ईमानदार’ जेई को ‘चोटें’, ‘भ्रष्ट’ एक्सईएन को ‘नोटें’

 ‘ईमानदार’ जेई को ‘चोटें’, ‘भ्रष्ट’ एक्सईएन को ‘नोटें’

बस्ती। बीडीए के तत्कालीन जेई अनिल कुमार त्यागी को जहां उनके ईमानदारी के लिए याद किया जाएगा, वहीं तत्कालीन एक्सईएन पंकज पांडेय को उनकी बेईमानी के लिए जाना जाएगा। एक ही विभाग के दो अधिकारी, एक ने ईमानदारी का मिसाल प्रस्तुत किया, तो दूसरे ने भ्रष्टाचार के नए मापदंड स्थापित किया। भ्रष्ट एक्सईएन को जहां नोटें मिली, वहीं ईमानदार जेई को चोटें। ईमानदार जेई जहां अपने साथ चोटों का जख्म लेकर गए, वहीं भ्रष्ट एक्सईएन नोटों के बंडल के साथ गए। ईमानदार जेई की कोई बिदाई नहीं हुई, और भ्रष्ट एक्सइएन को फूल माला पहनाकर बिदाई दी गई। यह है, बीडीए के भ्रष्ट एक्सईएन और ईमानदार जेई के बीच का अंतर। एक भी अवैध निर्माण करने वाले ने जेई की ईमानदारी को नहीं सराहा, वहीें भ्रष्ट एक्सईएन को न सिर्फ पल्कों पर बैठाया, बल्कि नोटों की गडडी से भी नवाजा। जेई को जहां उनकी ईमानदारी की सजा जांच के रुप में मिली, वहीं बेईमान एक्सईएन को प्रमोषन मिला। बीडीए के लोग ईमानदार जेई को नहीं बल्कि बेईमान एक्सइएन को बहुत याद करते। ईमानदार जेई चिल्लाता रहा कि उसके उपर तीन बार कार्यालय के लोगों ने एक्सईएन के षह पर हमला किया। खुद तो हमला किया ही साथ ही अवैध निर्माण करने वालों से भी करवाया। जेई को रास्ते से हटाने तक कि सुपारी दी गई। इस हमले में कभी उनके कान के पर्दे फट गए, तो कभी हाथ ने काम करना बंद कर दिया, छह माह तक इलाज करवाते रहे, लेकिन पूरी तरह स्वस्थ्य नहीं हो पाए। हमले की जानकारी प्रमुख सचिव, उपाध्यक्ष, सचिव, एक्सईएन और पुलिस से भी की, लेकिन किसी ने भी इनके कराहने की आवाज नहीं सुनी, यहां तक हमला करने वाले पांच मेंटो का नाम भी दिया, लेकिन उन्हें हटाने को कौन कहे, नोटिस तक जारी नहीं किया। कार्रवाई न होने के मामले में भाजपा के एक बड़े नेता का हाथ बताया जाता, इस नेता का नाम भी रिपोर्ट में षामिल है। अपने आप को ईमानदार कहने वाले बीडीए के एक भी सदस्य ने ईमानदार जेई का साथ नहीं दिया। साथ देना तो दूर की बात, बैठकों में आवाज तक नहीं उठाया। अगर यह लोग ईमानदार होते तो इन्हें आवाज उठानी चाहिए थी, इंसाफ का तकाजा तो यही था, इन्हें कम से कम जांच के लिए तो लिखना ही चाहिए। अगर तीन लोग मिलकर बीडीए के भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगा सकते, तो इनके रहने और न रहने का कोई मतलब नहीं। जब भी कोई सदस्य भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाता, दूसरे दिन बीडीए वाले उसके आवास पहुंच जाते, उसके बाद न जाने क्यों आवाज उठाना बंद हो जाता है। अगर तत्कालीन एक्सईएन जिले को लूट कर गए तो इसके लिए बीडीए के तीनों सदस्य भी उतना जिम्मेदार और दोषी हैं, जितना अध्यक्ष, उपाध्याक्ष और सचिव।

