बीएसए’ और ‘बाबूओं’ की ‘नजर’ में ‘षिक्षकों’ के ‘जान’ की ‘कोई’ कीमत ‘नहीं’?
‘बीएसए’ और ‘बाबूओं’ की ‘नजर’ में ‘शिक्षकों’ के ‘जान’ की ‘कोई’ कीमत ‘नहीं’?
बस्ती। चाहें देवरिया के बीएसए और बाबू हों, चाहें बस्ती के बीएसए और बाबू हों या फिर चाहें अन्य जिलों के बीएसए और बाबू हांे, सबों की नजर में पैसा ही सब कुछ हो गया। इन लोगों की नजर में षिक्षकों के जान की कोई कीमत नहीं। लगता है, कि इन लोगों के भीतर से संवेदना पूरी तरह मर चुकी है। मानो यह अपने आप को सामाजिक प्राणी मानते ही नहीं। पैसे ने इन्हें इतना अंधा कर दिया हैं, कि कोई जिए या मरे, इनपर कोई फर्क नहीं पड़ता, भले ही चाहें इनके उत्पीड़न से कोई षिक्षक अपनी जान दे दे या फिर सदमे से उसकी जान चली जाए। यह लोग पैसे के लिए इतना नीचे गिर चुके हैं, कि इनकी नजर में जिंदा इंसान की कोई अहमियत ही नहीं रह गई। इनके लिए पैसा ही सबकुछ है। लगता है, मानो, मरने के बाद यह लोग पैसा साथ में लेकर जाएगे। इन्हें पैसा कमाने के आलावा और कुछ नहीं आता, इन्हें उस षिक्षा की गुणवत्ता से भी कोई लेना देना नहीं, जिससे समाज में इनकी पहचान और रुतबा बना हुआ है, और जिसके चलते यह दिन-रात भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं। यह लोग जब घर से कार्यालय की ओर निकलते हैं, तो कार और बाइक में ही कमाने का एक टारगेट बना लेते है। जिस दिन इनका टारगेट पूरा नहीं होता, उस दिन यह बेचैन हो जाते है। चूंकि इनके रडार पर हजारों षिक्षक रहते हैं, इस लिए टारगेट पूरा न होने का कोई गंुजाइष ही नहीं रहता। टारगेट को पूरा करने में एबीएसए और बाबू इनकी सहयोगी की भूमिका निभाते हैं। भ्रष्टाचार ने बीएसए, एबीएसए और बाबूओं को कहीं का नहीं छोड़ा। समाज और षिक्षकों की नजर में न तो यह एक अच्छा व्यक्तित्व वाला इंसान रह गए, और न अच्छा अधिकारी और बाबू। अधिकारियों और बाबूओं को भ्रष्टाचारी बनाने में बेसिक संगठनों के पदाधिकारियों का बहुत बड़ा योगदान है। अगर योगदान न होता तो यह लोग इतने मनबढ़ न होते। कहने को तो जिले में षिक्षकों के हितों की रक्षा करने के लिए बेसिक के दो मजबूत गुट काम कर रहे हैं, लेकिन इन दोनों गुट के लोग कितना सफल हैं, यह सवाल बना हुआ है, अगर यह षिक्षकों के इतने हितैषी होते तो ‘अखिलेष मिश्र’ के मौत के जिम्मेदार बीएसए और एबीएसए के खिलाफ देवरिया के बीएसए की तरह मुकदमा दर्ज होता। न जाने कितने षिक्षकों का उत्पीड़न बीएसए, एबीएसए और बाबूओं के द्वारा डेली किया जाता हैं, लेकिन आवाज नहीं उठाई जाती। भ्रष्टाचार के खिलाफ मानों दोनों गुटों के नेताओं ने दरी बिछाना ही भूल गए। बीएसए के बाबूओं के बारे में बार-बार कहा जाता है, हर बीएसए इन्हें इस्तेमाल करता है। इन्हीं बाबूओं के जरिए बीएसए अपना टारगेट पूरा करते है। जब भी बीएसए, एबीएसए और बाबूओं का नाम आता है, लोगों के जेहन में भ्रष्ट अधिकारियों की छवि सामने आ जाती है। कहा भी जाता है, कि अगर बीएसए चाह जाएं तो बिना उनकी मर्जी के उनके कार्यालय में एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, पांच-दस लाख मांगना तो दूर की बात है। