सीएमओ’ ने की ‘उमेश गोस्वामी’ को ‘आगरा’ भेजने की ‘तैयारी’!

 ‘सीएमओ’ ने की ‘उमेश गोस्वामी’ को ‘आगरा’ भेजने की ‘तैयारी’!

-सीएमओ और उनकी टीम के ‘भ्रष्टाचार’ का ‘उजागर’ करने वाले ‘उमेष गोस्वामी’ को ‘सीएमओ’ ने ‘पागल’ घोषित किया, डीएम को लिखकर दिया कि इनकी मानसिक स्थित ठीक नहीं जिसके चलते यह निराधार षिकायत करते रहते, इस लिए इनकी षिकायत पर कोई ध्यान न दिया जाए

-अगर सीएमओ और उनकी टीम की नजर में षिकायतकर्त्ता उमेष गोस्वामी पागल है, तो फिर एमएलसी प्रतिनिधि हरीष सिंह और चंद्रेष प्रताप सिंह भी पागल की श्रेणी में आने चाहिए, क्यों कि इन दोनों ने सर्वाधिक सीएमओ और उनकी टीम के भ्रष्टाचार की षिकायत बस्ती से लेकर लखनउ तक किया

-सीएमओ डा. राजीव निगम को लाला लिखना भी इनके टीम को नागवार लगा, जिसे उमेष गोस्वामी ने स्पष्ट किया, कि निगम, एससी भी होते हैं, और लाला भी

