वनली’ थैंक्स टू ‘हरीष द्विवेदी’, ‘विवेकानंद मिश्र’ और ‘वरुण सिंह’ नाट टू ‘अजय सिंह’!
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‘वनली’ थैंक्स टू ‘हरीष द्विवेदी’, ‘विवेकानंद मिश्र’ और ‘वरुण सिंह’ नाट टू ‘अजय सिंह’!
बस्ती। अगर कोई कथित गांजा और स्मैक तस्कर सभासद मनोनीत होने पर पूर्व सांसद हरीष द्विवेदी, जिलाध्यक्ष विवेकानंद मिश्र और वरुण सिंह का इस लिए आभार जताता है, कि इन लोगों के प्रयास से ही उसे सभासद बनाया गया, तो समझा जा सकता हैं, कि पार्टी के कत्र्ताधत्र्ता पार्टी को किस दिषा में ले जा रहे हंै। जिस स्थानीय विधायक अजय सिंह का आभार जताना चाहिए, उसे नजरंदाज करके यह साबित करने का प्रयास किया है, कि उनका मनोनयन स्थानीय विधायक के चलते नहीं बल्कि पूर्व सांसद हरीष द्विवेदी, जिलाध्यक्ष विवेकानंद मिश्र और वरुण सिंह के चलते हुआ। स्थानीय विधायक अजय सिंह का आभार न जताना यह साबित करता हैं, कि गांजा और तस्कर के नाम पर विधायकजी ने विरोध जताया होगा, और इसी के चलते गांजा तस्कर स्थानीय विधायक को अपना विरोधी मानता हो। पूर्व सांसद और जिलाध्यक्ष का आभार जताना तो समझा जा सकता है, लेकिन वरुण सिंह का आभार जताना क्षेत्र के लोगों को समझ में नहीं आ रहा है। सवाल उठ रहा है, कि मनोनयन में इनकी क्या भूमिका हो सकती हैं? क्षेत्र के लोगों का तो यहां तक कहना है, रवि गुप्त, हरीष द्विवेदी और विवेकानंद मिश्र से भी अधिक करीबी वरुण सिंह का है। यह कैसे तस्करों के करीबी हो सकते है, यह चर्चा का विषय बना हुआ है। क्षेत्र के लोगों का कहना हैं, कि अच्छा हुआ रवि गुप्त ने विधायकजी का आभार नहीं जताया, वरना विधायकजी पर भी गांजा तस्कर को सभासद मनोनीत करने का आरोप लगता। जो हर्रैया की पुलिस कभी गांजा एंव स्मैक तस्कर को गाली देती थी, आज उसी पुलिस को सम्मान देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, और यह सब भाजपा के नेताओं के कारण होगा।
समाज और सरकार विरोधियों का साथ अगर भाजपा के बड़े नेता प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रुप से देने लगेंगे तो इसका प्रभाव किस पर पड़ेगा, समाज पर या फिर सरकार पर, या फिर पार्टी पर? इस सवाल का जबाव उन लोगों को जनता को देना है, जिन लोगों ने गांजा एवं स्मैक तस्कर को सभासद मनोनीत करवाया। जो व्यक्ति कभी इज्जत के लायक न रहा हो, उसे भाजपा के लोगों ने इज्जतदार बना दिया। भाजपा के किसी भी नेता को इस बात की गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए, कि उसके दामन पर छींटे नहीं पड़ेगें, जो नेता छविविहीन और अपराधी लोगों का साथ देगें, उसे उनका खामियाजा एक न एक दिन भुगतना ही पड़ेगा। