सिडको’ के ‘भ्रष्टाचारी’ एक्सइएन को मिला ‘पुरस्कार’

 

‘सिडको’ के ‘भ्रष्टाचारी’ एक्सइएन को मिला ‘पुरस्कार’

बस्ती। जनप्रतिनिधियों के निधियों को खरीदने और बेचने वाली चर्चित निर्माण कार्यदाई सिडको का नाम आते ही लोगों के जेहन में जिले को लूटने वाली कार्यदाई संस्था का नाम सामने आ जाता है। माननीयों की चहेती होने के नाते आजतक इसके एक्सईएन, एई और जेई के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। बस्ती मंडल के अखिलेख सिंह प्रदेष के पहले ऐसे कमिष्नर होंगें जिनके डीओ लिखने से तत्कालीन एक्सईएन आषुतोष द्विवेदी को उनके मूल विभाग यूपीआरएनएसएस यानि पैक्सपेड को वापस करना पड़ा। अब इन्हें फिर से वापस सिडको में सारे नियम कानून तोड़कर प्रतिनियुक्ति पर लाए जाने की खबर सामने आ रही है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि जिस एक्सईएन के बारे में कमिष्नर यह लिख चुके हों कि यह स्वेच्छाचारी हैं, यह विभागीय कार्यो में कोई रुचि नहीं लेते, यह कार्यो के प्रति उदासीनता एवं लापरवाही के प्रतीक है। यह भी लिखा कि इनकी संबद्वता समाप्त होने के बाद भी इन्हें इनके मूल विभाग में अभी तक नहीं भेजा गया। लिखा कि इनका कार्य व्यवहार भी पूरे मंडल में संतोषजनक नहीं हैं। प्रमुख सचिव समाज कल्याण को स्पष्ट लिखा कि इनके पद पर बने रहते से विभाग को आंवटित कार्यो पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। लिखा कि इनकी संबद्वता समाप्त कर किसी अन्य की नियुक्ति की जाए, या फिर एई को संपूर्ण कार्य का दायित्व सौंपा जाए। कमिष्नर ने यह डीओ तीन मार्च 25 को लिखा, और इनकी संबद्वता समाप्त करते हुए इन्हें आठ मार्च 25 को इनके मूल विभाग में वापस कर दिया गया।

बताते हैं, कि इनके तैनाती के दौरान सांसद और विधायक निधि के बजट का जमकर दुरुपयोग हुआ, बिना काम कराए माननीयों के चहेते ठेकेदारों को पूरा भुगतान किया गया। खासबात यह है, कि इनके कार्यकाल में एक भी प्रोजेक्ट पर सीआईबी लगा हुआ नहीं दिखाई दिखाई। सिडको के द्वारा ही गुणवत्ताविहीन आडिटोरिएम और जिले भर में मिनी इंडोर स्टेडिएम बनाए गए, भानपुर में तो निर्माणधीन गुणवत्ताविहीन मिनी इंडोर स्टेडिएम के सेटरिगं के चलते एक आदमी की मौत तक हो चुकी है। फिर कार्यदाई संस्था को न तो ब्लैक लिस्टेड किया गया और न एफआईआर ही दर्ज हुआ। इसका निर्माण सांसद निधि से हुआ। महादेवा विधानसभा में पुलिया ही ढह गया, फिर भी सिडको के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। भवन निर्माण चाहे कलेक्टेट का हो या फिर चाहे कमिष्नरी का हो, सभी के गुणवत्ता पर सवाल उठे, कलेक्टेट भवन तो एक बरसात भी नहीं झेल पाया, छत टपकने लगा था। सांसद और विधायक निधि से जिले में पिछले दस सालों में जितना भी सड़क या फिर भवन निर्माण हुआ, सभी की गुणवत्ता पर सवाल उठाए गए, लेकिन माननीयों के दबाव के चलते डीएम और सीडीओ ने कोई कार्रवाई नहीं किया। जबभी कार्रवाई की बात उठती है, माननीयगण ढ़ाल बनकर खड़े हो जाते है। आप लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि आज तक एक भी माननीय ने सिडको के कार्यो की गुणवत्ता की न तो षिकायत किया और न जांच करने को लिखा, क्यों नहीं लिखा, कहने की आवष्यकता नहीं? जब भी किसी माननीय से पूछो तो कहते हैं, कि उनका काम काम प्रस्ताव देना है, गुणवत्ता को देखना नहीं, यह काम डीआरडीए का है।