बस्ती। सीएमओ और उनकी टीम के भ्रष्टाचार पर निरंतर हमला करने वाले भाकियू के उपाध्यक्ष उमेष गोस्वामी को जब यह लोग नहीं खरीद पाए तो उसे चुप कराने के लिए पूरी टीम ने मिलकर बिना मेडिकल जांच के पागल घोषित कर दिया। अब उमेष को यह लोग मिलकर पागलखाना भेजने की तैयारी कर रहे है। इससे पहले आरटीआई कार्यकर्त्ता सुदृष्टि नरायन त्रिपाठी को भी यह लोग जेल भेजवा चुके हैं। बस अब उमेष को पागल खाना भेजवाने को रह गया। इसी लिए मीडिया और जनता बार-बार कह रही है, कि योगीराज में जिसने भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाया वह या तो जेल में नजर आया या फिर पागल करार दे दिया गया। अगर सीएमओ और उनकी टीम की नजर में षिकायतकर्त्ता उमेष गोस्वामी पागल है, तो फिर एमएलसी प्रतिनिधि हरीष सिंह, भाकियू भानु गुट कें मंडल प्रवक्ता चंद्रेष प्रताप सिंह और रफीउदीन जैसे भी पागल की श्रेणी में आना चाहिए, क्यों कि इन लोगों ने भी सीएमओ और उनकी टीम के भ्रष्टाचार को बस्ती से लेकर लखनउ तक उजागर किया। षिकायतकर्त्ताओं को बिकाउ समझने वाले सीएमओ और उनकी टीम जितना बिकाउ है, उतना षायद ही किसी विभाग के अधिकारी होगें। जिले का कौन ऐसा व्यक्ति होगा जो सीएमओ और उनके लूट गैंग के बारे में नहीं जानता हो। कौन नहीं डा. एसबी सिंह, डा. एके चौधरी और डा. बृजेष षुक्ल के क्रियाकलापों को जानता। मरीजों की मौत और भ्रूण हत्या पर जेबें भरने वाले अगर खुद को ईमानदार और षिकायतकर्त्ता को बेईमान और पागल समझने लगेगें तो इन लोगों से बड़ा कोई बेवकूफ अधिकारी नहीं होगा। किसी के घर का चिराग अस्पतालों की लापरवाही से अगर बुझ जाता है, तो इन्हें बहुत खुषी होती है, क्यों कि जांच के नाम पर इन्हें कमाने का मौका जो मिल जाता है। इन लोगों की सारी ईमानदारी कप्तानगंज सीएचसी के एमओआईसी डा. अनूप चौधरी के बच्चे की मौत के जांच के मामले में धरी की धरी रह गई। एमओआईसी चिल्लाते रह गए कि उनका बच्चा पीएमसी की डाक्टर रेनू राय की लापरवाही के चलते मर गया, कमाने के लिए जांच टीम बनाई गई, जांच टीम की रिपोर्ट कहां गई, बता ही नहीं चला, इसका पता 18 फरवरी 26 को तब चला जब आईजीआरएस के नोडल ने डीएम को लिखकर दिया कि बच्चा डा. रेनू राय की लापरवाही से नहीं मरा, पीएमसी में बच्चा जिंदा रहा, सांस की तकलीफ थी, उसके बाद बच्चा राजेंद्रा अस्पताल में भर्ती रहा, और इलाज के दौरान बच्चा वहीं पर मर गया। अब सवाल उठ रहा है, कि या तो एमओआईसी झूठ बोल रहे हैं, या फिर सीएमओ की टीम झूठ बोल रही है। सवाल यह भी उठ रहा है, कि आखिर एमओआईसी साहब क्यों झूठ बोलेंगे? धन उगाही करने का भी मामला सामने नहीं आया, बकौल एमओआईसी अलबत्ता उनपर समझौता करने का दबाव सीएमओ सहित उनकी टीम के द्वारा बनाया गया। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि क्यों नहीं दस माह बाद एमओआईसी को जांच रिपोर्ट की प्रति दी गई, इससे साबित होता है, कि झूठ एमओआईसी नहीं बल्कि सीएमओ और उनकी टीम बोल रही है, जाहिर सी बात हैं, झूठ तो फ्री में सीएमओ और उनकी टीम बोल नहीं रही होगी। यही कारण रहा कि बिकने का आरोप निरंतर सीएमओ और उनकी जांच टीम पर लगता रहा। जिस सीएमओ और उनकी टीम पर अपने ही एमओआईसी के बच्चे की मौत का सौदा करने का आरोप उमेष गोस्वामी जैसे लोग लगा चुके हैं, वह सीएमओ और उनकी टीम कैसे ईमानदार हो सकती? सीएमओ और उनकी टीम को सीएमओ को लाला साहब लिखना न जाने कैसे निंदनीय लगता है। इस मामले में डीएम को दिए गए स्पष्टीकरण में उमेष गोस्वामी ने कहा कि उन्होंने डा. राजीव निगम को इस लिए लाला साहब लिखा, क्यों कि एससी के लोग भी लाला लिखते है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि अगर ननद को ननद और भौजी को मिलकर ननद-भौजाई लिख दिया तो कौन सा गुनाह कर दिया, लेकिन सीएमओ और उनकी टीम ने यहां पर भी डीएम के सामने उमेष को गलत ठहरा दिया। अगर कुदरहा पीएचसी में ननद-भौजाई मिलकर बखरा के लालच में गरीब मरीजों को लोकल की 12-15 सौ रुपये की दवा नियम विरुद्व लिखती हैं, जिसकी षिकायत षपथ पत्र और ननद-भौजाई के हाथ की लिखी हुई पर्ची के साथ कार्रवाई के लिए लिखा जाता है, तो इसमें गलत क्या? क्यों बिना जांच पड़ताल के षपथ-पत्र और पर्ची को फर्जी करार दे दिया? सवाल उठ रहा है, कि अगर षपथ-पत्र और पर्ची फर्जी था तो क्यों नहीं उमेष गोस्वामी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाया गया। सीएमओ साहब किसी को झूठा और पागल घोषित करने के बजाए भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों पर लगाम लगाइए। आप और आप की टीम अच्छी तरह जानती है, कि वह कितना ईमानदार और बेईमान है।

‘योगीजी’ की ‘ईमानदारी’ सहकारिता ‘को’ ले ‘डूबी’

