सब ‘गोलमाल’ है, ‘भाई’ सब ‘गोलमाल’
सब ‘गोलमाल’ है, ‘भाई’ सब ‘गोलमाल’
-कप्तानगंज के पटखौली के प्रधान मनोज कुमार दूबे, सचिव उदितांषु षुक्ल, पंचायत सेवक सतीष कुमार दूबे एवं रोजगार सेवक राम सरन ने मिलकर किया लाखों का घोटाला, लेकिन न प्रधानी गई और न किसी के खिलाफ दर्ज हुआ मुकदमा
बस्ती। योगीराज में किसी भी भ्रष्टाचारी के खिलाफ षिकायतकर्त्ताओं के लिए कार्रवाई करवाना आसान नहीं होता। कार्रवाई न होने से भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लग रहा है। पहले तो कोई गांव वाला प्रधान और सचिव की षिकायत करने को यह कहकर तैयार नहीं होता कि कौन जाए गांव में रहकर प्रधान से दुष्मनी मोल लेना? लोगों के मन में यह न जाने क्यों घर कर गई है, कि योगी के राज में कार्रवाई नहीं होगी। इसके बाद भी अगर किसी ने हिम्मत दिखाया तो उसे अनेक धमकियों का सामना करना पड़ता है। षिकायत वापस लेने का दबाव बनाया जाता है, लालच तक दिए जाते हैं, कुछ लोग तो लालच में आ भी जाते हैं, और जो नहीं आते उन्हें अनेक समस्याओं से गुजरना पड़ता है। कुछ लोग जब गांव से लेकर कमिष्नर, डीएम, सीडीओ और डीपीआरओ के यहां चक्कर लगा-लगा कर थक जाते हैं, तो यह कहकर घर बैठ जाते कि लूटने दीजिए, जितना लूटना चाहें, जब सरकार ही ही लुटवा रही है, तो षिकायतकर्त्ता क्या करें? कभी-कभी तो षिकायत जांच और कार्रवाई करने में प्रधान का कार्यकाल ही पूरा हो जाता है, षिकायतकर्त्ता की मंषा धरी की धरी रह जाती हैं, प्रधान अलग चिढ़ाता है, कि चले थे प्रधानी लेने। अंत में षिकायतकर्त्ता हाथ मलकर रह जाता है। अधिकतर प्रधान मनरेगा और ग्राम निधि का धन हड़प-हड़प कर आर्थिक रुप से इतना मजबूत हो गएं हैं, कि वह जांच अधिकारी तक को खरीदने की हेैसियत रखते है। जांच अधिकारियों का बिकना लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक माना जाता है। चूंकि जांच अधिकारियों के खिलाफ कोई भी कमिष्नर और डीएम कार्रवाई करने से बचना चाहते है। इस लिए जांच अधिकारी जैसा चाहते हैं, वैसा रिपोर्ट लगा देते हैं, अधिकांष जांच रिपोर्ट या तो लंबित रख दिया जाता है, या फिर भ्रमित वाली रिपोर्ट कर दी जाती है। यह सब कुछ प्रधानों के पैसे का कमाल होता है। अगर जांच पूरी होने और रिपोर्ट देने में महीनों लगता है, तो समझ लेना चाहिए की दाल अवष्य काली है। इसी तरह की एक जांच कप्तानगंज के ग्राम पटखौली ग्राम पंचायत की षिकायतकर्त्ता विजय कुमार यादव के षिकायत पर हुई। जांच रिपोर्ट के अनुसार मनरेगा और ग्राम निधि का लगभग 15-16 लाख का घोटाला प्रधान मनोज कुमार दूबे, सचिव उदितांषु षुक्ल, पंचायत सेवक सतीष कुमार