पहले ‘बीडीओ’ बन ‘लूटा’, अब ‘जेडीसी’ बन ‘बहादुरपुर’ को ‘लूट’ रहें!
पहले ‘बीडीओ’ बन ‘लूटा’, अब ‘जेडीसी’ बन ‘बहादुरपुर’ को ‘लूट’ रहें!
बस्ती। अगर आप लोगों को याद नहीं तो हम आप को बता दंे कि 10 जुलाई 23 को जिले में जिला विकास अधिकारी के रुप में निर्मल द्विवेदी का आगमन हुआ। यह पहले ऐसी डीडीओ रहे, जिन्होंने जिले में कदम रखते ही ऐसा ईमानदारी का एचएमवी रिकार्ड पूरे जिले में बजाया कि जैसे इनके जैसा ईमानदार अधिकारी कोई पैदा ही नहीं हुआ। इनकी सारी ईमानदारी उस समय धरी की धरी रह गई, जब इन्होंने मात्र कुछ ही दिनों में 45 करोड़ का घोटाला कर डाला। इनकी ईमानदारी देख तत्कालीन डीएम प्रियंका निरंजन और सीडीओ जयदेव सीएस ने बहादुरपुर के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए विषेष रुप से बहादुरपुर का प्रभारी बीडीओ बनाकर भेजा था। डीएम और सीडीओ सहित पूरे जिले के लोगों का भ्रम उस समय टूटा जब पता चला कि द्विवेदीजी ने बहादुरपुर जाते ही मनरेगा में 45 करोड़ की परियोजना की स्वीकृति 20 से 25 फीसद कमीषन लेकर अनियमित रुप से दे दी, खूब हंगामा हुआ, मीडियाबाजी भी हुई। जांच भी हुई, दोषी भी पाए गए, लेकिन अधिकारियों ने इनका कैरियर बर्बाद न हो इस लिए इन्हें यह सोचकर बचा लिया, कि यह भविष्य में फिर कभी बहादुरपुर जैसा भ्रष्टाचार नहीं करेगें। लेकिन जिन अधिकारियों की फिदरत ही बेईमानी और चोरी करने की रहती हो, उसे चाहें जितना मौका दीजिए, वे नहीं सुधरते है। इनका तबादला तो रातों हो गया, जिसकी किसी को भनक तक नहीं लगी। चुपके से बोरिया बिस्तर बांधा और नोंटों की अटैची उठाई और रात के अंधेरें में निकल लिए। यह पहले ऐसे अनलकी अधिकारी होगें, जिन्हें बिदाई का भी स्वाद चखने का मौका नहीं मिला। अब इनका आगमन फिर बस्ती में हो गया, और इस बार यह मंडल के संयुक्त विकास आयुक्त के रुप में आए, यानि इनका प्रमोषन जिला स्तर के अधिकारी से मंडल स्तर के अधिकारी के रुप में हुआ। बताते हैं, मंडल में इनकी पोस्टिगं में उन्हीं बहादुरपुर के नकली प्रमुखों का हाथ हैं, जिन्होंने इनके बीडीओ प्रभारी रहते खूब मलाई काटा। जो करोड़ों की फाइलें स्वीकृति हुई, उनमें 80 फीसद नकली प्रमुखों के जरिए हुई, यानि एक तरह से नकली प्रमुखों ने बिचैलिया का काम किया, फाइल स्वीकृति के लिए प्रधान इन्हीं नकली प्रमुखों के पास पहले जाते थे, अगर प्रभारी बीडीओ 25 फीसद कमीषन लेते तो यह 30 से 40 फीसद लेते थे, 10 से 15 फीसद कमीषन सर्विस चार्ज के रुप से यह रख लेते थे। चूंकि सब फर्जीवाड़ा होना था, काम तो होना नहीें था, इस लिए प्रधानों ने भी इतनी भारी कमीषन देने में कोई कुरेज नहीं किया।