बस्ती। सुनने में अजीब लग रहा होगा कि एक ईमानदार सीएम की ईमानदारी का लाभ सहकारिता को मिलने के बजाए नुकसान पहुंचा रहा, कहना गलत नहीं होगा कि योगीजी की ईमानदारी ने सहकारिता की लुटिया को डुबो दिया। सहकारिता को ले डूबने में सबसे बड़ा हाथ नौकरषाहों, सहकारिता सचिव, रजिस्टार, एमडी यूपीसीडी एवं सहकारिता मंत्री का हाथ माना जा रहा है। सहकारिता के जानकार एवं वरिष्ठ अधिवक्ता नरेंद्र बहादुर सिंह सहकारिता मंत्री से सवाल कर रहे हैं, कि बताइए आप पैक्स और जिला सहकारी बैंकों को बिना कर्मचारी के कैसे संचालित कर रहे है? या तो आप देखना नहीं चाहते है या फिर आप सहकारी आंदोलन को रसातल में ले जाने की जिद पर आड़े हुएं हैं, एक-एक पैक्स कर्मचारी पर तीन या चार पैक्स का चार्ज है, कई बैंकांे की शाखाएं सप्ताह में एक या दो दिन खुल रही है। कहते हैं, कॉस्मेटिक केमिकल लगाकर प्रगति दिखाई जा रही है। शीर्ष बैंक सहित कई बैंकों में तथ्य को छिपाकर लाभ बढ़ाकर दिखाया जा रहा है। कई बैंकों में 1996 का वेतन मान मिल रहा है। वहां यदि कुल 30 बैंक के कर्मचारी है, तो उनका कुल वेतन वर्ष में 15 से 20 लाख रुपया बनता है और कैडर सेवा के मात्र दो अधिकारी भी है, उनका वेतन उसी बैंक से 35 से 40 लाख रुपया निकल रहा और कहा जा रहा कि बैंकांे की सैलरी रिवाइज नहीं किया जा सकता, क्यों कि कॉस्ट ऑफ मैनेजमेंट निर्धारित मानदंड के ऊपर है, यद्यपि की ऐसे बैंक चलने के लिए न्यूनतम स्वीकृत स्टाफ की संख्या 100 है, कहते हैं कि कर्मचारियों का वेतन रिवाइज न करके और भर्ती रोककर केवल इन्वेस्टमेंट से मिले ब्याज से इन बैंकों को लाभ दिखाना एक धोखा है। कहते हैं, कि जिला सहकारी बैंकों के सारे कर्मचारियों को निकाल दीजिए, बैंक की सारी डिपॉजिट को शीर्ष बैंक में इन्वेस्ट करा दीजिए, सारे बैंक लाभ पर पहुंच जाएंगे, कर्मचारियों की न्यूनतम स्वीकृत स्ट्रेंथ के अनुसार भर्ती करिए रोज शाखाएं खोलिए, सम्मानजनक वेतन दीजिए, जिससे व्यवसाय में वृद्धि हो तब वास्तविक लाभ का आकलन कीजिए, जिससे पैक्स और बैंक शाखा का प्रतिदिन संपर्क बना रहे। इसी प्रकार प्रत्येक बी पैक्स में कैडर सचिव की नियुक्ति कीजिए जिससे समिति सदस्य के लिए सचिव की उपलब्धता बनी रहे, कहा कि मंत्रीजी आप ने प्रदेश के 16 जिला सहकारी बैंकों की धनराशि लेकर सराहनीय कार्य किया था, लेकिन सत्यता यह है कि अभी कई पैक्स ने तो जीरो धनराशि बैंक में ट्रांसफर किया है, कई ने अपहरण कर लिया कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है। कॉन्फ्रेंस से हर सप्ताह मीटिंग हो रही है, जिले के अधिकारी कुछ डर या फिर अन्य कारणों से सही तथ्य आप सामने नहीं रख पाते, भ्रष्टाचार से समिति का सचिव त्रस्त होकर हर वह गलत कार्य करने पर मजबूर है। उसका एक पैर हमेशा जेल में है। धान, गेहूं खरीद में हो क्या रहा है? यह किसी से छिपा नही ह।ै करोड़ों से करोड़ रुपए की फर्जी खरीद हो रही कल्पना कीजिए दो विश्वा जमीन वाले 500-500 कुंतल धान गेहूं बेच रहे है। किसानों से कोई एजेंसी नहीं पूछ रहा है कि कैसे आप के खाते में पांच से छह या कहीं कहीं 10 लाख रुपया कहां से उनके खाते में गया? उसे बैंक से किसने निकाला और उन्हें कितना मिला? राजस्व विभाग के अधिकारी भी खूब खेल कर रहे है। निर्वाचित पैक्स के चेयरमैन जो अपने को सबसे बड़ा सहकार मान रहे है, वे भी काजल की कोठरी में घुसकर, समिति सचिव से हिस्सा ले रहे है। शिकायत करने वाले भी उन्हीं के हाथों बिक जा रहे है। शिकायत के नाम पर ब्लैकमेलिंग हो रही है। जनप्रतिनिधि भी अधिकतर उन्हीं की ही सुन रहे है।