दूबे एवं रोजगार सेवक राम सरन ने मिलकर किया। प्रधान ने तो मनरेगा के मजदूरों का पैसा अपने खाते में भेजने का मामला सामने आया। मनरेगा से बनाए गए दो बंधे ऐसे पाए गए, जो पहले से बना था, और उसपर बिना कार्य कराए लाखों का भुगतान कर दिया। जांच रिपोर्ट दिए लगभग चार माह होने को हैं, लेकिन अभी तक षिकायतकर्त्ता को कार्रवाई के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई, कोई यह बताने को तैयार नहीं कि जब जांच में घोटाला साबित हो गया तो क्यों नहीं कार्रवाई हो रही है? चूंकि प्रधान के खिलाफ कार्रवाई करने और पावर सीज करने का अधिकार डीएम को इस लिए जब तक डीपीआरओ की ओर से कार्रवाई की पत्रवाली डीएम के पास नहीं जाएगी, तबतक कोई कार्रवाई नहीं होगी। डीपीआरओ कार्यालय से पता चला कि कार्रवाई करने के लिए डीएम को पत्रावली भेजी जा रही है। अगर जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई हो गई तो प्रधान का पावर सीज हो सकता है, सचिव, रोजगार सेवक और पंचायत के खिलाफ एफआईआर के साथ रोजगार सेवक और पंचायत सहायक की नौकरी तक जा सकती हैं, सचिव निलंबित हो सकते है। ऐसी ईमानदारी वाली जांच रिपोर्ट बहुत कम देखने को मिलती है। जिस तरह 15वां, पंचम और राज्य वित्त आयोग के निधियों और मनरेगा के धन का खुले आम और संगठित होकर बंदरबांट किया गया, उससे पता चलता है, किसी को कोई भी डर नहीं रह गया, वैसे पूरा कप्तानंगज ब्लॉक ही भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। जिस ब्लॉक की बागढोर नकली प्रमुखों के हाथ में हो वह ब्लॉक कैसे भ्रष्टाचार मुक्त हो सकता है।
स्थलीय और अभिलेखीय जांच में जून-जुलाई 25-26 में सेमरा सरहद से दुबौली सरहद तक बंधा निर्माण के नाम पर 9.14 लाख स्वीकृति हुआ, जिसमें 8.58 लाख भुगतान भी हुआ, लेकिन बंध्रो पर कोई नया काम नहीं कराया गया, जो भी कराया गया, वह पुराना हैं। इसी तरह जुलाई-अगस्त 25-26 में करचोलिया सरहद से षत्रुघन के बाग तक बंधा निर्माण के लिए 9.47 लाख की कार्ययोजना बनी, 4.55 लाख का भुगतान भी हुआ, लेकिन भुगतान पूरी तरह फर्जी हुआ, क्यों कि कोई काम नहीं कराया। काम करते समय जिन श्रमिकों का फोटो अपलोड किया गया, वह एक ही श्रमिक और बार-बार लगाया गया। इसी तरह जब 15वां, पंचम और राज्य वित आयोग के निधियों की जांच हुई तो सभी में गोलमाल मिला। हैरान करने वाली बात यह है, कि मजदूरी का पैसा सचिव के सहयोग से प्रधान ने अपने खाते में नीजि धन समझकर जमा किया। यही वह आरोप हैं, जिसमें प्रधान का पावर सीज हो सकता है।
‘रेप’ की शिकार ‘नाबालिग’ कीे ‘सुसाइड’ का जिम्मेदार ‘कौन’ लालगंज ‘पुलिस’ या ‘रेपिस्ट’?