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि देवरिया का षिक्षक कृष्ण मोहन सिंह इस लिए फंासी पर लटक जातें है, कि वह बीएसए और बाबू को 16 लाख नहीं दे पातें, बस्ती के षिक्षक अखिलेष मिश्र की जान इस लिए सदमें में चली जाती हैं, क्यों कि बीएसए उसे बहाल नहीं करते, बहाल तब करते हैं, जब जांबाज षिक्षक ‘अखिलेष मिश्र’ की मौत सदमे से हो जाती। मृतक षिक्षक का परिवार इस लिए चुप रहता है, कि उसके परिवार के सदस्य को नौकरी मिल गई, षिक्षक संगठन के पदाधिकारी इस लिए चुप रहे, क्यों कि इन्हें इसी बहाने बीएसए को अपनी वफादारी दिखानी थी। सच पूछिए तो इससे न तो मृतक षिक्षक की आत्मा को षांति मिली होगी और न पीड़ित परिवार को न्याय ही मिला। जिस बस्ती के बीएसए के खिलाफ एफआईआर दर्ज होना चाहिए था, वह संगठनों के पदाधिकारियों के चलते भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार कर रहा। भले ही चाहें संगठन के पदाधिकारी इस मामले में जो भी सफाई दें, लेकिन समाज की नजर में वह भी बीएसए की तरह गुनहगार माने जा रहें है।
चौकिएं मत, ‘पटखौली राजा के ‘प्रधान’ मनोज ‘दूबे’ कर रहें ‘मजदूरी’!
बस्ती। जिले में ऐसे भी प्रधान हैं, जिनका परिवार मुफलिसी और गरीबी के बीच जीवन यापन कर रहा है। यह इतने गरीब होते हैं, कि अगर मजदूरी न करें तो षायद इनका परिवार भरपेट भोजन भी न कर पाए। कप्तानगंज ब्लॉक के ग्राम पंचायत पटखौली राजा के प्रधान मनोज कुमार दूबे का भी नाम उन गरीब प्रधानों में दर्ज हैं, जिन्होंने न सिर्फ दिहाड़ी मजदूरों की तरह मजदूरी की, बल्कि उस मजदूरी के धन से अपने परिवार का भरण-पोषण भी किया। जिसका सबूत इनके खाते में मजदूरी का लाखों रुपया पैसा है। प्रधानजी ने यह पैसा यूंही नहीं कमाया, बल्कि 15वां वित्त, पंचम वित्त और राज्य वित्त आयोग से ग्राम पंचायत में कराए गए कामों से मजदूरी के रुप में कमाया। बहुत कम ऐसे प्रधान होगें जिन्होंने पैसा कमाने के लिए फावड़ा चलाया होगा, और सिर पर मिटटी ढ़ोया होगा। कहना गलत नहीं होगा कि पंडितजी ने मजदूरी करके पूरे देष में एक मिसाल कायम किया है। इनके खाते में साल 22, 23 और 24 में मजदूरी का 15 बार में एक लाख 90 हजार 682 रुपया गया। सबसे अधिक राज्य वित्त आयोग का मात्र तीन चरणों में 86880 रुपया गया। 15वां वित्त आयोग का 10 बार में 69525 एवं पंचम वित्त आयोग का दो बार में 34277 रुपया गया। यह हम नहीं बल्कि वह जांच रिपोर्ट कह रही है, जिसमें प्रधान को दिहाड़ी मजदूर बताया गया, और जिनके खाते में मजदूरी का लगभग दो लाख भेजा गया।
