संजय चैधरी’ को ‘इस’ लिए ‘टेन प्लस’ दिया, ताकि ‘परिवार’ न ‘टूटे’!


‘संजय चैधरी’ को ‘इस’ लिए ‘टेन प्लस’ दिया, ताकि ‘परिवार’ न ‘टूटे’!

बस्ती। भ्रष्टाचार के खिलाफ निरंतर लड़ाई लड़ने वाले सरदार कुलवेंद्र सिंह मजहबी से जब यह पूछा गया कि जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चैधरी के अब तक के कार्यकाल के लिए आप ने टेन प्लस नंबर क्यों दिया? कहने लगे कि अगर वह टेन प्लस नंबर नहीं देते तो उनका परिवार विघटित हो सकता, क्यों कि ‘संजय चैधरी’ हमारे बच्चों के ‘मामा’ है। बहुत कम लोगों को यह नहीं मालूम होगा कि पप्पू सरदार के बच्चे संजय चैधरी के मामा है। दो दिन पहले सोषल मीडिया पर जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चैधरी का तीन फोटो लगाकर लोगों से यह पूछा गया, कि अब तक अध्यक्ष के कार्यकाल के लिए 10 में से कितना नंबर देगें। इस पर किसी ने टेन प्लस तो किसी ने जीरो नंबर दिया। संजय चैधरी के लिए खास बात यह हैं कि अगर सौ लोगों ने अपनी राय दी होगी तो उसमें आधे से अधिक टेन प्लस नंबर दिया, यह अलग बात हैं, टेन प्लस देने वालों में अधिकांष लोग उन्हीं के ही बिरादरी के है।


पहले हम आप लोगों को टेन प्लस से अधिक देने वालों के बारे में बताता हूं। सबसे अधिक सुन चैधरी ने एक लाख नंबर दिया। राम सुभावन वर्मा, पवन चैधरी 1000, षैलेंद्र चैधरी, राहुल विष्वकर्मा ने 1001 नंबर दिया। राम भवन वर्मा ने एक हजार नंबर, सुमित डान, सलाहुदीन, अजुन प्रसाद, अनिल चैधरी, गोपी वर्मा, ष्याम नरायन चैधरी, अजीत कुमार, गगन पांडेय, प्रमोद पांडेय, योगेंद्र सिंह ने टेन प्लस, अर्जुन चैधरी, अषोक गुप्त, महात्मा चैधरी, अजय अजय, कमलेस चैधरी, संजय यूपीपीसीएल, राम सजन चैधरी, बलिराम भारती उर्फ लाल, सुखपाल चैधरी, अषोक चैधरी, अरुण कुमार पटेल, संत कुमार चैधरी, धमेंद्र चैधरी, अभिषेक चैधरी, वीरेंद्र चैधरी, षिवकुमार वर्मा, सर्वेष श्रीवास्तव, फूलन राम वर्मा, कृष्ण कुमार वर्मा, अनिल कुमार यादव, जिलाध्यक्ष बस्ती बाबू साहब, सुरेष सोनी, रमेष वर्मा, हेमंत चैधरी, राजेष चैधरी, डीआरएक्स विकास चैधरी, सर्वेष चैधरी, संजीत चैधरी, सोनू चैधरी, रवि चैधरी, जय राठौर, अवधेष कुमार वर्मा, नितिन चैधरी, विवेक पांडेय, बीआरपी चैधरी, संजय चैधरी, अनिल कुमार, राजन कन्नौजिया, उमेष पटेल, सुरेष चैधरी आमा, दिनय कुमार, आदित्य पांडेय, प्रदीप चैधरी, राम प्रकाष चैधरी, विजय पटेल, चैधरी सुरेंद्र पटेल, अमरेंद्र प्रताप चैधरी, महेष सिंह, रामजीत मौर्स, अजय प्रताप, चैधरी अखिलेष, राजेष कुमार चैधरी, सतीष पटेल, अतुल वर्मा, पंकज साहनी समाजसेवी, प्रेम चंद्र चैधरी, षिवानंद पाठक, अरबाज पठान, पंकज चैधरी, चंद्र प्रकाष चैधरी, अभिषेक कुमार चैधरी, प्रवीन चैधरी, षिवम पांडेय, जिगर राजपूत, अजीत चैधरी, अनिकेत राजभर, विवेक चैधरी, षुभम पांडेय, प्रदीप चैधरी, एडवोकेट मानवेंद्र पटेल, डा. राम ललित चैधरी, धुव्र चंद्र, लाल बहादुर, विक्रम चैधरी, यषवंत तिवारी, जवाहर लाल वर्मा,नरेंद्र चैधरी, षिवा चैधरी, अंकुष चैधरी, चंद्रभान चैधरी, ओमप्रकाष चैधरी, श्रीराम चैधरी, राहुल षुक्ल, अमर पांडेय, बाबू राम, गोरख पटेल, राजेष कुमार, प्रेम पाल चैधरी, मनीष चैधरी, सत्येंद्र चैधरी सहित लगभग 150 लोगों ने दस में से दस नंबर दिया। आनंद चैधरी, अनिल सिंह, राहुल षुक्ल, अंकुष चैधरी, षिव चैधरी, अषोक गुप्त, अर्जुन चैधरी, अमर पांडेय, चंद्र प्रकाष चैधरी, बाबू राम, चाद-चाद, डीसी दूबे, राजेंद्र वर्मा, मोहम्मद नषीम खान, प्रमोद कुमार ने दस में से 100-100 नंबर दिया। यदुवेंद्र प्रताप सिंह लिखते हैं, कि संजय चैधरी से अच्छा कार्यकाल किसी का नहीं रहा। षंषाक षुक्ल लिखते हैं, अध्यक्षजी ने विकास की गंगा बहा दी, जो सड़क 30 सालों में भी नहीं बनी उसे अध्यक्षजी ने बनवा दिया।बाक्स में