बता दें कि द्विवेदीजी का बहादुरपुर प्रेम लगभग चार सालों में भी नहीं छूटा। आते ही इन्होंने सबसे पहले बहादुरपुर के ग्राम पंचायतों की जांच करना षुरु किया। कहना गलत नहीं होगा, कि बहादुरपुर छोड़कर यह जिले के बाहर तो क्या जिले के अन्य किसी ब्लाॅक में जांच करने नहीं गए। जब इसकी याद एमएलसी प्रतिनिधि हरीष सिंह ने दिलाई और कहा कि जेडीसी साहब आप सिर्फ बस्ती के जेडीसी नहीं हैं, अन्य दो जिलों के भी है, वहां भी जांच करने जाइए, क्यों सिर्फ बहादुरपुर के प्रधानों और सचिवों की ही जांच कर रहे है। जिन-जिन ग्राम पंचायतों की इन्होंने जांच किया, उनके प्रधानों ने बताया कि साहब जांच के नाम पर एक-एक लाख ले गए। इसकी षिकायत कमिष्नर से भी की गई। यह अब तक बेईली, खलीलपटटी एवं सोनबरसा ग्राम पंचायतों की जांच कर चुके हैं, अब आप सोच रहे होगें कि नकली प्रमुख के ग्राम पंचायत खलीलपटटी क्यों जांच करने गए, यह इस लिए जांच करने गए कि नकली प्रमुख और खलीलपटटी के प्रधान में नहीं जमती। प्रधानों की माने तो यह अब तक तीन ग्राम पंचायतों की जांच में तीन लाख की वसूली कर चुके है। तीन ग्राम पंचायतों की जांच के बाद इन्होंने इसी ब्लाॅक के ग्राम पंचायत फूलपुर, मटेरा, कम्हरिया, हथिया प्रथम एवं हथिया द्वितीय की जांच करने का कार्यक्रम बनाया है। बीडीओ ने उक्त ग्राम पंचायत के सचिवों से तीन प्रतियों में बुकलेट तैयार कर 18 मार्च 26 से पहले हर हाल में जमा करने को निर्देष/आदेष जारी किया है।
चूंकि द्विवेदीजी को बहादुरपुर के ग्राम पंचायतों के भ्रष्टाचार के बारे में अच्छी तरह मालूम हैं, प्रधानों का कहना है, कि इसी लिए उन्हीं ग्राम पंचायतों को निषाना बनाया जा रहा है, और यह निषाना जांच और निरीक्षण के नाम पर धन उगाही के लिए बनाया जा रहा है। हो सकता है, कि इसी बहाने नकली प्रमुख भी अपना निषाना साध रहे हों। पिछले लगभग पांच सालों में ग्राम पंचायतों में मनरेगा और अन्य योजनाओं में लूट के आलावा और कुछ नहीं हुआ। बीडीओ, प्रधान, सचिव, एनआरपी, जेई, रोजगार सेवक, कम्प्यूटर आपरेटर और तकनीकी सहायकों ने इतने सालों में कौन सा गुल खिलाया यह सभी को मालूम है। ऐसे में जांच करने की क्या मंषा हो सकती हैं, यह किसी से छिपी नहीं रही। जांच और निरीक्षण के नाम पर सभी ने भ्रष्ट प्रधानों और सचिवों को यह जानकर लूटा जा रहा है, कि जिसने सरकारी योजना को लूटा, उसे लूटने में कोई बुराई नहीं है। जिले में द्विवेदीजी का कार्यकाल 10 जुलाई 23 से चार नवंबर 23 तक रहा, यानि मात्र चार माह से भी कम समय में अगर कोई अधिकारी करोड़ों की अटैची लेकर जिले से जाता है, तो उसका मन बार-बार बस्ती आने को कहेगा। वैसे भी अव्वल बस्ती में कोई अधिकारी आना नहीं चाहता हैं, आ जाता है, तो जाना नहीं चाहता। एक एडीएम स्तर के अधिकारी कहकर बस्ती से गए कि उन्होंने जितना पैसा बस्ती में बनाया, उतना पूरी जिंदगी में नहीं बनाया, ऐसा हैं, हमारा बस्ती। भले ही चाहे जिले का विकास हो या न हो, लेकिन अधिकारियों और नेताओं का अवष्य होता है। ऐसा लगता है, कि मानो द्विवेदीजी अधूरे सपने को पूरा करने के लिए बस्ती आएं हैं, और बहादुरपुर को निषाना बना रहे है।
जब ‘डिप्टी सीएमओ’ साहब ‘बंटी-बबली’ लेगें तो ‘जांच’ क्या ‘करेंगें’?