प्रदेष के यह पहले ऐसे गरीब प्रधान होगें, जिनके खाते में सिर्फ मजदूरी का इतना रुपया भेजा गया। अभी तक सचिव लोगों के बारे में यह सुना गया था, कि वह भी मजदूरी करके परिवार का भरण-पोषण करते हैं, पूनम सिंह नामक महिला सचिव के खाते में मजदूरी का भारी रकम भेजा गया। लेकिन अब तो प्रधानों के बारे में पता चल रहा है कि वह भी मजदूरी करके परिवार चला रहे है। यह हम नहीं बल्कि वह जांच रिपोर्ट कह रही है, जिसमें प्रधान को दिहाड़ी मजदूर बताया गया, और जिनके खाते में मजदूरी का हजारों रुपया भेजा गया। यह पहले ऐसे गरीब प्रधान होगें, जिनके खाते में आज भी लाखों रुपया जमा है। अब यह गांव वालों को सोचना होगा कि उन्हें मनोज कुमार दूबे जैसा प्रधान चाहिए या फिर सदर ब्लॉक के ग्राम पंचायत ओठखनपुर कला जैसा प्रधान जिसने नीजि धन से गांव को पूरे प्रदेष में माडल बनाया। प्रधानों को भी इतना नीचे नहीं गिरना चाहिए, कि चाहें तो भी गांव वालों के सामने उठ न सके। प्रधानों का बस चलता तो मनरेगा की मजदूरी भी अपने खाते में जमा कर देते।बाक्स में
‘प्रधान’ हो तो मनोज कुमार दूबे ‘जैसा’
ग्राम पंचायत पटखौली के प्रधान मनोज कुमार दूबे को देखकर कहा जा रहा है, कि प्रधान हो तो दूबेजी जैसा। जांच रिपोर्ट देखकर आप लोग लग जाएगा कि प्रधान कितना बड़ा भ्रष्टाचारी है। 15वां वित्त आयोग पर नजर डाले तो प्रधान के नीजि खाते में सबसे पहले 23 मई 22 को मजदूरी का 12648 रुपया गया, यह पैसा इन्होंने सीसी रोड दुबौली दूबे सियाराम दूबे ‘षिवराम’ के घर होते हुए बंजर भूमि तक हृयूम पाइप और नाली निर्माण में मजदूरी करके कमाया। इन्होंने सोख्ता निर्माण में मजदूरी के रुप में पहले 10 जनवरी 23 को 3570 और दूसरी बार में 5700 रुपया 28 फरवरी 24 को, देवेंद्र नाथ त्रिपाठी के घर से दुर्गेष दूबे के बाग तक हृयूम पाइप नाली पर मजदूरी का 3588 रुपया 23 मई 23 को, षंभूनाथ पाठक के घर से कोदई पाठक के घर होते हुए हृयूम पाइप नाली पर मजदूरी का 9486 रुपया 23 मई 22 को, रघुनाथ के घर से बंजर भूमि तक नाली निर्माण पर मजदूरी का 5135 रुपया 23 मई 22 को, राम षब्द के घर के पीछे से पिच रोड तक हृयूम पाइप नाली निर्माण पर मजदूरी का 7740 रुपया 26 अप्रैल 24 को, हैंडपंप की चौकी पर मजदूरी का 2280 रुपया 28 फरवरी 24 को, कूप मरम्मत पर मजदूरी का 3400 रुपया 28 फरवरी 24 को एवं प्राथमिक विधालय पर दिव्यांग षौचालय निर्माण पर मजदूरी का 15980 रुपया प्रधान के खाते में 28 फरवरी 24 को भेजा गया। पंचम वित्त आयोग के धन से कराए गए पंचायत भवन पर टाइल्स निर्माण पर मजदूरी के रुप में 26899 रुपया पांच सितंबर 22 को और पटखौली राजा के प्राथमिक विधालय परिसर में षौचालय निर्माण में मजदूरी का प्रधान के खाते में 7378 रुपया भेजा गया। इसी तरह राज्य वित्त आयोग के धन से राम नरायन पाठक के घर से राम अवतार के बाग तक हृयूम पाइप नाली निर्माण पर मजदूरी का 31920 रुपया और 17790 रुपया नौ अप्रैल 24 को एवं कमला दत्त पाठक के घर से लच्छन के बाउंडी तक सीसी रोड निर्माण पर प्रधान के खाते में 37170 रुपया भेजा गया।
‘केस’ दर्ज ‘कराना’, तो ‘सुसाइड’ करना या ‘धमकी’ देना ‘होगा’!
