगा। तुम पर था संसार फिदा, तुमसे होता आज जुदा। सन् पच्चीस अति हर्षित मन से, तुमको करता आज विदा। नूतन वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ! यह नया साल आपके जीवन में ढेर सारी खुशियाँ, सफलता, स्वास्थ्य और समृद्धि लेकर आए, आपके सभी सपने पूरे हों, और हर दिन नई ऊर्जा व उत्साह से भरा रहे। आपको और आपके परिवार को नव वर्ष 2026 की ढेर सारी बधाई । नये वर्ष की बेला आयी। उर में नई चेतना लायी। कैसा लगता सुखद प्रभात। खुशियों की होती बरसात। वर्मा हुआ तिमिर का नाश। सबके अधरों पर उल्लास। नया वर्ष हर व्यथा हरे। हर मानव को सुखी करे। लाये सबके उर में हर्ष। सुख, समृद्धि लाये यह वर्ष। बरसे सदा प्रेम का छंद। रहे सभी प्राणी सानन्द। नये वर्ष पर मेरे भाई। ‘वर्मा’ देता तुम्हें बधाई।

‘पत्रकारों’ से जुड़ी ‘समस्याओं’ को लेकर ‘ग्रापए’ निरंतर ‘मुखर’ रहाःश्री तिवारी


बस्ती। ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के संस्थापक बाबू बालेश्वर लाल की जयंती गुरुवार को टाटा मोटर्स के गोटवा के सभागार में मनाई गई। संस्थापक के जीवन और संगठन को लेकर किए गए संघर्ष को याद किया गया। गोष्ठी के मुख्य अतिथि संगठन के प्रदेश महामंत्री डॉ संजय द्विवेदी रहे। अध्यक्षता जिला अध्यक्ष अवधेश कुमार त्रिपाठी तथा संचालन जिला महामंत्री विवेक कुमार मिश्र ने किया। श्री द्विवेदी ने कहा कि बाबू बागेश्वर लाल ने ग्रामीण पत्रकारों के लिए इस संगठन की नींव रखी और उनके द्वारा लगाया गया पौधा आज वट वृक्ष के रूप में बड़ी संख्या में प्रदेश और देश के हजारों पत्रकारों को संरक्षण देने का काम कर रहा है।

वह जिस सोच को लेकर के आगे बढ़े थे आज संगठन की सभी जिला, मंडल और प्रदेश की इकाई उसको लेकर आगे बढ़ रही है। आज संगठन उत्तर प्रदेश के साथ आधा दर्जन से अधिक राज्यों में अपना विस्तार कर चुका है। उन्होंने पत्रकार हितों की रक्षा को लेकर हमेशा हर स्तर पर संघर्ष के लिए तैयार रहता है उन्होंने संगठन के आगे के कार्यक्रमों और रणनीति के बारे में भी विस्तार से चर्चा किया। जिलाध्यक्ष ने कहा कि संस्थापक कि यह सोच थी कि जो समाज के अंतिम बिंदु पर मौजूद लोगों की समस्याओं को लेकर जिम्मेदारों तक पहुंचाने का काम करता है। उन ग्रामीण पत्रकारों को सुरक्षा और सम्मान दिलाने के लिए यह संगठन हमेशा खड़ा रहता है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों से जुड़ी समस्याओं को लेकर संगठन लगातार मुखर रहते हुए अपने अधिकार की रक्षा को लेकर सराहनीय प्रयास करता रहता है।
हाल के दिनों में विभिन्न मांगों को लेकर संगठन के प्रदेश नेतृत्व के आवाहन पर जिलाधिकारी, मंडलायुक्त, विधायक और उसके बाद सांसद को ज्ञापन देकर पत्रकारों की समस्याओं और सुविधाओं को लेकर संगठन मुखर हुआ है। कार्यक्रम के अंत में ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के सिद्धार्थनगर जिले के डुमरियागंज तहसील से जुड़े पत्रकार दिलीप श्रीवास्तव के आकस्मिक निधन पर शोक सभा कर श्रद्धांजलि दी गई। गोष्ठी में मुख्य रूप से जिला महामंत्री अनिल कुमार पांडेय, केडी मिश्र, सुरेंद्रनाथ द्विवेदी, मोहम्मद इदरीश सिद्दीकी, बृज किशोर यादव, राम जनक यादव, मोहम्मद शकील, अफजल कुरेशी, राकेश चौधरी, एम जाहिद, सत्यराम, उमेश कुमार दुबे, प्रेम सागर पाठक, महेंद्र उपाध्याय, संजय उपाध्याय, बेचू लाल अग्रहरि, चंद्रेश कुमार दुबे, अरुण मिश्र, अनिल श्रीवास्तव, रामकृपाल दुबे, डीके सिंह, बीके लाल, महेंद्र कुमार सोनी, दिनेश कुमार पटेल, योगेश्वर त्यागी, अरुण कुमार मिश्र, रंजीत पांडेय, रमन शुक्ल, विष्णु कुमार शुक्ल, ओमप्रकाश दुबे, जटाशंकर पांडेय, बृजेश कुमार गुप्ता, विजय कुमार शर्मा, श्रवण कुमार पांडेय, देवेंद्र कुमार, रमेश चंद्र सहित तमाम पत्रकार मौजूद रहे।

Post a Comment

Previous Post Next Post