जिस भ्रष्टाचारी एक्सईएन आषुतोष द्विवेदी को कमिष्नर के लिखने पर उनके मूल विभाग को वापस भेज दिया गया हो, अगर उसी भ्रष्टाचारी को वापस नियम विरुद्व फिर से संबद्व किया जाएगा तो सरकार और विभाग के एमडी पर सवाल तो उठेगा ही। विभाग की साजिष का खुलासा करते हुए भाजपा के मंडल मंत्री मनीष कुमार पांडेय ने 17 फरवरी 26 को अपर मुख्य सचिव समाज कल्याण को कमिष्नर का डीओ पत्र को षासनादेष की प्रति उपलब्ध कराते हुए लिखा कि इस मामले में षासनादेषों की अवहेलना की जा रही है। कहा कि स्पष्ट आदेष है, कि अगर किसी अधिकारी को एक बार उसकी संबद्वता समाप्त करते हुए उसके मूल विभाग में वापस भेजा जा चुका है, तो पुनः उसकी नियुक्ति प्रतिनियुक्ति पर नहीं की जा सकती। अगर किसी कारण प्रतिनियुक्ति पर भेजना आवष्यक है, तो उस अधिकारी को पहले अपने मूल विभाग में दो साल तक सेवा देनी होगी। लेकिन इन्होंने मात्र दस माह की सेवा दी है। लिखा कि इनकी जन्म तिथि के अनुसार इनका रिटायरमेंट 31 मई 27 है। इस प्रकार इनकी कुल सेवा ही एक साल दो माह बची है, और सेवा निवृत्ति के छह माह पहले सारे वित्तीय अधिकार सीज करने का प्रावधान है। षिकायतकर्त्ता ने बताया कि यह सबकुछ अनैतिक धन का कमाल है, बताया कि चूंकि सिडको में सिर्फ माननीयों की निधियों की लूट ही होती है, गुणवत्तापरक काम से किसी को कोई मतलब नहीं होता। कहा कि सिडको के अधिकारियों का मन सांसदगण और विधायकगण ने बढ़ाया, अगर यह लोग अपने निधि के प्रति सक्रिय होते तो सिडको के अधिकारी बिना काम कराए करोड़ों का भुगतान न करते।    

‘सत्ता’ पक्ष की ‘मुराद’ पूरी ‘कर’ रहा ‘विपक्ष’