अगर बीडीए में भ्रष्टाचार बढ़ा और तत्कालीन एक्सईएन पंकज पांडेय जैसे लोग नोटों से भरा ब्रीफकेष बस्ती से लेकर जाते हैं, तो उसमें सबसे बड़ा योगदान अवैध निर्माण करने वाले धन्ना सेठ है। एक तरह इन लोगों ने मिलकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया। तभी तो एक भ्रष्ट कहे जाने वाले जेई आरसी षुक्ल ने कहा था, अगर कोई नोटों का बंडल आफर करता है, तो उसे क्यों ठुकराया जाए? हैरान करने वाली बात यह रही है, कि धन्ना सेठों को अच्छी तरह मालूम था, कि लाखों देने के बाद भी उनका आवास, प्रतिष्ठान या फिर नर्सिगं होम कभी वैध नहीं हो सकता, फिर भी यह धन्ना सेठ बीडीए पर नोटों का बौझार इस लिए करते रहे कि ताकि उनका अवैध निर्माण किसी तरह पूरा हो जाए। एक भी धन्ना सेठ ने यह नहीं सोचा कि जब उनका मानचित्र स्वीकृति ही नही हो सकता और न कभी यह वैध हो सकता है, तो क्यों बीडीए वालों को मालामाल करें। जितने भी धन्ना सेठों ने पंकज पांडेय सहित अन्य भ्रष्ट बीडीए के लोगों पर नोटों का बौझार किया, उनके पास पैसे की कोई कमी नहीं, जितना भी डिमांड बीडीए वालों ने किया, उससे अधिक यह कहकर दिया कि मेरे अवैध निर्माण में कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए, और न नोटिस ही जारी होना चाहिए। अब जरा आप लोग अंदाजा लगाइए कि जब देने वाला नहीं चिल्ला रहा, तो लेने वाला क्यों परहेज करे? एक भी धन्ना सेठ ने इस बात की षिकायत नहीं किया कि बीडीए वाले उनसे नाजायज धन की मांग कर रहे है। मांगने से पहले ही धन्ना सेठ नोटों की गडडी लेकर पकंज पांडेय जैसे लोगों के पास पहुंच जाते थे। पंकज पांडेय एंड टीम ने सौ से अधिक धन्ना सेठों से षमन षुल्क लेकर इस लिए षमन मानचित्र स्वीकृति किया, कि जो भी अवैध निर्माण का पोर्सन हैं, उसे एक माह में ध्वस्त कर देगें, अपने बचाव के लिए सभी से षपथ पत्र भी लिया। आप लोगों को जानकर हैरानी होगी कि सालों बीत गए, लेकिन एक भी अवैध निर्माण कर्त्ता ने उस पोर्सन को ध्वस्त नहीं किया और न ही बीडीए ही किया, जिसके लिए षपथ-पत्र दिया था। इन षपथ पत्रों के जरिए बीडीए के लोगों ने कम से कम 20 करोड़ कमाया। अब जरा अंदाजा लगाइए कि 20 करोड़ और लगभग 25 करोड़ षमन षुल्क जमा करने के बाद भी धन्ना सेठों का प्रतिष्ठान वैध नहीं हुआ। इसी का जब जेई अनिल कुमार त्यागी ने विरोध किया, तो उन्हें रास्ते से हटाने की साजिष रची गई, जिसमें अवैध निर्माणकर्त्ता भी षामिल रहे। अब जरा अंदाजा लगाइए कि अगर कोई ईमानदार अधिकारी जिले से इस लिए मार खाकर जाता है, कि उसने एक्सईएन पंकज पांडेय जैसे भ्रष्ट लोगों का विरोध किया, तो इससे जिले की छवि पर कितना खराब प्रभाव पड़ेगा, इसे आसानी से सोचा जा सकता है। श्रीत्यागी जेैसे लोग अवष्य जिले की बदनामी घूम-घूम कर करेगें, लेकिन पंकज पांडेय जैसे लोग यह अवष्य कहेगें कि जिला और जिले के लोग बहुत बढ़िया है। बस्ती के धन्ना सेठों ने पंकज पांडेय जैसे भ्रष्ट लोगों को मालामाल करके एक तरह खुद के भ्रष्ट होने का सबूत पेष किया।    

अगले ‘जन्म’ में मोहे ईमानदार ‘एआर’ ‘डीएस’ और ‘सचिव’ पैदा ‘किजो’?

