योगीजी’ बताइए, ‘भैंस’ और ‘केले’ के पेड़ की ‘चोरी’ का ‘केस’ दर्ज हो सकता, तो ‘रेप’ का क्यों ‘नहीं’?

 

‘योगीजी’ बताइए, ‘भैंस’ और ‘केले’ के पेड़ की ‘चोरी’ का ‘केस’ दर्ज हो सकता, तो ‘रेप’ का क्यों ‘नहीं’?

-2027 में अगर भाजपा की सरकार नहीं बनती तो इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार तहसीलों और थानों को माना जाएगा

-इन दोनों विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार और जनविरोधी कार्य को देखते हुए लगता ही नहीं कि इन विभागों के मुखिया डीएम और एसपी

-दोनों विभागों के मुखिया डेली कार्यो की समीक्षा करते, लेकिन व्याप्त भ्रष्टाचार की समीक्षा न जाने क्यों नहीं करते?

बस्ती। जिले की जनता सूबे के मुखिया से सवाल कर रही है, कि बताइए ‘भैंस’ और ‘केले’ के एक पेड़ की चोरी का मुकदमा जरुरी या फिर रेप का। यह भी सवाल कर रही है, जब भैंस की चोरी का मुकदमा दर्ज हो सकता है, तो रेप का क्यों नहीं? षायद इसका जबाव योगीजी के पास नहीं, अगर होता तो भैंस की चोरी का मुकदमा नहीं बल्कि रेप का दर्ज होता। कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार के मामले में योगी की सरकार जनता के सवालों से पूरी तरह घिरी हुई है। अब तो इनके जनप्रतिनिधि ही सदन में भ्रष्टाचार की पोल खोलने लगें है। हालत यह हो गई कि अब सरकार का कोई प्रतिनिधि जनता और मीडिया के सवालों का सामना तक नहीं कर पा रहा है, जबाव न देना पड़े, इस लिए कन्नी काट ले रहे है। अब जिले में कोई नेता भ्रष्टाचार और विकास को लेकर प्रेसवार्ता नहीं करता। राजधानी से आए हुए नेता कार्यक्रमों तक ही सिमट के रह जाते हैं, वे कब आते हैं, और कब जातें, जनता और मीडिया तक को पता नहीं चलता। गांव के विकास की तो यह बात करते हैं, लेकिन गांव वालों के पास नहीं जाते। लगभग तीन साल हो गए, एक भी जिले के मुखिया ने पीसी नहीं किया। मंडल के मुखिया की तो बात ही छोड़िए। कहा भी जाता है, जो डीएम तहसीलों और एसपी थानों को भ्रष्टाचारमुक्त न कर सके, उससे जनता क्या उम्मीद करें? ऐसा लगता है, कि मानों एसडीएम और थानेदार डीएम और एसपी के हाथ से निकल चुके है। अगर अधिकारी यह समझते हैं, कि समीक्षा बैठक के जरिए भ्रष्टाचार को मिटाया और पीड़ितों को न्याय दिलाया जा सकता है, तो जिले की जनता सरकारी व्यवस्था से इतना नाराज और असंतुष्ट नहीं रहती।