बस्ती। अगर डिप्टी सीएमओ स्तर के अधिकारियों का स्तर 55 वाला बंटी और बबली का रहेगा तो सीएचसी, पीएचसी के एमओआईसी और फार्मासिस्टों का क्या स्तर होगा? इसका अंदाजी आसानी से लगाया जा सकता है। यह आरोप डिप्टी सीएमओ डा. एके चैधरी और डा. एसबी सिंह पर लगाते हुए तहसील दिवस में षिकायतकत्र्ता उमेष गोस्वामी ने डीएम से कहा कि मैडम जब डिप्टी सीएमओ बंटी बबली लेगें तो यह जांच क्या करेगें, और इनके जांच रिपोर्ट पर भरोसा कोई कैसे करेगा? यह आरोप कुदरहा के ग्राम पंचायत उजियानपुर में बेसमेंट में संचालित हो रहें प्रकाष नर्सिगं होम की जांच में बंटी बबली लेकर बिना जांच किए कूटरचित तरीके से रिपोर्ट लगाने के मामले में दोनों डिप्टी सीएमओ पर लगाया गया।
मानो सीएमओ, डिप्टी सीएमओ डा. एके चैधरी, डा. एसबी सिंह और डा. बृजेष षुक्ल ने तय कर लिया कि चाहें कोई जो भी आरोप लगाए, वे सुधरने वाले नहीं है। सुधरने का मतलब आर्थिक नुकसान करना। यह लोग गाली खा लेगें, गंभीर से गंभीर आरोप झेल लेगें, लेकिन सुधरेगें नहीं। कोई इन्हें लिखित में 55 रुपया वाला बंटी और बबली लेने का आरोप लगाता है, और यह फिर भी चुप रहतें हैं, हंसकर टाल देते है। गोस्वामी ने लिखा कि मैडम में हम राजस्व निरीक्षक दिलीप कुमार और जेई विनोद कुमार की रिपोर्ट से पूरी तरह संस्तुष्ट हैं, लेकिन दोनों डिप्टी सीएमओ के कूटरचित रिपोट्र से संतुष्ट नहीं हैं, क्यों कि दोनों ने नर्सिगं होम वाले से 55 वाला बंटी और बबली लिया है। इस नर्सिगं होम का मामला उस समय सामने आया जब पहली मार्च 23 को ओमप्रकाष ने पिपरपाती में पटेल हास्पिटल में पंडोहिया चकिया की रहने वाली गुड़िया यादव की गलत आपरेषन कर दिया गया। मामला तूल पकड़ा तो ओमप्रकाष चैधरी ने हास्पिटल को बंद कर दिया, और कुदरहा में आकर भवन मालिक षुभम सिंह एवं कुदरहा सीएचसी में तैनात एएनएम इंचार्ज विनोदा सिंह से उनके खाली आवास को किराए पर ले कर प्रकाष नर्सिगं होम नाम से हास्पिटल खोल दिया, यह हाहस्पटल बेसमेंट में नियम विरुद्व संचालित हो रहा है। कोई आपातकालीन खिड़की नहीं फायर बिग्रेड का इंतजाम नहीं, एक अखबार को दिए बयान में डा. एसबी सिंह और तत्कालीन सीएमओ दूबेजी के बयान विरोधाभाषी है। कहा कि अगर महिला का गलत आपरेषन करने वाला नाम बदल कर दूसरा हास्पिटल खोल लेता है, तो कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन डा. एसबी सिंह कार्रवाई करने के बजाए कूटरचित तरीके से रिपोर्ट लगा रहे हैं। लाइसेंस को निलंबित करने की मांग की गई, यह भी कहा गया कि पीएचसी कुदरहा में जो भी डिलीवरी का केस आता है, उस केस को उषा नाम की आषा कमीषन के चक्कर में केस को प्रकाष नर्सिगं होम को भेज देती है, जहां पर महिला और उसके परिजन का दोहन किया जाता है। कहा कि जब तक बस्ती में डा. एके चैधरी और डा. एसबी सिंह जैसे डिप्टी सीएमओ रहेगें, तब तक प्रकाष नर्सिगं होम जैसा हास्पिटल चलता रहेगा, और मरीज मरते रहेगें। मामले की जांच मेडिकल कालेज, महिला अस्पताल और पुलिस की जांच टीम बनाकर जांच करने की मांग की गई।
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‘मत’ करना ‘नगर पंचायत गायघाट’ की ‘षिकायत’, वरना खैर ‘नहीं’!