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में इस सच का सामना हारे हुए नेता कर भी चुके है। हारने का यह कारण बिलकुल ही नहीं हो सकता कि उनके ही लोगों ने हरवाया, बल्कि हारने का सबसे बड़ा कारण जनता में नेताओं की छवि खराब होना। जिस तरह नेताओं ने अपराधी और गांजा/स्मैक तस्करों का साथ दिया, अगर यही साथ नेता अपने खाटी कार्यकत्र्ताओं के लिए देते तो कार्यकत्र्ता चुनाव में जी-जान लगा देता। कहा भी जाता है, कि जिन नेताओं की भूमिका गांजा एवं स्मैक तस्कर और गन्ना माफिया का साथ देने में रहा हो, उन नेताओं की छवि कैसे जनता में अच्छी हो सकती है? जिन नेताओं के चलते खाटी कार्यकत्र्ताओं का हक मारा गया और मारा जा रहा है, क्या वह लोग चुनाव में उन लोगों का और पार्टी का साथ देगें, जिन्होंने खाटी कार्यकत्र्ताओं के बजाए गांजा और स्मैक तस्करों, चालक, हरवाह, चरवाह, चपरासी को तरजीह दी। अब तो नगर पंचायत बोर्ड की बैठक में एक नहीं दो नहीं बल्कि चार-चार गांजा और स्मैक तस्कर चाय और समोसा खाते नजर आएगें। इन चारों को हुड़वा कुंवर के बाबू साहब का मनई-तनई माना जा रहा है। बाबू साहब की किस्मत अगर अच्छी रही और उक्न नेताओं का सहयोग मिला तो यह ब्लाॅक प्रमुख की कुर्सी पर अपने रिष्तेदार की तरह बैठते हुए नजर आएगें। फिर उस ब्लाॅक के विकास का क्या होगा? इसे आसानी से समझा जा सकता है। फिर पूरे ब्लाॅक में गांजा और स्मैक तस्करों का ही राज रहेगा। जनता चिल्लाती रह जाएगी, लेकिन उनकी नहीं सुनी जाएगी, उन्हीं लोगों की सुनी जाएगी, जो गांजा और स्मैक के कारोबार में लिप्त रहेगें।
‘पिंटू बाबा’ ने मारा ‘कार्यकत्र्ता’ का ‘हक’!
बस्ती। नगर पंचायत गायघाट में सभासद के लिए मनोनीत बालकृष्ण तिवारी उर्फ पिंटू बाबा को तो लोग बधाई दे रहे हैं, लेकिन साथ ही यह भी कह रहे हैं, इन्होंने अपने रसूख का इस्तेमाल करके एक कार्यकत्र्ता का हक मार लिया। कहते हैं, कि जिसके पास पहले से ही नगर पंचायत चेयरमैन की बागडोर हो, उसे सभासद बनने की क्या आवष्यकता? आनंद मोदनवाल सहित अन्य का कहना है, कि पिंटू बाबा से जो बड़कपन की उम्मीद थी, उसे उन्होंने नहीं दिखाया, कार्यकत्र्ता का हक मार कर उन्होंने यह साबित कर दिया कि उनमें और जिलाध्यक्ष में कोई फर्क नहीं है। जिलाध्यक्ष ने भी कार्यकत्र्ताओं को कोई महत्व नहीं दिया, और इन्होंने भी नहीं दिया। एक सच्चा और लोकप्रिय नेता वही होता है, जो पहले अपने कार्यकत्र्ताओं के हक के लिए लड़े, कार्यकत्ताओं का हक मारने वाला कभी लोकप्रिय नेता नहीं हो सकता। वह भले ही मंहगी गाड़ियों में बड़े-बड़े नेताओं के आगे-पीछे घूमे, ठेका-पटटा हासिल करें, भ्रष्टाचार करे, लेकिन वह उन कार्यकत्र्ताओं का नेता नहीं हो सकता, जो दूसरे का हक मारते है। जिन लोगों ने पार्टी को 14-15 साल दिए, उसे नजरअंदाज करके तीन-चार साल वाले को सभासद मनोनीत करवा दिया।
इसे लेकर पूरे गायघाट क्षेत्र में पिंटू बाबा और जिलाध्यक्ष की बदनामी हो रही हैं, वैसे ही पिटूं बाबा इससे पहले नगर पंचायत गायघाट के चेयरमैन के लिए अपने चालक को पद हासिल कर नाराजगी झेल रहे है। कहते हैं, कि जिस व्यक्ति के पास दौलत का अंबार हो, और जो खुद अध्यापक हो, लंबा-चैड़ा टांसपोर्ट का कारोबार हो, जो बड़े-बड़े ठेका लेता हो, उसे किसी कार्यकत्र्ता का हक नहीं मारना चाहिए। एक ने कहा कि पिंटू बाबा की महानता तब होती जब वह पद ठुकराकर किसी कार्यकत्र्ता के हवाले कर देते। जिस तरह क्षेत्र में मनी और पावर के लिए लोग अपना धर्म और ईमान बेचने को तैयार हैं, उस क्षेत्र के नेताओं से वहां की जनता और क्या उम्मीद कर सकती