बस्ती। विपक्ष के जनप्र्रतिनिधियों ने जनता को यह एहसास करा दिया कि इन लोगों ने हम्हें विधायक और सांसद बनाकर बहुत बड़ी भूल की है। सच तो यही है, कि जनता को अपनी गलती का एहसास विपक्ष के जनप्रतिनिधियों ने स्वंय अपनी क्रियाषैली से करा दिया। विपक्ष का नेता अगर सदन में महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आम जनमानस से जुड़े मुद्वे को छोड़कर ‘पार्क’ की बात करे और सदन में ‘सोए’ तो समझ लेना चाहिए कि विप़क्ष के नेताओं को विकास से कोई लेना-देना नहीं हैं, विधायकजी को अगर सरकार से षहर के लोगों के लिए कुछ मांगना ही था, तो सीवर लाइन की मांग करते, कोई उधोग लगाने की बात करते, व्याप्त भ्रष्टाचार पर हमला बोलते, वाल्टरगंज और बस्ती चीनी मिल को पुनः चालू करने एवं बकाए का भुगतान करने की मांग करते, बेलगाम हो चुके जिले के अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग करते, अगर मांग ही करना था तो भाजपा के कथित भ्रष्ट जिला पंचायत अध्यक्ष, क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष और नगर पंचायत अध्यक्षों के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार के जांच की मांग करते, तब जनता को अपनी गलती का एहसास नहीं होता। पता नहीं विपक्ष भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाता? ऐसा लगता है, कि मानो पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच कोई गुप्त समझौता या फिर कोई सौदा हो गया हो, अगर ऐसा नहीं होता तो विपक्ष के विधायक और सांसद बोर्ड की बैठक में भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा के जिला पंचायत अध्यक्ष का खुलकर बचाव करते नजर नहीं आते। जिन विपक्ष के विधायकों को जिला पंचायत अध्यक्ष के अनियमित कार्यो का विरोध करना चाहिए था, उन्होंने बचाव किया, भाजपा के लोग तो अपने ही पार्टी के अध्यक्ष पर हमला बोल रहे थे, लेकिन विपक्ष तमाषा देख रहा था। विपक्ष के विधायकों के इस रुप को देख भाजपा के लोग भी दंग रह गए, और कहने लगे कि जिला पंचायत अध्यक्ष ने विप़क्ष के विधायकों पर ऐसा कौन सा जादू कर दिया, जिससे सभी भीगी बिल्ली बन गए। सच मानिए, इस एक कांड ने विपक्ष के विधायकों की पोल खोल दी। जनता और मीडिया को समझ में ही नहीं आया कि आखिर विपक्ष के विधायकों को हो क्या गया? इस बचाव से विपक्ष के विधायकों को कितना और क्या लाभ हुआ, यह तो पता नहीं, लेकिन विधायकों और पार्टी की छवि को अवष्य नुकसान हुआ। कहना गलत नहीं होगा कि विपक्ष पूरी तरह सत्ता पक्ष के लोगों के सामने सरेंडर कर चुका है। एक तरह से उन्हें वाकओवर दे दिया। लोग तो यह भी कहने लगे कि सत्ता पक्ष का एक विधायक, विपक्ष के तीन विधायकों और सांसद पर भारी पड़ रहा है। इनसे अच्छा तो सत्ता के सहयोगी विधायक दूधराम रहें, जिन्होंने मीडिया के सामने खुलकर कहा कि कौन कहता है, रामराज, रामराज नहीं बल्कि जंगलराज है। जो काम विपक्ष के इतने सूरमा मिलकर नहीं कर/करवा पा रहे हैं, उसे अकेले भाजपा के विधायक करवा ले रहें हैं। इसे विपक्ष की कमजोरी ही कही जाएगी, कि पीडब्लूडी विभाग के अधिकारी इनकी नहीं सुनते।


विपक्ष आज महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आम जनमानस से जुड़े मुद्वे की बात नहीं कर रहा है, बात इस बात की कर रहा है, कि फंला ने फंला को गाली दे दिया, बिरादरी के लोगों को गरिया दिया, विपक्ष ऐसी बाते कह रहा है, जिससे आम जनमानस से कोई सरोकार नहीं। ऐसा लगता है, कि मानो विपक्ष, भाजपा की गलत नीतियों और भ्रष्टाचार के मामले में समर्थन कर रहा हो। जिला लुटे या बर्बाद हो जाए, इससे विपक्ष के लोगों से कोई मतलब नहीं। विपक्ष का भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मुखर न होना, घातक साबित हो सकता है। एक तरह से विपक्ष, सत्ता पक्ष की मुराद को चुप रहकर पूरा कर रहा है। विपक्ष के नेताओं को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि जनता बार-बार गलती नहीं करेगी। रही बात इनके विकास करने की तो इनका विकास गेट लगवाने तक ही सिमट गया। इन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जनता ने इन्हें विकास करने और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए जीताया, न कि गेट लगवाने के लिए। गेट लगवाने के मामले में सत्ता और विपक्ष के नेता दोनों एक ही नांव पर सवार है। कहना गलत नहीं होगा कि गेट लगवाने के मामले में नेताओं में कंपटीषन हो रहा है। कहने वाली बात नहीं कि गेट में ही सबसे अधिक बखरा मिलता। गेट लगवाने की परम्परा षुरु करने का श्रेय हर्रेया के विधायक को जाता है। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि विपक्ष कब तक अपनी पार्टी की सरकार न होने का रोना रोती रहेगी। बस्ती जैसे जिले में अगर जनता ने सपा के एक सांसद और तीन विधायक को मौका देती और विपक्ष इतने दिनों बाद भी जनता की अपेक्षाओं पर अगर खरा नहीं उतरता तो इसके लिए जनता नहीं बल्कि वे नेता जिम्मेदार हैं, जो जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के बजाए निधियों को बेचने में लगे हुए है। विपक्ष माने या न माने 2027 उनके लिए अच्छा होने वाला नहीं है। जो आसार नजर आ रहे हैं, उससे सरकार बनाने का सपना इनका अधूरा ही रहने वाला है।