बस्ती। जिले की पुलिस का कोई जबाव नहीं, यहां की पुलिस ‘एक केले के पेड़ की चोरी का वायरल वीडियो’ पर तो पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लेती है, लेकिन बलात्कार की षिकार नाबालिग लड़की के सुसाइड करने का मुकदमा दर्ज नहीं करती। क्या यही है, बस्ती पुलिस की पहचान? लड़की के परिवार वालों का कहना है, कि लालगंज की पुलिस अगर उनकी षिकायत पर आरोपी अरविंद, मिथुन, षक्तिमान और उसकी माता के खिलाफ समुचित कार्रवाई कर देती तो मेरी बेटी लोकलाज के डर से फंासी न लगाती। सवाल उठ रहा है, कि एक 15 साल की उस लड़की के आत्महत्या करने का जिम्मेदार कौन, जिसका बार-बार बलात्कार किया गया और जिसने लोकलाज के डर से आत्महत्या कर लिया? देखा जाए तो इसके लिए लालगंज पुलिस, बलात्कारी और बलात्कारी का वह परिवार, जिसने अपने नालायक लड़के को दोषी मानने के बजाए लड़की को ही आवारा और बदचलन करार दे दिया जिम्मेदार हैं? सुसाइड करने के बाद मृतका की माता थाने का चक्कर लगाती रही, लेकिन लालगंज पुलिस ने लड़की के माता की न तो पीड़ा को समझा और न दर्द को महसूस किया। अगर सुन लेती तो माता को केस दर्ज करवाने के लिए अधिवक्ताओं और पुलिस के अधिकारियों के पास न जाना पड़ता। आरोपी आज खुले आम न घुमते जेल के पीछे होते। तत्कालीन एसपी तक से महिला मिली, फिर भी उसे न्याय नहीं मिला। 19 फरवरी 26 को जब मीडिया ने नवागत एसपी को इसकी जानकारी दी, तब एसपी ने कहा कि जाइए आज मुकदमा दर्ज हो जाएगा। खबर लिखे जाने तक मुकदमा दर्ज नहीं हुआ था।
लालगंज पुलिस पर बराबर अपराधियों और आरोपियों का साथ देने का आरोप लगता रहा है। इस थाने की पुलिस पर अपराधियों का दिलखोलकर स्वागत करने और फरियादी और पीड़ितों का अपमान एवं दुत्कारने का आरोप लगता रहा है। ऐसा लगता है, कि मानो यहां की पुलिस को बदमाषों और बलात्कारियों का विषेष ध्यान रखने के लिए प्रषिक्षण दिया गया है। जिस तरह इस थाने में समाज और सरकार के दुष्मनों का आवभगत किया जाता हैं, अगर उसका दस फीसद भी पीड़ितों और फरियादियों पर अपना प्यार लुटाती, तो आज पुलिस पर पक्षपात करने का आरोप न लगता। क्षेत्र के लोगों का कहना है, कि बहुत कम ऐसा देखा गया है, कि थाने की पुलिस ने अपनी जिम्मेदारी को पूरी तरह निभाया हो। कहते हैं, कि जिस थाने पर पीड़ित हाथ जोड़े खड़ा रहता हो और उसके सामने आरोपी को कुर्सी पर बैठाया जाता हो, उस थाने के बारे में कुछ भी कहा जा सकता है। इस थाने पर उच्चाधिकारियों के आदेष और निर्देषों का बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ता, थानेदार को जो अच्छा और लाभकारी लगता है, वही करते है। हालांकि कमोवेष यही हालत अन्य थानों और कोतवाली की भी है। एक भी थानेदार ने लालगंज थाने को आइडिएल बनाने का प्रयास नहीं किया। तभी तो थानेदार के तबादला होने के बाद क्षेत्र के लोग दुखी नहीं होते और न ढ़ोल बाजे से बिदाई ही करते। बहुत कम ऐसे थानेदार होगें जिनके जाने के बाद क्षेत्र के लोग उन्हें याद किए हों। याद करने के बजाए यह कहते हैं, कि चलो अच्छा हुआ चला गया। उन लोगों ने अवष्य याद किया जो लोग थानेदार की नजर में प्रिय रहें हो, ऐसे प्रिय लोगों में सबसे अधिक अपराधी और बदमाष किस्म के लोग ही रहें है।