है? वैसे भी इस क्षेत्र में सबसे अधिक एससी वर्ग के खाटी कार्यकत्र्ताओं की उपेक्षा सिर्फ इस लिए की गई, क्यों कि वे नेताओं के पसंद के नहीं रहें, ‘यस’ मैंन और कमाउपूत नहीं बन सके। क्षेत्र के लोग यह जानना चाहते हैं, कि पिंटू बाबा को अब किस पद की भूख हैं, जबाव, प्रमुखी। अगर यह एससी वर्ग के होते तो इन्हें विधायक का टिकट भी मिल जाता, जीते या हारते यह अलग बात है। वैसे भी भाजपा में योग्यता कोई महत्व नहीं रखता, अगर योग्यता महत्व रखता तो पार्टी पिंटू बाबा के चालक को चेयरमैन न बनाती। हालांकि इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना भी पड़ा, और सबसे अधिक वोट से इसी क्षेत्र में पार्टी के उम्मीदवार को हार का मुंह देखना पड़ा। अगर उसी समय योग्य प्रत्याषी को चेयरमैन बनाए होते तो इतनी बुरी हार का सामना नहीं करना पड़ता। उसके बाद भी अगर भाजपा के नेताओं की आंख नहीं खुली, और एक बार फिर ऐसे व्यक्ति को सभासद मनोनीत कर दिया, जिसके पास पहले ही चेयरमैन की बागडोर हो, तो पार्टी का भगवान ही मालिक। बार-बार इस क्षेत्र के लोग और भाजपा के खाटी कार्यकत्र्ता यह सवाल करते हैं, कि जब कार्यकत्ताओं को कोई पद देना ही नहीं तो क्यों कार्यकत्र्ताओं को पार्टी का रीढ़ कहा जाता है। अगर पाटी वाकई कार्यकत्र्ताओं को रीढ़ समझती तो गांजा एवं स्मैक तस्कर और ऐसे को सभासद मनोनीत न करती, जिसके पास पहले ही बड़ा पद हो। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि आखिर एक कार्यकत्र्ता कब आर्थिक रुप से मजबूत होगा? कब पार्टी उसके अभाव को समाप्त करेगी? क्या कार्यकत्र्ता की रीढ़ की हडडी पिघल जाने के बाद पद देकर सम्मान करेगी। कहा भी जाता है, कि जब तक पिंटू बाबा और विवेकानंद मिश्र जैसे लोग पार्टी में रहेगें, कार्यकत्र्ता उपेक्षित होता रहेगा। सवाल यह भी उठ रहा है, कि आखिर एक ही व्यक्ति को बार-बार क्यों सभासद मनोनीत किया जाता है? क्यों विक्की श्रीवास्तव नामक व्यक्ति को तीसरी बार सभासद मनोनीत किया गया? कौन हैं, इसका जिम्मेदार? किसी कार्यकत्र्ता को एक बार भी मौका नहीं मिलता और किसी को तीन-तीन बार मौका दिया गया, क्या यही वह भाजपा हैं, जो कार्यकत्र्ताओं को उनका हक देने की बात कहती है। इस सवाल का जबाव कोर कमेटी के पास भी नहीं होगा।
आखिर ‘अनूप खरे’ और ‘दिव्यांषु खरे’ को ‘करानी’ पड़ी ‘जमानत’
बस्ती। अनूप खरे और दिव्यांषु खरे और अन्य के बीच के पैसे के लेन-देने के मामले में जितनी बदनामी हुई, उतना आज तक किसी की नहीं हुई होगी। अगर इतनी बदनामी के बाद भी कोई परिवार कर्ज मुक्त नहीं हो पा रहा है, या फिर नौकरी के नाम पर लिए गए 38 लाख की अदायगी नहीं कर पा रहा है, तो परिवार को बदनामी का दंष झेलना ही पड़ेगा। सिर्फ बदनामी ही नहीं होगी, परिवार के कारोबार पर भी प्रभाव पड़ना लाजिमी है। ‘नमन श्रीवास्तव और आदित्य श्रीवास्तव’ के बाद अब ‘कृष्ण कुमार सिंह’ का भी नाम जुड़ गया है। इन्होंने चाचा-भतीजा पर नौकरी के नाम पर 38 लाख की ठगी करने का आरोप लगाकर न्यायालय से न्याय की गुहार लगाई है। सीजेएम के यहां से दोनों को समन भी जारी हुआ, जिस पर दोनों को जमानत भी