योगीजी को यह नहीं भूलना चाहिए, इस नाराजगी का प्रभाव अधिकारियों पर तो नहीं बल्कि आप की सरकार और भाजपा पर पड़ सकता है। योगीजी और उनकी टीम को यह नहीं भूलना चाहिए कि सबसे अधिक सवाल उन तहसीलों और थानों के भ्रष्टाचार पर उठ रहे हैं, जहां से सरकारें बनती और बिगड़ती है। जिस तरह तहसीलों और थानों में फरियादियों और पीड़ितों का दोहन और षोषण हो रहा है, उसे देखते हुए गांव, गढ़ी, कस्बों और मोहल्लों के लोग कहने लगे कि बहुत अत्याचार, जुल्म और दोहन का दंष झेल चुके हैं, लेकिन अब नहीं। कहते हैं, कि जिस पार्टी की सरकार से सबसे अधिक जनता को उम्मीदें थी, उसी ने उन्हें छला और धोखा दिया। यह भी कहते हैं, कि वह इस धोखें का बदला अवष्य लेगें, 27 में दिखा देगें कि जनता के साथ धोखा देने का क्या परिणाम होता है? जनता अगर कुर्सी पर बैठा सकती है, तो उतार भी सकती है। जनता के गुस्से का सामना सबसे अधिक भाजपा के उम्मीदवारों को करना पड़ेगा। क्यों कि जनता की नाराजगी सिर्फ योगीजी से ही नहीं बल्कि उन जनप्रतिनिधियों से हैं, जिन्होंने जातिवाद की नफरत फैलाकर अपनी रोटी संेकी है। जिन्होंने सिर्फ निधि की नहीं बेचा बल्कि अन्य सरकारी योजनाओं में बखरा लिया। खुले आम जिस तरह भाजपा के नेताओं का जातिवाद फैलाने का आडियो वायरल हो रहा है, उसका खामियाजा तो उन्हें भुगतना ही पड़ेगा, भले ही ऐसे लोग चाहें दल बदल लें लेकिन जो ब्राहृमण और ठाकुर के बीच खाई पैदा कर रहे हैं, उनको तो उन लोगों का कोपभाजन बनना ही पड़ेगा, जिन्हें यह अपमानित कर रहे है। देखा जाए तो यही सब किसी नेता के हार का कारण बनता है। जो नेता जाति की बात करता है, वह कभी एक सफल नेता नहीं हो सकता, ऐसे लोग अपार अवैध संपत्ति के मालिक तो हो सकते हैं, लेकिन व्यक्तित्व के धनी नहीं हो सकते। जो लोग विषेष जाति को अपमानित और बुरा भला कहते हैं, क्या वह अपने सीने पर हाथ रखकर कह सकते हैं, कि जिस वर्ग को उन्होंने अपमानित और गाली दिया, उस वर्ग का एक भी वोट उन्हें मिला। जो नेता यह समझते हैं, कि वह तो ब्राृहमणों या फिर ठाकुरों के वोट से जीते हैं, वे अपने आप को धोखा तो दे ही रहे हैं, साथ ही उनको भी अपना दुष्मन बना रहे हैं, जिन्होंने जाने-अनजाने या फिर मोदी और योगी के चलते वोट दिया। अनेक जानकारों का कहना है, कि अगर नेतागण जातिवाद की बात करना और बढ़ावा देना बंद कर दे तो, समाज कभी नहीं बंटेगा। बहरहाल, जैसे-जैसे विधानसभा का चुनाव करीब आ रहा है, वैसे-वैसे अपने आपको खुदा समझने वाले नेताओं की पोल खुल रही है, और यह पोल कोई और नहीं बल्कि उनके अपने लोग ही खोल रहे है। हम बात कर रहे थे, कि पुलिस के लिए चोरी के भैंस का मुकदमा लिखना जरुरी है, या फिर रेप की पीड़िता का। लालगंज थाने ने रेप की पीड़िता का मुकदमा नहीं दर्ज किया, जिसके चलते 15 साल की लड़की को फंासी पर लटक कर अपनी जान देनी पड़ी। वहीं एक दिन पहले नगर थाने की पुलिस ने बैड़ारी एहतमाली मांझा के अनुज पासवान पुत्र अरविंद पासवान की तहरीर पर भैंस की चोरी और उसके मारे जाने की रिपोर्ट लिख देती है। वह भी अज्ञात। क्या यही बस्ती पुलिस की पहचान है।     

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‘एसओ’ साहब ‘आप’ के ‘चलते’ मैं ‘सुसाइड’ करने जा रही ‘हू’ं!