बनकटी/बस्ती। अगर किसानों को सरकारी धान खरीद केंद्रों पर धान बेचना है, तो उन्हें धरना-प्रदर्षन करना होगा, यह हम नहीं बल्कि बनकटी के सैकड़ों धान बेचने वाले किसानों का कहना है, कहते हैं, कि अगर एक दिन पहले वे लोग सजनाखोर समिति के सचिव राम षरन के फर्जी धान खरीद को लेकर धरना-प्रदर्षन नहीं करते तो उनका धान दूसरे दिन नहीं खरीदा जाता। यह संदेष बनकटी के किसानों ने जिलेभर के उन किसानों को दिया, जिनका धान तो सचिव नहीं खरीदते अलबत्ता फर्जी अवष्य खरीदतें है। कहा कि अगर वह लोग धरना-प्रदर्षन नहीं करते तो पीसीएफ के डीएस, नायब तहसीलदार और लालगंज के दरोगा नहीं आते, और न इस बात का आष्वासन देते कि कल से सचिव धान खरीदेगें, इसी आष्वासन के बाद किसानों ने धरना-प्रदर्षन को समाप्त किया, और दूसरे दिन धान की खरीद होने लगी। जिस जिले में किसानों के धरना-प्रदर्षन के बाद धान की खरीद होती हो, उस जिले के डीएम, एडीएम, एआर और पीसीएफ के डीएस पर तो सवाल उठेगें हीं, जिन अधिकारियों पर सवाल उठ रहें हैं, उनसे किसान यह पूछता है, कि आप लोगों के रहने और न रहने से किसानों को क्या लाभ? जब किसानों को औने-पौने दाम में अड़तियों के हाथों बेचना ही है, तो सारे सेंटर को बंद कर दीजिए। किसान अधिकारियों से अधिक उन नेताओं को दोषी और जिम्मेदार मान रहे हैं, जिन लोगों ने किसानों को भ्रष्ट सचिवों और धान खरीद से जुड़े लापरवाह अधिकारियों के हवाले कर दिया। किसान भाजपा के उस टीम 11 पर भी सवाल उठा रहें हैं, कि आखिर टीम 11 क्या कर रही है? क्यों नहीं फर्जी धान खरीद को रोक रही है? और क्यों नहीं असली किसानों से धान खरीदने पर काम कर रही है? किसान उन पीसीएफ के डीएस और एआर को भी जिम्मेदार मान रही है, जो लोग लाखों लेकर पहले दागी सचिवों को धान खरीद प्रभारी बनाते हैं, और उसके बाद प्रति क्ंिवटल 100 रुपया लेकर बंदरबांट करते है। किसानों का कहना है, कि इन्हीं लालची अधिकारियों के चलते जिले में अब तक का सबसे बड़ा धान का घोटाला हुआ। उसके बाद भी जिम्मेदार नहीं जाग रहें हैं। कहा भी जाता है, कि जब तक जिम्मेदार सेंटर बेचना और प्रति क्ंिवटल 100 रुपया लेना नहीं छोड़ेगें, तब तक असली किसानों को अपना धान बेचने के लिए धरना-प्रदर्षन करना ही पड़ेगा। फर्जी धान खरीदना सचिवों की मजबूरी कहा जा सकता हैं, अगर वह फर्जी न खरीदे तो कैसे सेंटर का लाखों देगें और कहां से 100 रुपया प्रति क्ंिवटल बखरा देंगें? यह भी सवाल उठ रहा है, कि आखिर सचिव क्यों सेंटर बनाने के नाम पर बड़ी रकम देते हैं? और क्यों 100 रुपया प्रति क्ंिवटल बखरा देते हैं? कहा भी जाता है, कि जिस दिन सचिव सेंटर बनाने के नाम पर पैसा देना बंद कर दिया, उस दिन कईयों की दुकाने बंद हो जाएगी। आखिर किसी न किसी सचिव को तो सेंटर प्रभारी बनाना ही पड़ेगा। एक भी ऐसा सचिव सामने नहीं आया, जिसने यह कहा हो कि मैं पैसा नहीं दूंगा, भले ही चाहे सेंटर प्रभारी बनाइए या न बनाइए, और न ही सचिवों के संगठन के किसी पदाधिकारी ने ही कभी विरोध किया। जो पदाधिकारी अपने आप को सबसे बड़ा ईमानदार कहते हैं, वही सबसे बड़ा बेईमान निकलता। यह लोग इतना चालाक होते हैं, कि अपना कभी नहीं घोटाले में फंसते, यह लोग किसी और के नाम पर तिजोरी भरते हैं, और जब कभी वह फंस जाता है, तो पल्ला झाड़ लेते है। एआर और पीसीएफ के डीएस की ओर से भी ईमानदारी नहीं दिखाई दे रही हैं, ईमानदारी दिखाई दे तो कैसे? जब खुद बेईमान हैं। इतने बड़े धान घोटाले के बाद यह माना जाता था, कि अब तो पीसीएफ के डीएस और एआर कोई सबक लेगें, धन और राजनैतिक बल पर एआर तो कार्रवाई से बच गए, लेकिन कम से कम पीसीएफ के डीएस कैलाष कुषवाहा को तो पूर्व के डीएस अमित चौधरी से कुछ सबक लेना चाहिए था। दिक्कत यह है, कि जिस भी अधिकारी या फिर सचिव के खून में भ्रष्टाचार समा गया, वह चाहकर भी ईमानदारी नहीं बरत सकता। डीएम और एडीएम भले ही चाहे धान खरीद को पारदर्षी होने की बातें कहें, लेकिन सच्चाई वह हैं, जो किसान कह रहें है। वरना डीएम और एडीएम के रहते किसी की क्या मजाल कि वह एक क्ंिवटल भी फर्जी धान और गेहूं खरीद सके? किसानों के उस बात में दम लगता हैं, जिसमें यह कहा जाता हैं, कि जब तक सचिव संघ के पदाधिकारी ईमानदार नहीं होगें, तब तक उन्हें धान बेचने के लिए धरना-प्रदर्षन करना पड़ेगा। किसानों का कहना है, कि हो सकता है, कि अगले जन्म में जब सचिव, एआर और डीएस ईमानदार पैदा होगें, तो हो सकता है, कि उन्हें धरना-प्रदर्षन न करना पड़ें। इस जन्म में तो संभव ही नहीं।