बस्ती। जिले की पुलिस खासतौर पर लालगंज थाने की पुलिस उन्हीं लोगों का मुकदमा दर्ज करती है, जो या तो सुसाइड कर चुके हों या फिर सुसाइड की धमकी दे रहे हों। ऐसा लगता है, कि मानों लालगंज पुलिए ने एफआईआर दर्ज करने का मानक मना लिया है। कम से कम भरवलिया और पसड़ा के मामले में पुलिस ने तो यह संदेष दे दिया कि अगर एफआईआर दर्ज करवाना है, तो उसके मानकों को पूरा करना होगा। मानक से रेट को अलग रखा गया है। लालगंज पुलिस को अपनी छवि सुधारने के लिए उसे उन लोगों की सुननी होगी, जो उनके पास फरियाद लेकर आते हैं, न सिर्फ सुनना होगा, बल्कि उन्हें सम्मान भी देना होगा, ठीक उसी तरह जिस तरह पुलिस अपराधियों और खराब छवि वाले नेताओं को देती है।
जिस दिन लालगंज पुलिस ने अपराधियों और खराब छवि वाले नेताओं को सम्मान देना बंद किया, उस दिन मीडिया और क्षेत्रीय जनता जयजयकार करेगी। लालगंज पुलिस को यह समझना होगा कि उनकी पहचान आम लोगों और सताए हुए लोगों की मदद और उन्हें न्याय देने के रुप में हैं, न कि फरियादियों को अपमानित करने और उनका एफआईआर दर्ज न करने के रुप में। कोई भी थानेदार अपराधियों की मदद करके हीरो नहीं बन सकता, वह तब भी हीरो बनेगा, जब पीड़ितों की मदद करेगा। हीरो वही थानेदार बन सकता है, जिसका टारगेट अधिक से अधिक पैसा कमाना नहीें बल्कि नाम कमाना होगा। पैसे को ही सबकुछ समझने वाले कभी आम जनता के हीरो नहीं बन सकते और न वह अपने थाने को माडल बना सकते है। जिस दिन लालगंज की पुलिस अपराधियों और बदमाषों को उनकी औकात बताने लगेगी, उसी दिन से जनता उन्हें अपने पल्कों पर बैठा लेगी।
न जाने क्यों लालगंज थाने की पुलिस एफआईआर तभी दर्ज करती है, जब कोई लड़की या तो सुसाइड कर लेती है, या फिर सुसाइड करने की धमकी देती है। भरवलिया के मामले में जिस तरह वहां के बाबू साहबों को बलात्कार और सुसाइड के आरोपी को मदद करते देखा गया, उससे उन लोगों का हौसला बड़ा जो लोग समाज और सरकार दोनों के दुष्मन है। यह लोग यह भूल जाते हैं, कि समाज उन्हें देख रहा है। भले ही पीड़ित परिवार कमजोर होने के नाते बाबू साहबों का कुछ न बिगाड़ सके, लेकिन बददुआ तो अवष्य देगें। अपनी नाबालिग लड़की को खोने वाली भरवलिया की पीड़ित परिवार ने बताया कि उन लोगों की नजर में पुलिस से अधिक गांव के वे बाबू साहब लोग जिम्मेदार हैं, जो आरोपी षक्तिमान और उसके परिवार को पुलिस से बचाते रहे। पीड़ित परिवार का दर्द उस समय भी देखा गया, जब पुलिस मुकदमा दर्ज नहीं कर रही थी, और उस समय भी उनके चेहरे में न्याय के आषा की किरण देखी गई, जब मीडिया के दबाव और एसपी के पहल पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया। षक्तिमान के जेल जाने से परिवार ने राहत की सांस ली। पुलिस ने षक्तिमान के साथ उसके परिवार के उन लोगों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया, जो लोग मृतका को आवारा और बदचलन कहते थे। यह मुकदमा राजपति पत्नी नरोत्तम की तहरीर पर अरविंद पुत्र पंजाबी, मिथुन पुत्र पंजाबी और षक्तिमान की माता नाम अज्ञात पति पंजाबी के नाम से मुकदमा दर्ज किया। इसी तरह ग्राम पसड़ा की नाबालिग लड़की प्रीति ने जब एसओ से मुकदमा न दर्ज के आरोप में सुसाइड करने को कहा तो पुलिस ने उस मुकदमें को धमकी के आधा घंटा के भीतर दर्ज कर दिया, जो पिछले एक सप्ताह से नहीं दर्ज कर रही थी। इस मामले में पुलिस ने जनकदुलारी पत्नी षिवकुमार की लंबित तहरीर पर प्रदीप पुत्र श्रीप्रकाष, प्रानमति पत्नी श्रीप्रकाष, पूनम पिता श्रीप्रकाष, श्री प्रकाष पुत्र राम षब्द, विजय पुत्र राम षब्द एवं रंजीत पुत्र श्रीप्रकाष के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया।
‘जनाब’ जरा, ‘क्लार्क इन होटल’ की ‘पार्किगं’ को तो ‘देखिए’!