‘चंद्रेष प्रताप सिंह’ ने ‘अध्यक्ष’ को ‘छह’ जीरो नंबर ‘दिया’

जहां पर दस से लेकर 1001 नंबर देने वालों की कमी नहीं रही, वहीं पर संजय चैधरी को छह से अधिक जीरो नंबर देने वालों की भी भरमार रहा। इनमें भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ निरंतर आवाज उठाने वाले चंद्रेष प्रताप सिंह ने एक नहीं दो नहीं बल्कि छह जीरो नबंर दिया। अवधेष कुमार यादव लिखते हैं, कि कोई विकास नहीं हुआ, एक पूर्व अध्यक्ष बन गए, संजय चैरसिया ने पांच जीरो, मोहम्मद रफीक खान ने कार्य जीरो काल जीरो बताया। सचिन षाही ने तो लिखा कि 10 बहुत कम, इन्होंने 10000000 नंबर दिया, दीनानाथ गौड़ ने लिखा कि बिरादरी पद पर इस लिए 0000 नंबर, अरुण कुमार वर्मा ने 00000, महेंद्रप्रताप सिंह ने 0000, नानबाबू वर्मा ने आठ जीरो, विनय दूबे ने इतना जीरो नंबा दिया कि गिन ही नहीं जा रहा, अभिषेक सिंह ने पांच जीरो, अमर विराज ने 10000000000000 नंबर दिया, आषीष षुक्ल ने पांच जीरो, अविनाष कुमार त्रिपाठी ने दो जीरो, विषाल सिंह ने चार जीरो, पंिडत आदर्ष पांडेय ने तीन जीरो, विजय यादव ने नौ जीरो, राजकुमार चैधरी ने छह जीरो, अभिषेक यदुवंषी ने तीन जीरो, संतोष उपाध्याय ने 13 जीरो, धीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने 14 जीरो, हेमंत षुक्ल ने दो जीरो, गिरजेष गगन ने 12 जीरो, षैलेंद्र उपाध्याय ने चार जीरो, काली प्रसाद षर्मा लिखते हैं, कि जिले में जातिवाद चलता, चैधरी का बोलबाला, इस लिए जीरो नंबर दे रहा हूं, सबसे अधिक नाराजगी जितेंद्र चैहान में देखी गई, कहा कि अपने गांव और क्षेत्र के साथ-साथ पूरे जिले के हिसाब से जीरो नंबर देता हूं, बृजमोहन श्रीवास्तव लिखते हैं, कि बिना काम के कौन सा नंबर? अगर किसी नेता को अपने बारे में गलतफहमी हो तो वह सोषल मीडिया पर रायषुमारी करवा लें, गलतफहमी दूर हो जाएगी। चूंकि नेता रायषुमारी को अधिक महत्व नहीं और वह मोदी और योगी के चक्कर में पड़ जाते, इस लिए उनकी गणित खराब हो जाती।