‘सचिवजी’ यह ‘धन्ना सेठों’ की नहीं, ‘समाज’ सेवा ‘की’ संस्था!

बस्ती। रेडक्रास सोसायटी की दो जनवरी 26 को होने वाली पदाधिकारी और कार्यकारिणी सदस्यों की पहली बैठक से पहले ही सवाल खड़े होने लगे। अनेक सदस्यों और पदाधिकारियों का कहना है, कि भाई यह रेडक्रास सोसायटी संस्था हैं, कोई धन्ना सेठों की संस्था नहीं हैं, बल्कि समाज सेवा वाली संस्था है। सदस्यों का कहना है, कि अगर यही बैठक होटल के बजाए कलेक्टेट सभागार में होती तो रेडक्रास सोसायटी के धन का दुरुपयोग नहीं होता। जो बैठक एक सभागार में या फिर प्रेस क्लब में हो सकती थी, वह बैठक क्यों होटल में आयोजित की जा रही है। दूसरा सवाल यह उठ रहा है, कि बिना अध्यक्ष के कार्यकारिणी की बैठक नहीं बुलाई जा सकती। ऐसा लगता है, कि मानो बैठक बुलाने से पहले इस पर होमवर्क नहीं किया गया। अगर किया गया होता तो सवाल न खड़े होते। पता नहीं नई कार्यकारिणी को विवादों में रहना इतना क्यों पसंद है। मानो विवादों से पदाधिकारियों का कोई गहरा संबध हो, तभी तो विवाद पैदा होते रहते है। सचिव रेडक्रास सोसायटी के सचिव रंजीत श्रीवास्तव की ओर से जारी बैठक की सूचना में कहा गया है, कि यह बैठक रेडक्रास की गतिविधियों को सक्रिय रुप से आगे बढ़ाने एवं समाज में रेडक्रास को सकारात्मक दिषा देने के लिए दो जनवरी 26 को होटल प्रकाष में षाम छह बजे से सात बजे तक आहुत किया गया। बैठक का मकसद रेडक्रास सोसायटी को गतिषील देने के लिए सदस्यों का विचार आवष्यक है। ताकि रेडक्रास के कार्यो को सकारात्मक गति प्रदान की जा सके। बेैठक कराने की पहल का स्वागत हो रहा हैं, कहरा जा रहा है, कि सभी सदस्यों की मंषा रेडक्रास के जरिए समसज के गरीबों एवं असहाय लोगों की सहायता करना है। रेडक्रास के जरिए जितनी भी असहाय लोगों की मदद होगी उतना ही रेडक्रास सोसायटी का मकसद हल होगा। रेडक्रास सोसायटी के जिम्मेदारों का इस बात का विषेष ध्यान रखना होगा, कि रेडक्रास सोसायटी के धन का दुरुपयोग न होने पाए। क्यों कि आज भी रेडक्रास सोसायटी से जुड़कर लोग अपने आप को गौरन्वित महसूस करते है। यह सबकी जिम्मेदारी है, कि रेडक्रास सोसायटी पर कोई अगुंली न उठा सके। यह संस्था किसी एक व्यक्ति या कुछ लोगों से नहीं बल्कि उन सैकड़ों लोगों के अटूट विष्वास और आत्मीय संबध होने के कारण चल रहा है, यह वही लोग हैं, जिन्हांेने कोराना काल में भी अपनी जान की परवाह किए बिना जरुरतमंदों की मदद कली। यह वही लोग हैं, जो हमेषा तन, मन और धन से असहायों एवं गरीबों की मदद करने के लिए तैयार रहते है।