इस पर लालगंज के एसओ ने लड़की से कहा कि सुसाइड मत करना केस दर्ज कर रहा हूं

-लड़की ने कहा कि जब मेरे माता पिता को लोग मार डालेगें तब आप मुकदमा लिखेगें, रोती हुई कही कि मुकदमा लिखने का कितना पैसा चाहिए

बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि सुसाइड करने वाली नाबालिग लड़कियां लालगंज थाने की पुलिस पर ही क्यों सुसाइड करने का जिम्मेदार मानकर बार-बार आरोप लगाती? पहले बलात्कार के आरोपियों के खिलाफ मुकदमा न दर्ज करने का आरोप लगाते हुए भरवलिया की 15 साल की लड़की ने सुसाइड कर लिया। अब ग्राम पसड़ा की नाबालिग लड़की प्रीति ने एसओ पर सुसाइड करने के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया।


लड़की का कहना है, कि गांव के प्रदीप, प्रकाष,, विजय, रंजीत ने मिलकर पुरानी रंजिष में माता और पिता षिवकुमार को 18 फरवरी 26 को हत्या करने की नीयत से मार-मार अधमरा कर दिया, विकलांग बहन पूजा को भी मारा-पीटा, 108 आई और ले जाकर घायलों का इलाज सरकारी अस्पताल में करवाय। डाकटरी मुआयना भी करवाया, कहा कि एसओ से बार-बार कहने के बाद भी आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया, जब कि गांव वाले पुलिस के सामने मारने-पीटने का बयान भी दे चुके हैं। सोमवार को लड़की ने अधिवक्ता के चेंबर में रो-रोकर एसओ को उनके सीयूजी नंबर पर फोन करके कहा कि एसओ साहब मैं सुसाइड करने जा रही हूं, यह भी कहा कि मेरे माता-पिता और विकलांग बहन को बदमाषों ने जान लेने की नीयत से अधमरा कर दिया, और आप ने रिपोर्ट तक नहीं लिखा, कहा कि कई बार मुकदमा दर्ज करने की अपील कर चुकी हूं, क्या आप मेरे माता-पिता और बहन की जान जाने के बाद मुकदमा दर्ज करेगें, कहा कि मुकदमा दर्ज करने के लिए कितना पैसा आप को चाहिए। बताइए। लड़की ने तीन चार बार फोन करके कहा कि एसओ साहब मैं अमहट में कूदकर जान देने जा रही है, क्यों कि मैं अपने परिवार को मरता हुआ नहीं देख सकती, इस लिए मैं खुद मरने जा रही, कहा कि मैं लिखकर जाउंगी कि मेरे मौत के जिम्मेदार एसओ लालगंज संजय कुमार है। एसओ लालगंज से तंग आकर लड़की डीआईजी से भी मिल चुकी। क्षेत्र के और जिले के मीडिया ने देख चुकी है, कि लालगंज पुलिस ने भरवलिया की लड़की के सुसाइड के मामले में कब मुकदमा दर्ज किया? लालगंज की पुलिस कभी न मुकदमा दर्ज करती अगर नवागत एसपी के सामने मीडिया इस मामले में सवाल न खड़ा करता। थाने ने मुकदमा भी लिखा और रातों-रात बलात्कार और सुसाइड के आरोपी षक्तिमान को गिरफतार कर जेल भी दिया, यही तेजी अगर एक माह पहले लालगंज की पुलिस ने दिखाई होती तो 15 साल की लड़की सुसाइड न करती। दोनों परिवार के लोगों ने पुलिस पर आरोप लगाया कि पुलिस ने जितना चाहा आरोपी का दोहन किया, कहते हैं, कि पुलिस के लिए जब पैसा ही सबकुछ हो जाएगा तो चाहे कोई सुसाइड करें या चाहें कोई मरे जिए, पुलिस से कोई मतलब नहीं। भरवलिया और पसड़ा के मामले में पीड़ित परिवार की कानूनी मदद करने वाले डीजीसी क्रिमिनल दुर्गा प्रसाद उपाध्याय का कहना है, कि लालगंज थाने की पुलिस दोनों मामलों में मनमानी कर रही है, पीड़ितों को न्याय दिलाने के बजाए उन्हें अपने तरीके से परेषान करती है। कहते हैं, कि पुलिस के इसी रर्वैये के चलते सरकार की छवि तो खराब हो ही रही है, साथ ही समाज में पुलिस को लेकर गलत संदेष भी जा रहा है। कहते हैं, कि एसओ का यह कहना कि भरवलिया के मामले में लड़की के सुसाइड करने के वक्त आरोपी षक्तिमान गांव में था ही नहीं, कहते हैं, कि एसओ साहब को यह नहीं मालूम कि यह हत्या का मामला नहीं हैं, बल्कि सुसाइड का मामला है। आरोपी मौके पर रहे या न रहे, इससे क्या फर्क पड़ता। कहते हैं, कि बिना केस दर्ज के पुलिस कोई नतीजे पर पहुंच ही नहीं सकती, और जब पुलिस ने केस ही दर्ज नहीं किया तो पीड़ित को न्याय कैसे मिलेगा? कहते हैं, कि इसी तरह पुलिस पसड़ा के मामले में भी लापरवाही बरत रही है, अगर लड़की ने वाकई सुसाइड कर लिया तो लालगंज पुलिस पर भी कानूनी कार्रवाई की आंच आ सकती है।