कहते हैं, कि मंत्रीजी विपक्ष इसलिए चुप है कि वे भी यही किए है, और भविष्य में यदि मौका मिला तो फिर करेंगे फिर आज जो हो रहा है, यही बचाव के रूप में पेश करेंगे। आखिर इसी पैसे से चुनाव भी तो लड़ना है, अब सफेद पोश अपराध, भ्रष्टाचार सब लीगल हो गया है, क्यों कि हिस्सा निर्धारित हो गया है। ऐसे सचिव भी है जो 2023-24 में धान में 50 लाख से ऊपर गबन किए, बेल पर है, अब दूसरी समिति का चार्ज देकर उस समिति को सेंटर बनाकर उसमें वही कृत्य करने किए जाने की छूट दी जा रही है। उसके लिए सत्ता और विपक्ष की बड़ी-बड़ी शक्तियां लग गई है। आखिर ऐसे कमाऊ पूत ही प्रिय होंगे, ईमानदारी आज के युग अभिशाप बन गई है। आखिर योगी जी की ईमानदारी से सहकारिता को क्या लाभ हो रहा है, उनका तो सपना था कि प्रदेश की सहकारिता को 2 टायर सिस्टम बनाया जाएगा जिससे सदस्यों को सुगमता से सहकारिता से लाभ मिले, आंदोलन से सदस्य और सहकारी आंदोलन के बीच से कड़ी हटाकर जटिलता को कम किया जाए, लेकिन नौकरशाहों के आगे उनकी एक न चली।

‘सफाई कर्मी’ हो तो ‘सूरज चक्रवर्ती’ जैसा

बस्ती। विकास खंड बहादुरपुर के ग्राम पंचायत शेखपुरा में तैनात सफाई कर्मी सूरज चक्रवर्ती आज पूरे प्रदेष के सफाई कर्मियों के लिए रोल माडल बने हुए है। कार्यो और गांव की स्वच्छता के लिए गांव वालों ने इतना समर्पित और ईमानदार सफाई कर्मी इससे पहले कभी नहीं देखा, गांव वालों का कहना है, कि हम लोग चाहते हैं, सूरज चक्रवर्ती का तबादला इस गांव से कभी न किया जाए, अगर किया जाएगा तो हम लोग इन्हें किसी भी कीमत पर जाने नहीं देगें, धरना-प्रदर्षन तक करना पड़े तो करेगें, लेकिन गांव से जाने नहीं देगें। गांव वाले सफाई कर्मी को अपने परिवार के सदस्य की तरह मानते हैं, और सूरज भी गांव वालों का सम्मान और उनका ध्यान रखते है। सूरज चक्रवर्ती पहले ऐसे सफाई कर्मी होगें जिन्होंने गांव का कूड़ा कचरा बेचकर किसी के आंख का आपरेषन करवाया तो किसी की व्यक्तिगत मदद किया। गांव के स्वच्छता के प्रति इनकी दीवानगी देखते बनती है। अगर इन्हें एक घंटा भी किसी काम से बाहर जाना हुआ तो प्रधान से अवकाष लेकर जाते है, और गांव की साफ-सफाई के बाद ही गांव छोड़ते है। विभाग का अगर कोई भी बड़ा अधिकारी जिले में आता है, और किसी गांव की साफ-सफाई देखना चाहता है, तो विभाग के अधिकारी ष्उन्हें षेखपुरा ले जाते है। कहना गलत नहीं होगा कि सफाई के मामले में षेखपुरा जिले का नहीं पूरे प्रदेष का एक माडल बना हुआ है, और इसका सारा श्रेय गांव वालों और सूरज चक्रवर्ती को जाता है।


कहते हैं, कि काम के प्रति ईमानदारी और व्यवहार परिवर्तन की सोच से काम किया जाय तो काम जरूर दिखता है,, वि. ख. बहादुरपुर के ग्राम पंचायत शेखपुरा ने एक अनोखी पहल कर दी,, यह पहल तैनात सफाई कर्मी की सोच से शुरू किया गया, ग्राम पंचायत को आर्थिक मजबूती देने के लिए तैनात सफाई कर्मी सूरज चक्रवर्ती ने ग्रामीणों से स्वेक्षिक स्वच्छता कर की अपील किया,, जिन घरों से कचरा लेते उनसे ग्राम पंचायत के ओ. एस. आर खाते में स्वेक्षिक स्वच्छता कर भी लेते है, ग्रामीणों को स्वच्छता के प्रति नजरिया बदलने में सफाई कर्मी सूरज का व्यवहार परिवर्तन असर ला रहा है, स्वेक्षिक स्वच्छता कर की अपील के पहले दिन ही ग्रामीणों ने 87 रुपया गांव के खाते के क्यू आर कोड को स्कैन कर स्वेक्षिक कर जमा किये,गांव के सभी ग्रामीणों के पास मोबाइल में यू पी आई की सुबिधा नहीं थी इसलिए अपने कचरे वाले ठेलिया पर एक डिब्बे का गुल्ल्क भी लगा रखा है, जिससे ग्रामीण स्वेक्षिक स्वच्छता कर जमा कर रहे हैं,, ग्राम पंचायत को आर्थिक मजबूत बनाने के लिए ग्रामीणों ने एक महीने में कुल 497 रुपया क्यू आर कोड स्कैन कर एवं गुल्ल्क मिलाकर कुल जमा किए, गुल्लक में जमा धनराशि सदैव सफाई कर्मी सूरज द्वारा गांव के सी एस सी सेंटर पर जाकर जमा कर दिया जाता हैं,, और स्वेक्षिक स्वच्छता कर जमा रजिस्टर में कर दाताओ का नाम धनराशि सहित अंकित किया जाता है। गांव को आर्थिक समृद्ध बनाने के क्रम में गांव के इस खाते में अब तक कुल 2500 रुपया जमा हो चुके हैं। जिसमंे सफाई कर्मी सूरज द्वारा प्लास्टिक कचरे से अर्जित आय भी शामिल हैं।