‘उदय शंकर शुक्ल’ संगठन को ‘मनमानी’ रुप से चला ‘रहें’!

बस्ती। सभी पदों से बर्खास्त किए गए परसरामपुर के ब्लॉक अध्यक्ष देवेन्द्र कुमार वर्मा ने कहा कि उदय षंकर षुक्ल संगठन को मनमानी रुप से चला रहें हैं, कहा कि बिना उनका पक्ष सुने उन्हें बर्खास्त कर देने का निर्णय पूरी तरह से अलोकतांत्रिंक है। शिक्षक इसे स्वीकार नहीं करेंगे। आक्रोशित शिक्षकों ने जिलाध्यक्ष के इस निर्णय को मानने से इनकार कर दिया। उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ में सब कुछ ठीक ठाक नहीं है। 11वीं बार जिलाध्यक्ष चुने गये उदयशंकर शुक्ल जहां अपना अभिनन्दन करा रहे हैं वहीं विकास क्षेत्र परसरामपुर के ब्लॉक अध्यक्ष देवेन्द्र कुमार वर्मा को उनके पद से बर्खास्त कर दिये जाने को लेकर शिक्षकों में रोष है। देवेन्द्र कुमार वर्मा की बर्खास्तगी के विरोध में मंगलवार को शिक्षकों की आकस्मिक बैठक परसरामपुर ब्लाक पर हुई और मांग किया गया कि बर्खास्तगी को वापस लेकर पारदर्शी ढंग से चुनाव कराया जाय। कहा कि मुझे व्यक्तिगत रंजिश में निराधार आरोप लगाते हुए बर्खास्त किया गया है।



ब्लॉक के शिक्षक इस निर्णय से आहत और आक्रोशित हैं। संगठन को व्यक्तिगत मनमानी के बजाय उसके बायलॉज के अनुसार चलाया जाये। शिक्षकों ने आरोप लगाया कि जिलाध्यक्ष ने अलोकतांत्रिक तरीके से बिना किसी नोटिस अथवा पक्ष सुने बिना ब्लॉक अध्यक्ष को मनमानी तरीके से बर्खास्त किया गया है। शिक्षकों का कहना है कि द्वेषवश ये कार्यवाही की गई है और ब्लॉक अध्यक्ष पर झूठे आरोप लगाए गए। बैठक में उपस्थित शिक्षकों ने जिला कार्यकारिणी को पत्र लिखकर मांग किया कि यह अलोकतांत्रिक निर्णय तत्काल वापस लिया जाए और ब्लॉक में पारदर्शी व्यवस्था से चुनाव कराया जाए। बैठक में ब्लॉक उपाध्यक्ष अरविन्द पाण्डेय, पंच बहादुर यादव, विवेकानन्द वर्मा, हरिश्चन्द्र यादव, सत्य प्रकाश पाठक, शोभाराम वर्मा, अजय कुमार पाण्डेय, हरि मूर्ति चौधरी, कोषाध्यक्ष दिनेश कुमार वर्मा, संयुक्त मंत्री विजय कनौजिया, भरत राम, रामपति कनौजिया, पांचू प्रसाद, राम दयाल, पवन सिंह, बलराम वर्मा, रामजीत वर्मा, राहुल वर्मा, काशी प्रसाद, रमेश वर्मा, विनोद कनौजिया, विजय कुमार वर्मा, रोशन लाल, कमलेश पाण्डेय, दिलीप गुप्ता के साथ ही बड़ी संख्या में शिक्षक उपस्थित रहे।