‘उत्पीड़न’ से ‘तंग’ एक और ‘गुरुजी’ ने दी ‘जान’

बस्ती। चार दिन पहले एमएलसी देवेद्र प्रताप सिंह ने सदन में षिक्षा विभाग के भ्रष्टाचार की पोल खोलते हुए खलबली मचा दी थी। एमएलसी साहब का सच देवरिया के बीएसए में तैनात गोरखपुर- सहाबाजगंज निवासी कृष्ण मोहन सिंह ने सुसाइड करते हुए लिखा कि “मैं मरना नहीं चाहता था, मैं अपने बच्चों के लिए जीना चाहता था, लेकिन मुझे मरने के लिए मजबूर कर दिया गया”। कहा भी जाता है, कि सरकारी व्यवस्था और सूदखोरों में कोई अंतर नहीं दिख रहा। कृष्ण मोहन सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे ,एक शिक्षक जो बच्चों को उज्ज्वल भविष्य का रास्ता दिखाता था, आज खुद अपने ही जीवन की लड़ाई हार गया, देवरिया से जुड़े इस शिक्षक ने गोरखपुर में अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली, लेकिन जाने से पहले एक वीडियो और शब्दों में अपना दर्द छोड़ गए “मैं मरना नहीं चाहता था३ मैं अपने बच्चों के लिए जीना चाहता था३ लेकिन मुझे मजबूर कर दिया गया”

सोचिए, उस पिता के दिल पर क्या बीती होगी, जब पत्नी के गहने गिरवी रखने पड़े होंगे, बैंक से कर्ज लेना पड़ा होगा, हर दिन उम्मीद की होगी कि अब सब ठीक होगा। लेकिन जब मेहनत की कमाई भी बेबसी हो जाए, जब इंसान न्याय के लिए दर-दर भटके, जब सम्मान बार-बार ठुकराया जाए तो दिल टूटता नहीं, बिखर जाता है। अपने सुसाइड नोट में उन्होंने 16 लाखों रुपये की मांग और मानसिक दबाव का जिक्र किया, अपनी इज्जत, अपना घर, अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया फिर भी उन्हें सिर्फ इंतजार और अपमान मिला,

सबसे बड़ा सवाल व्यवस्था पर है। बीएसए कार्यालय के ‘सिस्टम’ की संवेदनहीनता ने एक शिक्षक की जान ले ली, आज एक पत्नी की दुनिया उजड़ गई, बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया३ एक परिवार की रोशनी बुझ गई। एक शिक्षक चला गया, पर व्यवस्था पर सवाल छोड़ गया, क्या हालात इतने कठोर हो सकते हैं कि एक ईमानदार इंसान की जीने की उम्मीद ही छीन लें?

‘परीक्षा’ के बजाए ‘मेडिकल स्टोर’ की ‘व्यवस्था’ संभाल ‘रहें’ सिपाही ‘अभिजीत सिंह’!