करानी पड़ी। अब केके सिंह ने न्यायालय से दौरान मुकदमें का 38 लाख का 20 फीसद के दर से वसूलकर धन दिलाने की मांग की है। दोनों ही मामलों में चेक के बाउंस होने का आरोप लगाया गया है। एक अन्य मामले में अनूप खरे के साथ में उनकी पत्नी दिप्ती खरे को भी पार्टी बनाया गया है। सीजेएम न्यायालय में दो मुकदमें कायम किए गए, एक में केके सिंह पुत्र षमसेर सिंह बनाम अनूप खरे और उनकी पत्नी दीप्ति खरे और दूसरे में केके सिंह बनाम दिव्यांषु खरे पुत्र आषीष खरे का है। दिव्याषु खरे के मामले में 23 लाख और अनूप खरे के मामले में 15 लाख का मामला है।
दाखिल मुकदमें में कहा गया है, कि दिव्यांषु खरे और इनके सगे चाचा अनूप खरे जो कई विधालयों के प्रबंधक हैं, एवं भाजपा के कदावर नेता भी है। अनूप खरे की पत्नी दीप्ति खरे नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव भी लड़ चुकी है। कहा कि विपक्षी के चाचा का सीबीएससी इंटर मीडिएट तक का विधालय जो द सीएमएस के नाम से है। कहा कि चूंकि हमारा ठेका-पटटी का भी काम होता है, जिसके चलते अनूप खरे से काफी अच्छा संबध रहा। चुनाव में हम और हमारा लड़का खूब प्रचार किया। लिखा कि चाचा ने हमारे लड़के की नौकरी लगाने के नाम पर 38 लाख की मांग कीं, चुनाव बाद नौकरी लगवाने की बात कही, भरोसा करके 29 अक्टूबर 24 को दिव्यांषु खरे के खाते में आरटीजीएस के जरिए दस लाख भेज दिया। कहा कि जो हमने दस लाख दिया, वह अपने दोस्तों और षुभचिंतकों से उधार लेकर दिया। लिखा कि जब इनकी पत्नी चुनाव हार गई, तो पार्टी में इनकी पकड़ कमजोर हो गई, इसी लिए यह न तो लड़के को नौकरी दिला सके और न पैसा ही वापस किया। कहा कि जब काफी दबाव बनाया तो 18 अगस्त 25 को 23 लाख का चेक दिया, अवषेष 15 लाख का चेक अनूप खरे ने दिया। लिखा कि जब हम 18 और 19 सितंबर 25 को बैंक में चेक डाला तो पता चला प्र्याप्त धन न होने के कारण चेक बाउंस हो गया, जब इसकी जानकारी विपक्षी को दी गई, तो उन्होंने 24 सितंबर 25 को पुनः चेक लगाने को कहा, लेकिन 25 सितंबर को फिर पता चला कि खाते में पैसा न होने के कारण चेक दूसरी बार बाउंस हो गया। जिसकी जानकारी फिर विप़क्षी को देना चाहा, तो फोन नहीं उठाया, पुनः 25 को चेक डाला, लेकिन तीसरी बार 30 सितंबर 25 को भी चेक डिस्आनर हो गया। लिखा कि मजबूर होकर विप़क्षी को तीन अक्टूबर 25 को लीगल नोटिस भेजा, नोटिस तो ले लिया, लेकिन समय अवधि बीत जाने के बाद भी भुगतान नहीं किया, और न ही नोटिस का कोई जबाव दिया। तब इसे सीजेएम के यहां परिवाद दाखिल हुआ। जिसमें दिव्यांषु खरे से 23 लाख मय ब्याज सहित वापस दिलाने की मांग न्यायालय से की गई। इस पर न्यायालय की ओर सेम जारी हुआ, जिस पर दोनों ने जमानत करवानी पड़ी। इसी तरह का एक अन्य मुकदमा अनूप खरे और उनकी पत्नी दीप्ति खरे बनाम केके सिंह के नाम से दाखिल हुआ। इसमें भी वही बाते कही गई, न्यायालय से इस मामले में अनूप खरे से 15 लाख मय ब्याज के वापस दिलाने की मांग की गई, इसमें भी समन जारी हुआ और जमानत करानी पड़ी। मामला अभी न्यायालय में चल रहा है।
‘पीडब्लूडी’ के ‘भ्रष्टाचार’ में ‘साहबों’ को ‘बाबूओं’ ने पीछे ‘छोड़ा’!