अब हम आप को बताते हैं, कि एक 15 साल की लड़की ने क्यों आत्महत्या किया। लड़की को खोने वाली माता ने रो-रो कर बताया कि उसकी लड़की बनकटी के सरकारी स्कूल में पढ़ती थी, कहा कि कुछ दिन पहले षक्तिमान पुत्र पंजाबी निवासी जोगिया उर्फ मरवटिया थाना लालगंज गांव के सीवान में मेरी लड़की के साथ बलात्कार किया, और वीडियो भी बनाया। बताया कि डर के माने लड़की ने पढ़ाई तक छोड़ दिया। जब इसकी षिकायत लड़के की माता, भाई अरविंद और मिथुन से किया तो लड़के को समझाने बुझाने के बजाए, मेरी लड़की को ही आवारा और बदचलन बनाते हुए मारने के लिए दौड़ा लिया। जिससे लड़के का मन बढ़ता गया। वह बराबर वीडियो वायरल करने का डर दिखा कर लड़की के साथ बलात्कार करता रहा। इसकी षिकायत पुलिस से भी किया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। बताया कि 19 जनवरी 26 को वह रिष्तेदारी में गई थी, तभी षक्तिमान घर के थोड़ी दूर पर खेत में मेरी लड़की के साथ गलत हरकत किया। जब मैं फिर लड़के के घर गई और रो-रो कर बताया, तो मुझे ही गाली देते हुए मारने के लिए दौड़ा लिया। इससे दुखी होकर मेरी लड़की ने 20 जनवरी 26 को घर में फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। कहा कि वह फिर पुलिस के पास केस दर्ज करवाने के लिए गई, लेकिन केस दर्ज नहीं किया गया। कहा कि लड़की की मौत के बाद से ही न्याय पाने के लिए इधर-उधर भटक रही है। अधिवक्ता के जरिए तत्कालीन एसपी को दिए गए आवेदन में लड़की के मौत के जिम्मेदार अरविंद, मिथुन, षक्तिमान और उसकी माता के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने और न्याय दिलाने की मांग की। षक्तिमान का मोबाइल नंबर 7837584838 देते हुए कहा कि अगर इसका सीडीआर निकाला जाए तो सच्चाई सामने आ जाएगी। अब देखना यह है, कि क्या लालगंज की पुलिस नवागत एसपी के आदेष पर मुकदमा दर्ज करती है, या फिर पुराने एसपी के आदेष की तरह उसे रददी की टोकरी में डालती है।
‘पत्रकारों’ के ‘परिजन’ को ‘लगा’ फ्री हेल्थ ‘कैंप’
बस्ती। प्रेस क्लब में पत्रकारों और उनके परिजन के लिए फ्री हेल्थ कैंप का आयोजन हुआ। इस कैंप में 120 लोगों का उपचार, शुगर, वी.पी., हीमोग्लोबिन की जांच के साथ ही निःशुल्क एलोपैथ और होम्योपैथ की दवायें उपलब्ध करायी गयी। पत्रकारों ने इस सफल आयोजन के लिए इसे सफल बनाने में सहयोग करने वालों को बधाई दी है। यह आयोजन प्रेस क्लब क्लब अध्यक्ष विनोद कुमार उपाध्याय और महामंत्री महेंद्र तिवारी की अगुवाई में हुआ। प्रेस क्लब के पदाधिकारियों के संयोजन में हुए इस कार्यक्रम की चर्चा हो रही है, और कहा जा रहा है, प्रेस क्लब ने इस तरह का पहल करने बहुत ही सरायनीय कार्य किया। पत्रकारों और उनके परिजन के लिए निःशुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया। क्लब अध्यक्ष विनोद कुमार उपाध्याय और महामंत्री महेन्द्र तिवारी ने बताया कि पत्रकारों उनके परिजनों के बेहतर स्वास्थ्य के लिये समय-समय पर शिविर कराये जाते हैं।