बस्ती। अब जरा अंदाजा लगाइए कि जिस पुलिस की ड्यूटी बोर्ड की परीक्षा संभालने में लगी हो, अगर वह मेडिकल स्टोर की व्यवस्था संभालने में व्यस्त रहेगें तो अव्यवस्था भी होगी और नकल कराने वाले नकल भी कराएगें। जब मीडिया ने परीक्षा की व्यवस्था संभालने के बजाए मेडिकल स्टोर की व्यवस्था संभालने के बारे में पूछ लिया तो मीडिया से ही परिचय कार्ड मांगने लगे, इतना ही नहीं सवाल से भन्नाएं सोनहा थाने में तैनात सिपाही अभिजीत सिंह ने वीडियो बनाने वाले पत्रकार सचिन कुमार कसौधन का मोबाइल भी छीन लिया, और सार्वजनिक रुप से मीडिया के लोगों को अपमानित भी करने लगे। मीडिया और भीड़ को यह दिखाने लगे कि वर्दी में इतना पावर होता है, कि वह सवाल पूछने वाले मीडिया का मोबाइल छीन सकते हैं, और अपमानित कर सकते है। वहां मौजूद लोगों का कहना था, कि यही पावर अगर अपराधियों पर पुलिस दिखाती तो जनता और मीडिया दोनों जयजयकार करतें।


सल्टौआ स्थित आदर्ष इंटर कालेज में यूपी बोर्ड की परीक्षा चल रही है। सुबह की पाली में परीक्षा व्यवस्था को संभालने और नकल कराने वाले पर लगाम कंसने के लिए सोनहा थाने की पुलिस अभिजीत सिंह की ड्यूटी लगाई गई। पत्रकार सचिन कुमार कसौधन सहित अन्य मीडिया भी व्यवस्था का जायजा लेने पहुंचे थे। जब उन लोगों ने देखा कि परीक्षा से 100 मी. दूर स्थित विवेक मेडिकल स्टोर पर सिपाही बैठकर मेडिकल स्टोर की व्यवस्था संभालें हुए हैं, तो आदतन, मीडिया ने सिपाहीजी से पूछ लिया कि सर आप की ड्यूटी तो परीक्षा केंद्र पर व्यवस्था संभालने में लगी है, तो यहां क्यों बैठे हैं? इतना पूछना था, कि सिपाहीजी को सिपाही होने का एहसास हो गया। जबाव देने के बजाए मीडिया वालों से ही आई कार्ड मांग लिया। इसी बीच भीड़ बढ़ती गई, भीड़ को देख मीडिया और सिपाही दोनों एहसास कराने लगे। आईडी न दिखाने पर सिपाही ने सचिन कुमार कसौधन नामक पत्रकार का मोबाइल छीन लिया, जाहिर सी बात, पत्रकार को तो गुस्सा आया ही होगा। दोनों ओर से ताकत का एहसास होने लगा। इसी बीच वीडियो बना रहे सचिन का मोबाइल सिपाही ने छीन कर मौजूद भीड़ को दिखाने लगे। बहरहाल, जब सिपाही को अपनी गलती का एहसास हुआ तो मोबाइल वापस कर दिया। सवाल, उठ रहा है, कि जब पुलिस वालों को सवाल पूछना इतना बुरा लगता है, तो क्यों वह सवाल पूछने वाला काम करते है? जाहिर सी बात हैं, कि अगर कोई पुलिस वाला परीक्षा केंद्र की व्यवस्था संभालने के बजाए किसी मेडिकल स्टोर की व्यवस्था संभालने लगेंगे तो सवाल उठेगा ही। पुलिस वालों को किसी के भी सवालों से नहीं घबड़ाना चाहिए, बल्कि सवालों का सामना करना चाहिए। चूंकि न जाने क्यों पुलिस, पत्रकारों के बारे में अच्छी राय नहीं रखती और जब भी मौका मिलता, रगड़ने से नहीं चूकती, इसका ज्वलंत उदाहरण हाल ही में एक पत्रकार के खिलाफ केला पेड़ की चोरी के वीडियो वायरल के आरोप में मुकदमा दर्ज करना रहा। कहने को भले ही चाहें दोनों एक दूसरे को मित्र कहे, लेकिन मौका पड़ने पर न तो मीडिया और न पुलिस चूकती है। बस दोनों को मौका मिलना चाहिए। मीडिया के लोग तो कभी-कभी दोस्ती का निर्वहन कर भी लेते हैं, लेकिन पुलिस नहीं करती। यही बात मीडिया के लोगों को भी समझना होगा, और उन्हें भी वहीं करना चाहिए, जो पुलिस उनके साथ करती है।