बस्ती। क्लार्क इन होटल की पार्किगं को देखकर षायद आप लोगों का बीडीए की मेहरबानी याद आ जाए। इस होटल के लिए बीडीए ने सारे नियम और कानून को ताक पर रख दिया। जिस होटल में पार्किगं की कोई सुविधा न हो और जहां पर पार्किगं सड़क पर की जाती हो उस होटल का क्या कहना। इस होटल को बीडीए का प्रिय माना जाता है। यह होटल न सिर्फ बीडीए और प्रषासन ाि प्रिय है, बल्कि अधिकांष मीडिया की भी पहली पसंद है।
कहते हैं, किइस होटल का मानचित्र स्वीकृति करते समय बीडीए ने अपनी आखों पर पटटी बांध रखी थी। तभी तो पार्किगं की सुविधा न होने के बाद भी बीडीए न सिर्फ चुप रहा, बल्कि पूरा सहयोग किया। शासन, प्रशासन, बीडीए और नगर पालिका ने केवल गरीबों को उजाड़ने का मन बना लिया है। बस्ती जनपद में तमाम होटल मैरेज हॉल हॉस्पिटल के पास वाहन पार्किंग की जगह नहीं है बीडीए के अधिशाषी अभियंता एई जेई के द्वारा अवैध वसूली किया जाता है शहर में तमाम हॉस्पिटल बीडीए के संरक्षण में आवासीय भवन,व बिना भू मानचित्र वाले मकानों भवनों में चल रहे हैं शहर में बीडीए के अवैध वसूली व संरक्षण में तमाम भवन बिना मानचित्र के बन गए व बन रहे बीडीए का अधिशाषी अभियंता एई जेई बन जाना समझों कुबेर की गद्दी मिल जाना है। बीडीए के ठीक सामने चार पांच मंजिला बने होटल क्लार्क इन इसका पुख्ता प्रमाण है, लगातार बीडीए का काला कारनामा उजागर होता है, लेकिन बीडीए के जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं होती, अंग्रेजी हुकूमत की तरह कार्य करता है, बीडीए, बीडीए के मेट भी महीने में करोड़पति बन जाते अब जरा अंदाजा लगाएं अधिशासी अभियंता एई जेई की अवैध काली कमाई कितनी होगी। आखिर इसे बीडीए की ही मेहरबानी ही कहेंगे कि आवासीय भवन में चल रहे मेडीवर्ल्ड हास्पिटल मनहनडीह निकट टीवी अस्पताल बस्ती पर दर्जनों शिकायत के बाद भी आज तक कारवाई नहीं हुआ, नगर पालिका परिषद बस्ती जिला प्रशासन व बीडीए के आंख पर काली पट्टी बंधी है जो यह नहीं दिख रहा है कि होटल क्लार्क इन के समाने सड़क वाहन पार्किंग बन गया जनता आवाम को कितनी परेशानियां होती है जाम की स्थिति बनी रहती है। नगर पालिका प्रशासन जिला प्रशासन द्वारा लगातार नाले पर अस्थाई रुप से रेहरी ठेला लगाए दुकानदारों को उजाड़ा जाता है, जबकि खुद नगर पालिका ने रोड पटरी नाला पर लोहे की 10-8 की टंकी दुकान रखवा दिया ह,ै क्या उक्त टंकी दुकान अवैध अतिक्रमण में नहीं आता। शहर के तमाम हॉस्पिटलों पर रोड पर पार्किंग होती हैं, होटल क्लार्क इन बस्ती के सामने सड़क पर पार्किंग होती है।
‘मार्च’ में होगी ‘नौकरियों’ की ‘बरसात’ःवर्मा
बस्ती। डीएम कृत्तिका ज्योत्स्ना की अध्यक्षता में मिशन रोजगार समिति की बैठक कलेक्ट्रेट सभागार बस्ती में संपन्न हुयी। बैठक में जिला सेवायोजन अधिकारी अवधेन्द्र प्रताप वर्मा ने उपस्थित सभी सदस्य गण व जनपद के उपस्थित उद्यमी गण व व्यापार मंडल के सदस्य गण को अवगत कराया कि