बस्ती। जो नगर पंचायतें अनियमितता की षिकायत करने वालों को देख लेने और परिणाम भुगतने जैसी धमकी देते हैं, उस नगर पंचायत और उसके संचालक को वहां की जनता कमजोर और डरपोक मानती है। जो नगर पंचायतें षिकायतों का स्वागत और उसका निस्तारण करने के बजाए अगर षिकायतों को ही दबाने और षिकायतकत्र्ता को ही देख लेने की बातें करती है, तो वह नगर पंचायत कभी आदर्ष नहीं बन सकता, भले ही सरकार ने उसे आदर्ष नगर पंचायत के रुप में विकसित करने के लिए दो-तीन करोड़ दिया हो, लेकिन जब तक नगर पंचायतें क्षेत्र की जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरेगीं, तब तक न तो नगर पंचायतें और न उसे संचालित करने वाले ही आदर्ष बन सकते है। जिस तरह चुनाव प्रचार के दौरान चेयरमैन के प्रत्याषी विकास की गंगा बहाने और नगर पंचायत को आइडिएल बनाने की बातें कह कर जीताने की अपील करते हैं। जीतने के बाद वह विकास की गंगा बहाने के बजाए भ्रष्टाचार की गंगा बहाने में लग जाते है। ऐसे में अगर कोई सवाल उठाता है, तो कौन सा गलत करता? जिसके वोट पर वह पांच साल तक राज करते हैं, उसी को धमकाते हैं। अगर किसी नगर पंचायत में भ्रष्टाचार की गंगा बहती है, तो इसके लिए सिर्फ चेयरमैन या फिर चेयरमैन की बागडोर संभालने वाले ही जिम्मेदार नहीं होते, बल्कि वे सभासद अधिक जिम्मेदार होते हैं, जो छोटा-मोटा ठेकापटटी और लालच के लिए चुप रहते है। नगर पालिका में तो सभासदों की हलचल कभी-कभार दिखाई भी दे जाती है, लेकिन नगर पंचायतों में तो आवाज तक नहीं सुनाती देती, बाहर सभी चेयरमैन के भ्रष्टाचार की बातें करते हैं, लेकिन अंदर उसका विरोध नहीं करते, जनता की नुमाइदगी करने वाले ही जब खामोष हो जाएगें, तो नगर पंचायत भ्रष्टाचार की आग में जलेगा ही। जो आइडिएल बन सकते थे, और जो अपने नगर पंचायत को आईडिएल बना सकते हैं, वह भी भ्रष्टाचार के बोझ के तले दब गए। ऐसे में जनता आखिर किसे नगर पंचायत की बागडोर सौंपे? यह भी सही है, कि एक बार चेयरमैन बन जाने के बाद उनका वजूद ही समाप्त हो जाता है, पैसा भले ही उनके पास हो जाता है, लेकिन जो मान और सम्मान चेयरमैन बनने के पहले था, वह नहीं रह जाता, लोग कहने लगते हैं, कि देखो नगर पंचायत और नगर पालिका को लूटने वाला जा रहा है। ऐसे लोगों का परिवार भी प्रभावित होता। ऐसे लोगों के बीबी और बच्चों को लोग चोर की नजर से देखते और समझते है। जो लोग भ्रष्टाचार का विरोध करते हैं, उन्हें अगर कुर्सी पर बैठने का मौका मिल जाए है, तो पहले वाले चेयरमैन से अधिक भ्रष्टाचार करने लगते है। कहने का मतलब जिसे मौका मिला, वह बेईमान और जिसे नहीं मिला वह ईमानदार। यही सच है।
हम बात कर रहे थे, नगर पंचायत गायघाट की। यहां के धमेंद्र पासवान ने पीएम को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने लिखा तो बहुत कुछ, लेकिन इस पत्र से पता चलता है, कि अगर इस नगर पंचायत के खिलाफ कोई आवाज उठाता है, उसकी खैर नहीं होती, उसे दबाने का प्रयास किया जाता है। अगर बात यही तक रह जाए तो भी ठीक हैं, लेकिन अगर क्राइम करने की बातें की जाए तो वह गलत है। क्षेत्र के हर नागरिक को यह जानने का अधिकार हैं, कि उसके विकास के नाम पर आए धन का उपयोग हुआ या दुरुपयोग। यह