बस्ती। जो काम साहब लाख में नहीं कर सकते हैं, उस काम को बाबू हजारों में कर देते हैं, इसी लिए साहबों से अधिक बाबूओं की इज्जत होती है, और वह साहबों से अधिक ेमाते भी है। ऐसा ही एक और मामला पीडब्लूडी का सामने आया। इसकी षिकायत ठेकेदार बृजनंदन पांडेय को प्रमुख सचिव पीडब्लूडी से करनी पड़ी और टेंडर में हेराफेरी करने वाले दोषियों खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है, ताकि टेंडर प्रक्रिया में पारदर्षिता बनी रहे।
पत्र में लिखा गया कि बस्ती वृत्त में 26 फरवरी 26 को लाट संख्या-6 रोड का नाम मरवटिया से गैड़ा खोर मार्ग जिसकी अनुमानित लागत 3.10 करोड़ है। कहा कि आनलाइन प्रतिभाग किया और इसके लिए एकाउंठट से 16.68 लाख रुपया टेंडर फीस भी जमा किया। जब टेंडर डाला जाने लगा तो पता चला कि निविदा षर्त में कंकरीट बैच मिक्स प्लांट एवं कंकरीट पंप तथा अन्य उपकरण निविदा कंडिषन में जबरदस्ती टी-2 के नियम और ष्षर्तो को तोड़ मरोड़ कर अधीक्षण अभियंता बस्ती वृत्त के सह पर निविदा लिपिक अभिषेक कुमार श्रीवास्तव एवं बस्ती अधीक्षण अभियंता कार्यालय में तैनात निविदा लिपिक प्रभात कुमार उर्फ पटटू के द्वारा लगा दिया गया, ताकि अपने चहेते ठेकेदार को फर्जी तरीके से कंकरीट बैच मिक्स प्लांट एवं कंकरीट पंप तथा अन्य उपकरण का किरायानामा बनवाकर निविदा डलवाया जा सके। जबकि षासनादेष में 30 लाख के कार्यो में ही कंकरीट मिक्स लगाए जाने का प्राविधान है। लेकिन यहां सभी कार्य 30 लाख से तीन करोड़ से नीचे का है। जिससे सैकड़ों ठेकेदारों की रोजीरोटी जुड़ी हुई है। कहा कि निविदा में एक भी घन मीटर कंकरीट मैटेरिएल कह आवष्यकता बिल आफ क्वानिटिटी के अनुसार साइड पर नहीं है। बिल आफ क्वानिटिटी में सिंपल सा कार्य हैं, जिसमें मिटटी जेएसबी/जी-2/जी-3/पीसी सिल कोट का प्राविधान है। जिसमें इन भ्रष्ट बाबूओं के द्वारा तनिविदा लागत का 10 फीसद पैसा नकद वसूली करके चार ग्रुप टेंडरों पर बैच कंकरीट बैच मिक्स प्लांट का प्राविधान निविदा कंडिषन में जबरदस्ती लगा दिया गया। जिससे बहुत सारे ठेकेदार टेंडर में भाग लेने से वंचित हो गए, जिससे राजस्व की भी भारी क्षति हुई। एसई को अवगत कराने के बाद आष्वासन दिया गया कि कंडिषन हटा लेगें। फिर भी फेरबदल नहीं किया गया। ठेकेदार का ग्रुप एससी से मिला भी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई, ऐसा लगता है, कि मानों बाबूओ ने साहब के सह पर और पैसा कमाने के लिए जबरिया कंडीषन डाल दिया। यह पहली बार नहीं हैं, जब साहबों और बाबूओं के गठजोड़ के चलते राजस्व की भारी क्षति नहीं हुई। साहब और बाबू मिलकर अपने लाभ के लिए सरकार की क्षति करने में नहीं चूकते। अपने चहेतें ठेकेदारों को ठेका देने के लिए बाबू और साहब किसी भी हद तक जा सकते है। क्यों कि इतने बड़े ठेके में किसी न किसी माननीय का ठेकेदार रहता है, जिसे लाभ पहुंचाने के लिए माननीय कुछ भी करने कासे तैयार रहते है। देखा जाए तो पीडब्लूडी को बर्बाद करने में माननीयों का सबसे बड़ा हाथ है। उन ठेकेदारों का भी हाथ है, जो अपने लाभ के लिए अपने ही साथी ठेकेदारों के साथ गददारी करते है। चूंकि ठेकेदार एक मंच में नहीं आते, इस लिए माननीय और अधिकारी एवं बाबू इसका लाभ उठाते है। जिस दिन ठेकेदारों ने माननीयों एंव अधिकारियों को कमीषन देना बंद कर दिया, उस दिन सड़कों की गुणवत्ता अच्छी होगी, और ठेकेदार सकून से भी रहेगें।
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