अगले माह मार्च 2026 में एक वृहद् रोजगार मेला का आयोजन किया जाना है। इस रोजगार मेला में लगभग 20 से ऊपर की विभिन्न क्षेत्रों की कंपनियां जनपद के बेरोजगार युवाओं को इंटरव्यू के माध्यम से नौकरी देने हेतु आयेंगी। साथ ही उन्होने यह भी अनुरोध किया कि जनपद के सभी निजी क्षेत्र से जुड़े हुए उद्योगपति एवं बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान जिनको भी अपने यहां कुशल व अकुशल श्रमिक अथवा कार्मिकों की आवश्यकता हो, वह अपनी रिक्तियों के साथ इस वृहद रोजगार मेला में नौकरी देने हेतु प्रतिभाग कर सकते हैं
भगवान स्वयं अपनी नजदीकी और स्पर्श का सुख प्रदान करते थेःआचार्य
बनकटी/बस्ती। बघाडी गांव में चल रहे श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के पाचवें दिन की कथा में पं० कैलाश जी महाराज ने अपनी कथा में भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का मनमोहक वर्णन किया। इस कथा में उन्होंने न केवल भगवान के प्रेम-सुलभ स्वरूप को भक्तों के सामने रखा, बल्कि पर्यावरण और प्रकृति के प्रति हमारे दायित्व का गहरा संदेश भी दिया। आचार्य श्री कैलाश जी ने कथा के आरंभ में इस बात पर जोर दिया कि जिस परम सत्ता को बड़े-बड़े ऋषि, मुनि
और देवता तपस्या और यज्ञों से भी प्राप्त नहीं कर पाते, वही भगवान श्री कृष्ण भक्तों और प्रेमियों के लिए सहज, सुलभ और सरल हैं। प्रभु की लीलाएं दर्शाती हैं कि वे पद, प्रतिष्ठा या ज्ञान के भूखे नहीं, वे केवल निश्छल प्रेम के वशीभूत हैं। महाराज श्री ने माखन चोरी लीला का वर्णन करते हुए कहा कि यह केवल शरारत नहीं, बल्कि भक्तों के अहंकार को पिघलाने और उनके हृदयों को शुद्ध करने की लीला है। भक्तों का उद्धाररू उन्होंने बताया कि भगवान गोप-ग्वालों के घरों में माखन चुराकर, उन्हें अपने प्रेम का प्रसाद देते थे। यह माखन चोरी उन भक्तों के लिए प्रेम-प्रसाद बन गई, जिन्हें भगवान स्वयं अपनी नजदीकी और स्पर्श का सुख प्रदान करते थे। उद्धार का सुंदर संदेशरू कथा के दौरान उद्धार का प्रसंग भी जोड़ा गया, जिसमें यह दर्शाया गया कि जो भगवान के दर्शन और स्पर्श से वंचित थे, उन्हें इस लीला के माध्यम से सहज ही प्रभु की कृपा प्राप्त हुई। आचार्य उत्कर्ष पाण्डेय जी ने पूतना उद्धार प्रसंग को विशेष रूप से भक्तों को भाव-विभोर कर दिया। उन्होंने समझाया कि पूतना एक पापनी राक्षसी थी जो प्रभु को मारने आई थी, लेकिन भगवान ने उसे भी माता की गति प्रदान की। इस मौके पर मुख्य यजमान योगेश जी महाराज, बलराम प्रसाद शुक्ल, राम सूरत शुक्ल धनश्याम शुक्ल, लकी विक्की, ओंकार, चंदन, बृजेश, नीरज, धीरज, आदित्य, रामू शर्मा, अयोध्या यादव आदि सहित क्षेत्रीय श्रदालु जन उपस्थित रहे।




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