‘आरटीआई’ के ‘हीरो’ बने ‘सुदृष्टि नरायन त्रिपाठी’

बस्ती। पत्रकारिता के क्षेत्र में भले ही सुदृष्टि नरायन त्रिपाठी ने उनका नाम और षोहरत नहीं कमाया, लेकिन इन्होंने जो नाम और षोहरत आरटीआई कार्यकत्र्ता के रुप में कमाया, वह बहुत कम आरटीआई कार्यकत्र्ता को कमाने का मौका मिलता है। आरटीआई के प्रति इनका जो जूनून हैं, उसे देखते हुए इन्हें आरटीआई का हीरो कहा जाता है। यह पहले ऐसे आरटीआई कार्यकत्र्ता होगें, जिन्हें जेल भी जाना पड़ा, यह अलग बात हैं, कि जेल भेजवाने जिला अस्पताल के एसआईसी खुद घेंरे में आ चुके है। इनका एक पैर बस्ती तो दूसरा राज्य सूचना आयुक्त कार्यालय रहता है। इनकी अधिकतर रातें बस में या फिर टेन में बीतती है। यह पहले ऐसे आरटीआई कार्यकत्र्ता होगें जिन्होंने पूरे प्रदेष के लगभग सभी विभागों के जन सूचना अधिकारी के खिलाफ 25 हजार का जुर्माना लगवा चुके है। सचिवालय के अधिकारी के खिलाफ भी यह जुर्माना लगवा चुके है। एक तरह से इनका खौफ बस्ती में तो रहता ही है, प्रदेष के अन्य जिलों में भी रहता है। जिस तरह इन्होंने एक साथ विभिन्न विभागों और विभिन्न जिलों के 20 से अधिक बीडीओ, नगर पंचायत/नगर पालिका के ईओ, जिला अल्प संख्यक अधिकारी पर 25-25 हजार का जुर्माना लगवाया, उससे इनकी सक्रियता का पता चलता है।


इन्हीं के चलते सरकार के खजाने में तुर्माने के रुप में 20 लाख जमा होने वाला है। इनमें नगर पालिका बस्ती के ईओ, नगर पंचायत बभनान के ईओ, बदायूं दातागंज पालिका के ईओ, गोरखपुर बड़हलगंज के ईओ, सिद्वार्थनगर के नगर पालिका बांसी के ईओ, षोहरतगढ़, नगर पंचायत कप्तानगंज के ईओ, नगर पालिका खलीलाबाद के ईओ, नगर पंचायत नौतनवां महराजगंज के ईओ, नगर पंचायत पऱतावल के ईओ, बीडीओ सल्टौआ, बीडीओ परसरामपुर, डीपीआरओ बस्ती सहित अन्य का नाम षामिल है। अब सवाल उठ रहा है, कि आखिर क्यों 25 हजार का जुर्माना वेतन से देने को तैयार हो जाते हैं, लेकिन चाही गई जानकारी नहीं देतें। कोई अधिकारी यह न समझे कि उसने जुर्माना भर दिया तो वह सूचना देने से वंचित हो गया, सूचना तो उन्हें जुर्माना अदा करने के बाद भी देना पड़ेगा। कहा भी जाता है, कि सूचना वही अधिकारी नहीं देते जो योजनाओं में गड़बड़ी किए रहते हैं, उन्हें इस बात का डर रहता है, कि अगर उन्होंने सूचना दे दिया तो उनके भ्रष्टाचार की पोल खुल जाएगी। यह उन अधिकारियों का भ्रम रहता है, कि सूचना देने से कहीं उनके खिलाफ कार्रवाई न हो जाए। यह भी सही हैं, कि प्रदेष का कोई नगर पंचायत, पालिका और क्षेत्र पंचायतें नहीं जो भ्रष्टाचार में न डूबी हो। अनेक ऐसे घटना भी सामने आया, जहां पर सूचना के नाम पर धन उगाही की गई।