अधिकार उन लोगों को भी है, जो षिकायत करने या फिर आरटीआई के तहत जानकारी मांगने पर धमकी देते हैं। धमकी देने के बजाए अगर षिकायतकत्र्ता को संतुष्ट करने का प्रयास करें तो अनेक गंभीर आरोपों से बचा जा सकता है। सवाल उठ रहा है, कि आखिर नगर पंचायतें क्यों आरटीआई का मौका देती है? क्यों नहीं वह अपनी उपलब्धियों को हर साल बुकलेट के जरिए जनता को बताती हैं? बिडंबना यह है, कि लगभग तीन साल बीत गए, लेकिन दस नगर पंचायत और एक नगर पालिका में से किसी ने भी अपनी उपलब्धियों को बुकलेट के जरिए क्षेत्र की जनता को नहीं बताया। सवाल उठ रहा है, कि जब हर साल नगर पंचायतों को राज्य और 15वां वित्त आयोग से करोड़ों रुपया मिलता है, तो उस पैसे का जनता को हिसाब किताब देने में क्या नुकसान? यह भी नहीं कि धन खर्च नहीं हुआ होगा, जब धन खर्च हुआ तो फिर उसे जनता को बताने में क्या परहेज? नगर पंचायतें जब तक अपने क्षेत्र की जनता के प्रति ईमानदार नहीं होंगी, तब तक बेईमानी और चोरी का आरोप लगता रहेगा। अगर किसी नगर पंचायत की जनता को पीएम को यह लिखना पड़े कि अगर उसे या फिर उसके परिवार को कुछ हो गया तो नगर पंचायत के चेयरमैन से लेकर उसे चलाने वाले और उसके भाई जिम्मेदार होगें, तो समझ लेना चाहिए, वह नगर पंचायत अपने मकसद में कामयाब नहीं है। अगर कोई चेयरमैन या नगर पंचायत का संचालन करने वाला यह सोचता है, कि उसका तो सबकुछ नगर पंचायत ही है, तो वह गलत सोचता है, पांच साल के बाद उसे फिर उन्हीं लोगों के बीच जाना पड़ सकता, जहां पर वह हाथ जोड़कर वोट मांगने गए थे। नेताओं का जनता का एहसान कभी नहीं भूलना चाहिए, जिसने भूला उसका हर्ष पूर्व सांसद और चार हारे हुए एमएलए की तरह हो जाएगा। जिस भी नेता ने पद और कुर्सी का सम्मान नहीं किया, उस नेता का सम्मान कुर्सी भी नहीं करती। अगर नगर पंचायत गायघाट के लोग अपने ही चेयरमैन और बागडोर संभालने वालों से असुरक्षित महसूस कर रहें हैं, तो उस नगर पंचायत के जिम्मेदारों को खुद की और नगर पंचायत के कामकाज की समीक्षा करनी चाहिए।
‘चैधरी’ साहब बहुत ‘लूटा’, अब ‘तो’ रहम ‘करिए’
बस्ती। वर्ष 2006 से तैनात रहने वाले डॉ अशोक कुमार चैधरी उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी नोडल पीसीपीएनडीटी के लूटखसोट से लोग इतना तगं आ चुके हैं, कि अब तो यह कहने लगें हैं, कि चैधरी साहब बहुत लूट लिया, अब तो जिला छोड़ दीजिए, अभी जिला छोड़ दीजिए, कुछ दिन बाद भले ही चले आइएगा, लेकिन जाइए। बात भाकियू भानु गुट के मंडल प्रवक्ता चंदे्रष प्रताप सिंह ने अपर मुख्य सचिव से पत्र लिखकर कही। कहा गया कि इनका
बस्ती से स्थानांतरण और इनके संपत्ति की जांच कराने की मांग की है। कहा गया कि भ्रमण के दौरान तमाम जनमानस द्वारा डॉ एके चैधरी उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी बस्ती के बारे में मानव संपदा सहित अवगत कराया गया है कि डॉ अशोक कुमार चैधरी वर्ष 2006 से ही बस्ती जनपद में तैनात है। जिनका घर बस्ती जनपद की सीमा तिलौली सिद्धार्थनगर जनपद में है डॉ अशोक कुमार चैधरी बस्ती के रुधौली में अपना घर बनवा कर निवास करते हैं। रुधौली तहसील मुख्यालय से लगभग 12-15 किमी पर ही इनका पैतृक घर है, जो सिद्धार्थनगर