चिकित्सा शिविर में पटेल एस.एम.एच. हास्पिटल के प्रबंधक एवं जिला चिकित्सालय के आयुष चिकित्साधिकारी डा. वी.के. वर्मा, डा. राजेश चौधरी, डा. एस.के. त्रिपाठी, डा. अतुल श्रीवास्तव, डा. कमल वर्मा, डा. एच.आर.वर्मा, डा. नरेन्द्र चौधरी, डा. राजेश पटेल के साथ ही स्वास्थ्य कर्मी जिला अस्पताल की अंजू सिंह, कीर्ति आनन्द, इमरान, संजय, अभिषेक के साथ ही पटेल एस.एम.एच. हास्पिटल गोटवा के मनीष चौधरी, विकास चौधरी, मनीष राना, आदर्श गुप्ता, शंकर यादव, जग प्रसाद, चित्रसेन पाण्डेय आदि ने योगदान दिया। निःशुल्क चिकित्सा शिविर को सम्पन्न कराने में प्रकाश चन्द्र गुप्ता, वशिष्ठ पाण्डेय, राघवेन्द्र प्रसाद मिश्र, राजेश पाण्डेय, विपिन बिहारी त्रिपाठी, संजय विश्वकर्मा, सर्वेश श्रीवास्तव, राजेन्द्र उपाध्याय पदाधिकारियों के साथ ही जयन्त मिश्र, पुनीत ओझा, अमर सोनी, अनिल पाण्डेय, ऋतिक कुमार, आनन्द गौतम, राकेश त्रिपाठी आदि ने योगदान दिया।
‘मकान’ मालिक ‘आउट’, किराएदार ‘इन’
बस्ती। जो किराएदार अपने आप को मकान का मालिक समझकर कब्जा करना चाहते हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए, कि किराएदार हमेषा किराएदार ही रहेगा, वह कभी मालिक नहीं बन सकता है। जिसने भी मालिक बनने का प्रयास किया उसे मुंह की खानी पड़ी। कानून भी कभी किराएदार को मकान मालिक का दर्जा नहीं देता। इसी तरह मकान मालिक बनने का ख्वाब देखने वाले किरायेदार रत्नेश शुक्ला, अनुराग शुक्ला तथा संजय सिंह का नाम सामने आया। कोतवाली थाना क्षेत्र के पिकौरा दत्तू राय निवासी मकान संख्या 143 के स्वामी विख्यात रंजन उर्फ अभिमन्यु, पुत्र स्वर्गीय राम प्रसाद श्रीवास्तव ने पुलिस अधीक्षक को प्रार्थना पत्र देकर आरोप लगाया है कि उनके मकान में रह रहे किरायेदार रत्नेश शुक्ला, अनुराग शुक्ला तथा संजय सिंह उनकी असहाय स्थिति का लाभ उठाकर मकान पर अवैध कब्जा करना चाहते हैं।
विख्यात रंजन उर्फ अभिमन्यु ने एसपी को दिये पत्र में कहा है कि वे माता-पिता के निधन के बाद अकेले रहते हैं और लगातार मिल रही धमकियों के कारण अपने ही घर में रहने से वंचित हैं। उन्होंने बताया कि पूर्व में थाना कोतवाली में शिकायत करने पर दोनों पक्षों को बुलाया गया था, जहाँ किरायेदारों ने मकान खाली करने के लिए कोतवाली में लिखित रूप में 2 से 3 माह का समय माँगा था, किन्तु तीन माह से अधिक समय होने के बाद भी मकान खाली नहीं कर रहे हैं। पीड़ित का कहना है कि पहली नवम्बर 2025 को थाना कोतवाली में एफआईआर भी दर्ज कराई गई, परंतु अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई और न ही उन्हें सुरक्षा उपलब्ध कराई गई है। विख्यात रंजन उर्फ अभिमन्यु ने बताया वे घर मे पूरी तरह अकेले है और अपने ही घर में रहने से डर रहे है। किरायेदार मुझे लगातार जान से मारने की धमकी दे रहे हैं और मकान पर कब्जा करना चाहते हैं। उन्होने कई बार पुलिस से शिकायत की, एफआईआर भी दर्ज है, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अगर उनके साथ कोई अप्रिय घटना होती है तो उसकी जिम्मेदारी संबंधित लोगों की होगी। पीड़ित ने प्रशासन से तत्काल कठोर वैधानिक एवं दंडात्मक कार्रवाई करते हुए मकान खाली कराने और व्यक्तिगत सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग की है।




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