‘कमिष्नर’ साहब यह ‘आप’ ने ‘कैसा’ आदेष कर ‘दिया’?

बस्ती। जिस जेडीई और निविदा लिपिक को कमिष्नर साहब ने दोषी माना, उसी को कार्रवाई करने का आदेष कर दिया, सवाल उठ रहा है, कि क्या जेडीई अपने और अपने बाबू के खिलाफ कार्रवाई कर पाएगें? इतने बड़े घोटाले में जहां कमिष्नर को जेडीई के खिलाफ कार्रवाई के लिए षासन को लिखना चाहिए, वहीं इन्होंने आरोपी को ही कार्रवाई करने को लिख दिया, इतना ही नहीं जिस आउटसोर्सिगं कंपनी ने जेडीई और लिपिक के साथ मिलकर फ्राड किया, उसी को भुगतान करने का आदेष कर दिया। कमिष्नर के इस आदेष का लाभ फ्राड करने वाली फर्म और जेडीई एवं लिपिक को मिला। तीनों जो चाहते थे, वही कमिष्नर साहब ने कर दिया, फिर ऐसे जांच और कार्रवाई से क्या फायदा जिसका लाभ आरोपी को ही मिले। जेडीई ने न तो लिपिक और न फर्म के खिलाफ कार्रवाई किया, अलबत्ता कमिष्नर साहब के आदेष का हवाला देते हुए, फर्म को भुगतान करने का फरमान जारी कर दिया। मीडिया चिल्लाती रही, लेकिन वही हुआ, जो जेडीई, लिपिक और फर्म चाहती थी। कमिष्नर साहब के इस आदेष को लेकर तरत-तरह के सवाल उठ रहें हैं, और कहा जा रहा है, कि ऐसा आदेष करने का क्या फायदा जिसका लाभ फ्राड करने वाली फर्म और जेडीई एवं लिपिक को मिले। कमिष्नर साहब का यह आदेष हंसी का पात्र बन कर रह गया। संयुक्त शिक्षा निदेशक कार्यालय में आउंटसोर्सिगं के नाम पर बहुत बड़ा खेल का खुलासा तो कमिष्नर साहब जांच करवा कर कर दिया, लेकिन जो कार्रवाई होनी या फिर करवानी चाहिए थी, वह नहीं करवा पाए। जिसका नतीजा फ्राड करने वाली खुषियां मना रहे है, और षिकायत करने वाला अफसोस कर रहा है, कि क्यों उसने कमिष्नर से षिकायत कर दिया। जांच कमेटी ने भी इसके लिए जेडीई को ही जिम्मेदार माना। जांच टीम द्वारा दिनांक 18 फरवरी को मुख्य कोषाधिकारी बस्ती संयुक्त निदेशक माध्यमिक शिक्षा बस्ती मंडल के साथ शिकायतकर्ता की शिकायत को सुनते हुए जांच की गई है।