जनपद में है तिलौली सिद्धार्थनगर में व रुधौली में डाक्टर अशोक कुमार चैधरी का बिना पंजीकरण अस्पताल भी चलता है। डॉ अशोक कुमार चैधरी अपने कदाचार व भ्रष्टाचार को लेकर हर दिन स्थानीय समाचार पत्रों के सुर्खियों में रहते हैं। डॉ अशोक कुमार चैधरी के पास वर्तमान में पीसीपीएनडीटी व झोलाछाप डॉक्टर के नोडल अधिकारी हैं जब से डाक्टर एके चैधरी साहब नोडल हुए हैं तब से पूरे जिले में झोलाछाप डॉक्टरों व अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटरों की बाढ़ आ गई है जनमानस ने यह भी अवगत कराया कि पूरे जिले में जितने अल्ट्रासाउंड सेंटर संचालित होते हैं उन सभी सेंटरों से प्रतिमाह 5000 हजार व जिले में लगभग 10 हजार से ऊपर झोलाछाप डॉक्टर है प्रति झोलाछाप डॉक्टर 10000हजार की अवैध वसूली डाक्टर साहब नोडल अधिकारी को जाता है गोपनीय जांच कराने से डाक्टर अशोक कुमार चैधरी के कदाचार भ्रष्टाचार की कलाई परत दर परत खुल जाएगी इस अवैध वसूली में आधा हिस्सा मुख्य चिकित्सा अधिकारी को जाता है सीएमओ कार्यालय बस्ती व इसके अधिकारी बाबू भ्रष्टाचार में नित नया कृतिमान बना रहे हैं तत्कालीन सीएमओ डॉ आर एस दूबे के वृहद भ्रष्टाचार का मामला हर जन मानस की जुबान पर है सीएमओ कार्यालय बस्ती भ्रष्टाचार का उद्गम स्थल बन गया है भ्रष्टाचार की गंगोत्री सीएमओ कार्यालय से ही निकलता है सरकार शासन भ्रष्टाचार पर आंख बंद कर भ्रष्टाचारियों के मनोबल को बल दे रहे हैं जीरो टॉलरेंस नीति ही भ्रष्टाचार नीति बन गया है डॉ अशोक कुमार चैधरी पर जो वर्ष 2006 से तैनात है उनपर स्थानांतरण नीति शासनादेश लागू न होना भी संदेहास्पद है और इससे शासन की मंशा भी पता चलता है ऐसी दशा में डाक्टर अशोक कुमार चैधरी उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी बस्ती नोडल अधिकारी पीसीपीएनडीटी व झोलाछाप डॉक्टर का स्थानांतरण किया जाना व इनके कदाचार भ्रष्टाचार का उच्च स्तरीय गोपनीय जांच कराया जाना आवश्यक न्यायोचित है तभी जीरो टॉलरेंस नीति सार्थक है।
‘भ्रष्टाचार’ का ‘केंद्र’ बना जेडीई ‘कार्यालय’
बस्ती। सुनकर आप लोगों को अजीब लग रहा होगा, कि संयुक्त षिक्षा निदेषक यानि जेडीई कार्यालय को साहब नहीं बल्कि आलोक दूबे चला रहे है। कोई भी सही या गलत निर्णय लेने से पहले साहब दूबेजी से अवष्य राय लेते है। दूबेजी साहब के इतने चहेते और कमाउपूत हैं, कि इनके लिए यह सारे नियम कानून को भी तोड़ने को तैयार रहते है। साहब को इस बात की चिंता नहीं रहती है, कि अगर उन्होंने दूबेजी के कहने पर गलत किया तो उनकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है। कार्यालय के लोग कहते हैं, न जाने क्यों साहब दूबेजी पर आंख बंदकर भरोसा करते है। तभी तो साहब ने इन्हें सबसे अधिक मलाईदार पटल यानि लनपद भानपुर के तहसील हर्रैया, भानपुर के अषासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विधालयों के अन्तर्जनपदीय स्थानान्तरण सबंधी कार्य के आलावा अषासकीय सहायता प्राप्त/वित्त पोषित संस्ृित माध्यमिक विधालयों, महाविधालयों की परीक्षा से संबधित कार्य, राजकीय कर्मचारियों के एसीपी संबधी प्रकरण का निस्तारण, आकस्मिक अवकाष पंजिका एवं आवागमन पंजिका का रखरखाव