‘एमएलसी’ ने ‘सदन’ में खोली ‘सरकार’ के ‘भ्रष्टाचार’ की ‘पोल’

बस्ती। सत्ता में रहकर सरकार के भ्रष्टाचार की पोल खोलने के मामले में एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह को पुरस्कार देने की मांग उठ रही है। सत्ता में रहकर सत्ता के खिलाफ बोलना किसी भी माननीय के लिए आसान नहीं होता। यह काम वही लोग कर सकते हैं, जिनका भ्रष्टाचार से दूर-दूर तक कोई नाता न रहता हो, और जिसे सत्ता का कोई लालच न हो, इसी लिए कहा जाता है, कि अगर निडर होकर राजनीति करना है, तो सत्ता का मोह छोड़ना होगा। कहना गलत नहीं होगा कि जो काम विपक्ष का है, वह सत्ता में रहकर एमएलसी डीपी सिंह कर रहें है। यह उन विपक्ष के लोगों के लिए एक सबक हैं, जो विपक्ष में रहते हुए भी सत्ता में रहने वालों की पोल खोलने से इस लिए डरते हैं, कि कहीं योगीजी उनकी ही पोल न खोल दें। डर माननीयों को कितना कमजोर बना देता है, इसका उदाहरण विपक्ष के नेताओं का भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज न उठाने के रुप में देखा जा सकता है। सवाल उठ रहा है, कि प्रदेष के कितने ऐसे सत्ता और विपक्ष के माननीयगण है, जो सदन में यह कह सके, कि डीआईओएस का बाबू रिटायर षिक्षक से एरियर के भुगतान के नाम पर दो लाख और जेडीई का बाबू चार लाख मांग रहा है। एमएलसी ने यह कर सबको चौंका दिया कि बुलंदषहर के डीआईओएस, विभागीय मंत्री के आदेष के बाद भुगतान तो नहीं किया, अलबत्ता पांच लाख का भुगतान अवष्य रोक दिया। उनके विषेष सचिव ने कहा कि 24 घंटें में भुगतान हो जाएगा, निदेषक ने कहा कि सरजी अभी भुगतान हो जाएगा, उसके बाद भी भुगतान नहीं हुआ, अलबत्त भुगतान के नाम पर लाखों रुपये की मांग की गई। जब यह बात सदन में कही गई तो उस समय विभागीय मंत्री बेबीरानी मौर्या मौजूद रहीं। एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह की बात सुनकर पूरा सदन सन्न रह गया, सभापति को कहना पड़ा कि माननीयजी इस तरह की बाते सदन में न कहंे, आप मंत्रीजी से मिल लीजिए, मामले का निस्तारण हो जाएगा।