बता दें कि इस संबंध में जांच समिति द्वारा पत्र संख्या 825 दिनांक 19 मार्च 2026 के माध्यम से उपलब्ध कराई गई। जांच टीम ने पहली नजर में गड़बड़ी निकाली। स्पष्ट कहा गया कि बिड में शिकायत करता के साथ-साथ अन्य फर्म अंतिम रूप से प्रचलित बिड के शर्तों के अनुसार तकनीकी रूप से योग्य नहीं पाई गई। निविदा में कई बिंदुओं पर अनियमितता किये जाने की पुष्टि हुई। जिससे स्पष्ट पता चल रहा है कि जो निविदा विभाग द्वारा आमंत्रित की गई थी उसमें पारदर्षिता नहीं बरती गई है। इसलिए कमिष्नर ने संयुक्त शिक्षा निदेशक बस्ती मंडल को यह निर्देशित किया है कि पूर्व में की गई निविदा को निरस्त करते हुए दोबारा फिर नियमानुसार निविदा आमंत्रित करते हुए अग्रिम कार्रवाई सुनिश्चित कराये और इसके साथ ही उन्होंने निर्देश दिए हैं कि दोषी के विरुद्ध उत्तरदायित्व निर्धारित करते हुए कृत कार्रवाई से उन्हें भी अवगत कराया जाए। यहां तक तो कमिष्नर साहब की कार्रवाई की सराहना हुई, लेकिन उसके बाद जो हुआ, उससे कमिष्नर की कार्रवाई पर सवाल खड़ा कर दिया। जेडीई ने महिष इन्फोटेक प्राइवेट लिमिटेड लखनऊ को भुगतान करने का आदेष दे दिया। अब यह सवाल उठ रहा है, कि क्या जेडीई खुद और लिपिक सहित फर्म के खिलाफ कार्रवाई कर पाएगें, अगर कमिष्नर साहब की ओर से यही पत्र ष्षासन को लिखा गया होता तो तीनों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती हैं, लेकिन जिस फर्म से भारी कमीषन लिया गया, क्या उस फर्म और लिपिक के खिलाफ जेडीई कार्रवाई कर पाएगें, इससे बड़ा सवाल यह है, कि आखिर जेडीई के खिलाफ कौन कार्रवाई करेगा? जेडीई तो खुद अपने खिलाफ कार्रवाई कर नहीं सकते तो फिर कौन करेगा?

‘अमृत वर्मा’ के ‘सिर’ पर ‘सजने’ वाला ‘महामंत्री’ का ‘ताज’!