‘एमआरपी’ से ‘ज्यादा’ दाम ‘वसूल’ रहे ‘थोक’ व फुटकर ‘विक्रेता’

बस्ती। जब से बजट में पान मसाला सिगरेट पर टैक्स बढ़ाया गया तभी से थोक व फुटकर विक्रेताओं द्वारा लगातार मिलकर जनता को लूटा जा रहा। इस खुले आम लूट से जनता बेहाल है, मजबूरी में उसे अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। बढ़े हुए मूल्य को लेकर थोक व फुटकर विक्रेताओं का अलग-अलग तर्क थोक विक्रेता का कहना है कि आगे से महंगा मिल रहा है इसलिए महंगा बेचना पड़ रहा फुटकर विक्रेताओं का कहना है कि थोक विक्रेता महंगा दे रहे हैं इसलिए महंगा बेचना पड़ रहा है अब प्रश्न यह उठता है कि किसकी बात सही और किसकी बात गलत यह निर्णय कैसे लिया जाए यह जांच का विषय है इस पर तत्काल छापेमारी कर पूछताछ करने की सख्त आवश्यकता है तब जाकर कहीं सच्चाई सामने आ सकती है की बढ़े हुए मूल्य पर थोक विक्रेता निर्धारित एमआरपी मूल्य से कितना अधिक मूल्य फुटकर विक्रेता वसूल कर रहा जिससे फुटकर विक्रेता आम नागरिकों को अधिक मूल्य पर पान मसाला सिगरेट की बिक्री कर रहा। यह एक गंभीर मुद्दा है केंद्र और राज्य सरकार के साथ कंपनियां भी चाहती हैं की एमआरपी निर्धारित मूल्य पर बिक्री की जाए जनता के साथ किसी प्रकार की लूट खसोट ना की जाए लेकिन उसके उलट यहां पर बढ़े हुए मूल्य पर संशय बरकरार है और जनता के साथ की जा रही लूट खसोट पर अंकुश नहीं लग पा रहा ।


बढ़े हुए मूल्य पर एक नजर डालें तो बजट से पूर्व बिक रहे लगभग पान मसाला 10 रुपये के चार पाउच मिलते थे जो अब घटकर तीन रह गये अब 10 रुपये की खरीद पर हो रहा दो रुपए पचास पैसे का शुद्ध घाटा इसी प्रकार से पांच के मूल्य में मिलने वाला एक पान मसाले का पाउच अब मिल रहा लगभग सात रुपये या उससे अधिक मूल्य पर जिससे हो रहा दो रुपए या उससे अधिक का घाटा। 15 रुपये मूल्य में मिलने वाला एक जिपर पैक अब मिल रहा 17 से 18 रुपये में यानी कि दो से तीन रुपए के महंगे दाम पर इस पर भी हो रहा दो से तीन रुपए का घाटा। सिगरेट की भी ऐसी ही स्थिति बनी हुई है पांच रुपये के मूल्य में सर्वाधिक बिकने वाली प्रतिष्ठित कंपनी की सिगरेट अब दिख रही है 07 रुपये के मूल्य पर इसी प्रकार से पांच रुपये के मूल्य में बिकने वाली दूसरी सिगरेट बिक रही है छह से सात रुपए के मूल्य पर जो भाव बिक जाए बेच लो और जनता को लूट लो, इसी प्रकार से आठ रुपये मूल्य में बिकने वाली एक सिगरेट का वसूला जा रहा 10 रुपए और 10 रुपये मूल्य में बिकने वाली एक सिगरेट का वसूला जा रहा। 12 रुपये इसी प्रकार से सभी कंपनियों की सिगरेट को अधिक से अधिक दामों पर बेच कर जनता से वसूला जा रहा अधिक दाम। बस्ती क्षेत्र के साथ संपूर्ण जनपद की जनता को जमाखोरों द्वारा खुलेआम लूट जा रहा इतने बड़े पैमाने पर हो रहे भ्रष्टाचार को रोकने वाला कोई नहीं।


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