इससे पहले एमएलसी ने सदन में यहकर सबको चौंका दिया कि पूरे प्रदेष में षिक्षकों की बर्खास्तगी और बहाली के नाम पर बहुत बड़ा खेल हो रहा है। माध्यमिक के षिक्षकों का बड़े पैमाने पर उत्पीड़न हो रहा है। उन्होंने 1982 की धारा 12 और 18 का हवाला देते हुए कहा कि कहा कि पहले षिक्षकों को बर्खास्त करने से पहले चयन आयोग से अनुमति लेनी पड़ती थी, लेकिन जब से नया षिक्षा चयन आयोग बना, उसमें धारा 12 और 18 के प्रावधानों को समाप्त कर दिया, कहा कि जब से पुराने प्रावधानों को समाप्त किया गया, तब से बड़े पैमाने पर षिक्षकों को बर्खास्त किया जा रहा है, कहा कि यह खेल पूरे प्रदेष में हो रहा है। इन्होंने सदन से मांग की पुराने प्रावधानों को नये में षामिल किया जाए, ताकि षिक्षकों के उत्पीड़न को रोका जा सके। जिस मामले को सदन में उठाया गया, वह बुलंदषहर कालेज के रिटायर षिक्षक अमरपाल सिंह से जुड़ा है। अगर यही बात एमएलसी ने सार्वजनिक रुप से कही होती तो लोगों का उतना ध्यान आकर्षित नहीं करता, जितना सदन के भीतर कही गई बात पर हुआ। एक तरह से एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह ने योगीजी के जीरोटालरेंस की धज्जियां उड़ाकर रख दिया। इसे कहते हैं, नेता। जिसने भी डर की राजनीति की वह जनता का हीरो नहीं बल्कि जीरो साबित होता है। कहते भी है, कि अगर नेता और पत्रकार डर जाए तो समाज का क्या होगा? अधिकांष पीड़ित इन्हीं दोनों के पास अपनी पीड़ा लेकर जाते है।

‘कांग्रेस’ के पूर्व विधायक ‘राम जियावन’ ने थामा ‘सपा’ का ‘हाथ’

बस्ती। पूर्व विधायक रामजियावन ने कांग्रेस छोड़ दिया। वे 42 वर्षों से कांग्रेस पार्टी मे सक्रिय रहे। 1985 मे महादेवा सुरक्षित सीट विधायक चुने गयें। इसके बाद कभी पीछे मुडकर नही देखा। कांग्रेस पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं में रामजियावन का नाम पहली पंक्ति मे आता है। उनका कहना है कि उन्हे दोबारा टिकट नही दिया गया वरना महादेवा सीट से कई बार चुनाव जीतकर प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला होता। आरोप है कि कई लोग पार्टी नेतृत्व से मिलकर उनका टिकट कटवाते रहे। रामजियावन ने महाशिवरात्रि के दिन नसीमुद्दीन सिद्धीकी के साथ समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। पूर्व विधायक का कहना है कि पार्टी के शीर्ष नेताओं ने संगठन की हवा निकाल दी है। कान के कच्चे नेताओं ने बार बार निष्ठावान कार्यकर्ताओं को हाशिये पर किया। जब तक पार्टी मे जमीन से जुड़े निष्ठावान कार्यकर्ताओं की कद्र नही होगी पार्टी किसी कीमत पर पुरानी स्थिति में लौटेगी। रामजियावन ने बताया कि नसीमुद्ीन की अगुवाई मे हजारों लोगों ने सपा ज्वाइन किया है। आपको बता दें कई और नेताओं के कांग्रेस छोड़ने की अटकलें लगाई जा रही हैं।

‘पत्रकार’ के ‘पिता’ को ‘पत्रकारों’ ने दी ‘श्रद्धांजलि’