‘सांसद’ से मिला ‘ग्रापए’, सौंपा ‘ज्ञापन’

बस्ती। ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन प्रदेश नेतृत्व के आवाहन पर मंगलवार को अपनी मांगों के समर्थन में जिलाध्यक्ष अवधेश कुमार त्रिपाठी के नेतृत्व में पत्रकारों ने सांसद राम प्रसाद चौधरी को मुख्यमंत्री को संबोधित सात सूत्रीय ज्ञापन सौंपा। जिलाध्यक्ष नें सांसद को बताया कि प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ सिंह के आवाहन पर संपूर्ण प्रदेश के 80 सांसदों को पत्रकार हितों की सुरक्षा हेतु ज्ञापन सौंपने का कार्यक्रम रखा गया है। श्री त्रिपाठी ने पत्र को पढ़ कर सांसद को अवगत कराया हुए मांग किया कि सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा तहसील स्तर पर कार्य करने वाले दैनिक समाचार पत्रों के संवाददाताओं को मान्यता प्रदान करने के लिए आदेश निर्गत किया जाए।



इसी के साथ पत्रकार हितों की रक्षा के लिए जिला स्तरीय स्थाई समिति की नियमित बैठकर कराई जाए, साथ ही मंडल मुख्यालय पर मंडलायुक्त की अध्यक्षता में और तहसील स्तर पर उपजिलाधिकारी की अध्यक्षता में स्थाई समिति का गठन किया जाए और उसमें ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के अध्यक्ष को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में सम्मिलित किया जाए। सरकार द्वारा ग्रामीण पत्रकारों को आयुष्मान कार्ड की सुविधा से आच्छादित किए जाने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बसों में निःशुल्क यात्रा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। प्रदेश स्तर पर गठित पत्रकार मान्यता समिति एवं विज्ञापन मान्यता समिति में ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन उत्तर प्रदेश के दो प्रतिनिधियों को भी सदस्य के रूप में सम्मिलित किया जाए। संगठन के प्रदेश कार्यालय हेतु दारुलसफा लखनऊ में निरूशुल्क भवन उपलब्ध कराया जाए। साथ ही ग्रामीण पत्रकारों के समस्याओं के समाधान हेतु ग्रामीण पत्रकार आयोग का गठन किया जाए और पत्रकारिता कार्य करते समय अगर कोई विवाद की स्थिति बनती है और पत्रकारों के ऊपर मुकदमा पंजीकृत होता है तो उसके पहले किसी सक्षम राजपत्रित अधिकारी से जांच करने का आदेश निर्गत किया जाए। सांसद ने कहा कि पत्रकार हितों के उक्त मांगों के समर्थन में मुख्यमंत्री को पत्र लिखेंगे। उन्होंने कहा कि यदि प्रदेश में समाजवादी की सरकार बनी तो ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन की सभी मांगों को अविलंब पूरा किया जाएगा। इस मौके पर बेचूलाल अग्रहरि, जिला महामंत्री विवेक कुमार मिश्र, अनिल कुमार पाण्डेय, कुलदीप सिंह, जनार्दन पाण्डेय, के डी मिश्र, एस एन द्विवेदी, शमशेर बहादुर सिंह, राजेश सिंह, सत्यराम, सत्यदेव शुक्ल, संजय मिश्र, राम कृपाल दूबे, सुनील कुमार बरनवाल, विष्णु कुमार शुक्ल, सोनू दुबे, रवि उपाध्याय, महेंद्र उपाध्याय, संजय उपाध्याय, एम जाहिद, सूरज मिश्र, राजेश राय, राजाराम, मोहम्मद इदरीस सिद्दीकी, आलोक मिश्र, रमन शुक्ल, हेमंत पाण्डेय, ओम प्रकाश दुबे सहित तमाम पत्रकार मौजूद रहे।

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