बस्ती। अगर कोई उलट-पुलट नहीं हुआ, जिसकी संभावना कम है, तो भाजपा के अमृत वर्मा के सिर पर भाजपा जिला महांमत्री का ताज सजने वाला है, इसकी तैयारी भी हो चुकी हैं, एक दो दिन में इसकी घोषणा होने की संभावना जताई जा रही हैं। वैसे नाम तो अन्य लोगों की भी चल रही है। लेकिन वर्माजी के आगे नामों की चर्चा फीकी पड़ जा रही है। वर्माजी के सिर पर यह ताज राम चरन चैधरी के सिर से उतारकर पहनाए जाने की पूरी संभावना है। वैसे भी वर्माजी महामंत्री का कामकाज देख ही रहे है। कहा भी जाता है, कि जिसके सिर पर पूर्व सांसद और वर्तमान जिलाध्यक्ष का हाथ हो, उसे महामंत्री बनने से कौन रोक सकता है। वैसे भी संगठन में जिलाध्यक्ष और महामंत्री का पद ही महत्वपूर्ण होता है। पार्टी इन्हीं दोनों के इर्द गिर्द घुमती रहती है। उपाध्यक्ष कौन होगा और अन्य पदाधिकारी कौन होगें, इसकी चर्चा कम होती है, चर्चा तो महामंत्री पद के लिए हो रही है। वैसे भी जिलाध्यक्ष और भावी महामंत्री के बीच ट्यूनिगं भी बहुत अच्छी है। यह दोनों और पार्टी के अन्य संभावित पदाधिकारी मिलकर पार्टी को कितना गति दे पाएगें यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन सबसे बड़ी परीक्षा 2027 और पंचायत चुनाव में होगा। इससे बड़ी जिम्मेदारी रीढ़विहीन हो चुके असख्ंय कार्यकत्र्ताओं को सहेजना होगा। अगर नई पदाधिकारियों की टीम कार्यकत्र्ताओं को सहेजने में सफल हुई, तो 2027 और पंचायत चुनाव में भाजपा का परचम लहराता दिखाई दे सकता है। वैसे कार्यकत्र्ताओं को सहेजना इतना आसान नहीं होगा, क्यों कि जिन लोगों की जिम्मेदारी सहेजने की है, उन्हीं लोगों के कारण कार्यकत्र्ता रीढ़विहीन हो चुके है, और जब किसी भी पार्टी के कार्यकत्र्ताओं को उसका हक और सम्मान नहीं मिलता तो परिणाम नकारात्मक होता है। जिस तरह पिछले कुछ दिनों से कार्यकत्र्ता पार्टी के पदाधिकारियों से नाराज चल रहे हैं, उसे देखकर नहीं लगता कि कार्यकत्र्ता पार्टी और पार्टी के प्रत्याषी के लिए चुनाव में जीजान लगा पाएगें। खाटी कार्यकत्र्ताओं के स्थान पर जिस तरह पार्टी के विरोधियों और आयातित एवं गांजा-स्मैक तस्करों को लाभान्वित किया गया, उसका जबाव तो कार्यकत्र्ताओं को देना ही होगा।

आखिर ‘कुदरहा’ क्षेत्र ‘में’ ही क्यों ‘फर्जीवाड़ा’ होता?

बस्ती। कुदरहा क्षेत्र को लेकर बार-बार सवाल उठता है, कि आखिर इसी क्षेत्र में इतना फर्जीवाड़ा होता। अभी तक इस क्षेत्र में सबसे अधिक फर्जी तरीके से हास्पिटल, पैथालाजी, अल्टासाउंड ही संचालित हो रहे थे, और जिसके चलते न जाने गरीबों की मौत हो चुकी, अब इस क्षेत्र में फर्जी मेडिकल स्टोर के संचालित होने की षिकायत की गई है।

कुदरहा प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के सामने व आसपास अवैध रूप से संचालित मेडिकल स्टोरों की भरमार है। यहां टंकी मे जीवन रक्षक दवाइयों की बिक्री की जा रही है। यहां दवाओं के रखरखाव का उचित प्रबंध बहुत कम मेडिकल स्टोर के पास है। इतना ही नही जांच की जाये तो बहुत कम दुकानों पर फार्मासिस्ट मिलेंगे। दूर देश मे बैठे डिग्री धारकों की डिग्री लगाकर धड़ल्ले से दवा की दुकानें संचालित की जा रही हैं। हैरानी इस बात की है कि इस मामले मे स्वास्थ्य महकमा मौन है। शिकायतकर्ता ने पाल मेडिकल स्टोर का उदाहरण देते हुये मुख्य चिकित्साधिकारी को पत्र देकर जांच की मांग किया है जिससें अधोमानक की दवाइयों के चककर मे कोई जनहानि न हो और दुकानें अवैध रूप से संचालित न हों। गलती अधोमानक दवाओं की बिक्री करने वालों की नहीं मानी जाएगी, गलती तो एमओआईसी और उन ननद-भौजाई नामक स्टाफ की मानी जाएगी, जो अधिक कमीषन के लिए गरीबों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रहे है। अगर किसी एमओआईसी के क्षेत्र में अधोमानक दवाएं बिकती है, तो इसके लिए सीधे तौर पर एमओआईसी को ही जिम्मेदार माना जाएगा, और यह भी माना जाएगा कि अधोमानक मानक दवाओं की बिक्री में इन्हें भी ननद-भौजाई की तरह कमीषन मिलता है।


 

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