बस्ती। वरिष्ठ पत्रकार आलोक त्रिपाठी एवं अजीत त्रिपाठी के पिता रुद्रनाथ त्रिपाठी का निधन 75 वर्ष की उम्र में मंगलवार प्रातः हो गया था। वह अवकाश प्राप्त जेल अधिकारी थे जो जिला कारागार देवरिया से वर्ष 2012 में रिटायर हो गए थे। उन्होंने मंडलीय कारागार गोरखपुर में 18 वर्ष सेवाएं दी थी साथ ही लखनऊ, फैजाबाद, गोंडा, वाराणसी जिलों में अपनी सेवाएं प्रदान किया था। वह पशुप्रेमी थे उन्होंने पर्यावरण संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। रुद्रनाथ त्रिपाठी को कई बार कारागार विभाग द्वारा अप्रतिम सेवाओं के लिए प्रदेश स्तर पर पुरस्कृत किया गया था। आज प्रेस क्लब सभागार में आत्मा की शांति हेतु उपस्थित पत्रकारों ने प्रार्थना किया। संरक्षक प्रकाश चन्द्र गुप्ता, अध्यक्ष विनोद कुमार उपाध्याय, महामंत्री महेन्द्र तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार पुनीत ओझा, राघवेन्द्र मिश्रा, विपिन त्रिपाठी ने कहा कि रूद्रनाथ त्रिपाठी के निधन से समाज को गहरा आघात पहुंचा है जिसकी क्षतिपूर्ति कभी नहीं की जा सकती है। शोक व्यक्त करने वालों में प्रवीण कुमार पाण्डेय, लवकुश सिंह, सुदृष्टि नारायण त्रिपाठी, अनिल कुमार श्रीवास्तव, राकेश चन्द्र श्रीवास्तव बिन्नू, जीशान हैदर रिजवी, अनुराग श्रीवास्तव, हरिओम लल्ला, राकेश तिवारी, कौशल ओझा, सर्वेश श्रीवास्तव, बशिष्ठ पाण्डेय, राजेन्द्र उपाध्याय, आनन्द कुमार गुप्ता, अभिनव दूबे, महेन्द्र सिंह बसंत लाल सहित तमाम पत्रकारगण उपस्थित रहे।

‘महिला’ की ‘मौत’ के ‘मरियम हार्ट हॉस्पिटल’ में हुआ ‘हंगामा’

बस्ती। पचपेड़िया रोड स्थित मरियम हार्ट हॉस्पिटल में कथित चिकित्सकीय लापरवाही से एक महिला की मौत का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। घटना के बाद परिजनों ने अस्पताल परिसर में जमकर हंगामा किया और अस्पताल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए। परिजनों का कहना है कि महिला की तबीयत बिगड़ने पर उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन 24 घंटे तक कोई जिम्मेदार डॉक्टर मरीज को देखने नहीं पहुंचा। इस दौरान केवल नर्स द्वारा दर्द का इंजेक्शन लगाकर इलाज किया जाता रहा। समय पर समुचित उपचार न मिलने के कारण महिला की मौत हो गईकृऐसा आरोप लगाया गया है।

घटना की सूचना पर स्थानीय पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे। परिजनों ने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने उनकी बात गंभीरता से नहीं सुनी और मामले को दबाने की कोशिश की।

इस बीच राष्ट्रीय बजरंग दल के जिला अध्यक्ष मनमोहन त्रिपाठी एवं अंतर्राष्ट्रीय हिंदू परिषद के जिला अध्यक्ष स्नेह कुमार पांडे अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे। दोनों संगठनों के कार्यकर्ताओं ने अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ नारेबाजी करते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि जिले में कई निजी अस्पताल मानकों की अनदेखी कर संचालित हो रहे हैं। स्थानीय लोगों ने यह भी बताया कि समीप स्थित स्टार हॉस्पिटल में पूर्व में आयुष्मान कार्ड को लेकर अनियमितताओं की शिकायतें सामने आ चुकी हैं। हालांकि, इन मामलों में क्या कार्रवाई हुई, यह स्पष्ट नहीं है। प्रदर्शनकारियों ने मांग की है कि दोषी डॉक्टर व अस्पताल संचालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर अस्पताल को सील किया जाए तथा पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। फिलहाल पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से भी जांच कर आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है। अब देखना यह है कि क्या इस प्रकरण में ठोस कार्रवाई होती है या मामला समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाता है।



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