‘सीएमओ’ के ‘लुटेरा’ गैंग के ‘जाल’ में ‘फंसा’ कुदरहा का ‘प्रकाश नर्सिगं होम’

बस्ती। कुदरहा के उजियारपुर में बेसमेंट में संचालित प्रकाश नर्सिंग होम की षिकायत क्या हुई, सीएमओ डा. राजीव निगम और नोडल डा. एसबी सिंह की लाटरी ही निकल गई। सीएमओ और उनकी टीम इसी तरह के मामले के तलाष में रहती है। शिकायतकर्ता अनिल कुमार पुत्र वीरेंद्र ने षिकायत करके एक नागरिक का फर्ज अदा किया, लेकिन षिकायतकर्त्ता को जब यह पता चलेगा कि उसकी षिकायत पर कार्रवाई करने के बजाए भोजन कर लिया तो तो षिकायत करने पर बड़ा अफसोस होगा। षिकायतकर्त्ता इस लिए षिकायत करता है, ताकि कार्रवाई हो, लेकिन कार्रवाई होता नहीं, यह प्रकाश नर्सिंग होम के संचालक भी अच्छी तरह जानते हैं,


कि जब तक भ्रष्ट टीम रहेगी तब तक उनके नर्सिगं होम का कुछ नहीं होगा। अगर ऐसा नहीं होता तो कुदरहा क्षेत्र में अवैध नर्सिगं होग, अल्टा साउंड और पैथालाजी नहीं संचालित होते है। बहरहाल, डीएम को सौंपे गए एक शिकायती पत्र में आरोप लगाया गया है कि यह नर्सिंग होम पूरी तरह नियमों को ताक पर रखकर बेसमेंट में चलाया जा रहा है, जिससे मरीजों की जान को बड़ा खतरा बना हुआ है। शिकायतकर्ता का कहना है, कि यह नियम विरुद्व नर्सिंग होम सीएमओ और नोडल के रहमोकरम पर संचालित हो रही है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि आपातकालीन स्थिति में बाहर निकलने के लिए यहाँ कोई वैकल्पिक मार्ग मौजूद नहीं है। पत्र में मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजीव निगम और उनके विभाग की कार्यप्रणाली पर हमला किया गया है। मीडिया के द्वारा पूछे जाने पर बेसमेंट में अस्पताल संचालन को गलत बताया, लेकिन लाइसेंस मिलने की बात पर जिम्मेदारी नगर पंचायत और फायर ब्रिगेड पर डाल दी। शिकायतकर्ता का कहना है, जांच का आश्वासन देने के महीनों बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई। पत्र में स्वास्थ्य विभाग के कुछ अधिकारियों को लुटेरा गैंग संबोधित करते हुए अवैध संरक्षण देने का आरोप लगाया गया है। पत्र में डीएम से निष्पक्ष जांच वर्तमान और उनकी टीम को जांच से बाहर रखकर टीबी अस्पताल, महिला अस्पताल और अपर निदेशक चिकित्सा के अधिकारियों की एक उच्च स्तरीय टीम से कराने की अपील की गई। अवैध रुप से संचालित करने वाले दोषियों पर कड़ी कार्रवाई और अवैध नर्सिंग होम को तत्काल सील कर संचालक के खिलाफ दर्ज करने की बात कही गई। पत्र में डीएम से सीएमओ के लुटेरा गैंग को जांच से दूर रखने की बात कही गई।


 


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