एवं संयुक्त षिक्षा निदेषक द्वारा सौंपे गए अन्य कार्य षमिल है। ध्यान देने वाली बात यह है, कि तत्कालीन जेडीई डा. ओम प्रकाष मिश्र ने इनके अनियमित कार्यकलापों को देखते हुए इनका पटल बदलकर विनय कुमार उपाध्याय प्रषासनिक अधिकारी को दे दिया, लेकिन जैसे ही जेडीई आनंदधर पांडेय आए इन्होंने भ्रष्ट लिपिक आलोक कुमार दूबे को मलाईदार पटल वापस दे दिया। जब से दूबेजी को पुनःमलाईदार पटल मिला तब से साहब और दूबेजी दोनों मिलकर लूट रहे है। कार्यालय के लोगों का कहना है, कि साहब का दूबेजी का प्रेम किसी दिन साहब को लू डूबेगा, तब साहब को पता चलेगा कि जिससे वह इतना प्रेम करते थे, उसके चलते वह फंस गए। वर्तमान में दूबेजी ने आउटसोर्सिगं के मामले में जेडीई को फंसा दिया। कमिष्नर की जांच टीम ने जिस तरह इस मामले में जेडीई और दूबेजी को दोषी माना उससे पता चलता है, कि साहब और दूबेजी मिलकर इससे पहले न जाने कितना गुल खिला चुके है। अब सवाल उठ रहा है, कि कमिष्नर साहब ने उस जेडीई को दूबेजी के खिलाफ कार्रवाई करने को लिख दिया, जिसके सह पर दूबेजी ने इतना बड़ा खेल खेलने का प्रयास किया। जिस तरह आउटसोर्सिगं वाली फर्म महिष इन्फोटेक व्रा. लि. लखनउ को नियम विरुद्व ठेका देना का साहब और दूबेजी ने मिलकर प्रयास किया, उससे दोनों के भ्रष्टाचार का पता चला चलता है। इससे पहले भी दूबेजी पर अनेक गंभीर आरोप लग चुके है। यह अपना मूल काम नहीं करते बाकी सब करते है। देखना यह है, कि क्या साहब अपने कमाउपूत के खिलाफ कार्रवाई कर पाएगें? वैसे देखा जाए तो कार्रवाई जेडीई के खिलाफ भी होना चाहिए, क्यों कि जो अनियमित ठेका देने का प्रयास किया गया, उसमें साहब की भी रजामंदी हैं, और साहब के रजामंदी के बिना दूबेजी की इतनी हिम्मत नहीं कि वह इतना बड़ा खेल खेल सके। फोटो-02
‘षिक्षा’ के ‘क्षेत्र’ में ‘डा. वीके वर्मा’ का एक और ‘कदम’!
बस्ती। षिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में डा. वीके वर्मा का कोई सानी नहीं। दोनों क्षेत्रों के प्रति इनकी ईमानदारी और लगन देखने लायक होती है। जिस तरह इन्होंने अपने क्षेत्र में प्राइमरी से लेकर इंटर तक के स्कूलों का जाल बिछाया, उसका सबसे अधिक लाभ क्षेत्र के गरीब परिवार के बच्चों को मिल रहा है। वैसे भी षिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र को सबसे अधिक उपयोगी माना जाता है। इन दोनों क्षेत्रों में काम करने का श्रेय बहुत कम लोगों को मिलता है। इन्हीं में एक हैं, डा. वीके वर्मा। इन दोनों क्षेत्रों में जितना नाम और इज्जत इन्होंने कमाया वह बहुत कम लोगों को नषीब हुआ। इसी क्रम में इन्होंने लोहरौली तिलकपुर में श्रीश्यामलाल वर्मा पूर्व माध्यमिक विद्यालय के नये भवन का शिलान्यास किया। यह षिलान्यास विधायक कविन्द्र चैधरी अतुल ने किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की अलख जगाने वालों की भूमिका महत्वपूर्ण है। विद्यालय के निर्माण और विकास के लिये विधायक के रूप में उनकी भूमिका सदैव बनी रहेगी। कहा कि जिस तरह डा. वीके वर्मा षिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में अलख जला रहें हैं, वह सरायनीय है।
विद्यालय के संस्थापक प्रबंधक होम्योपैथ के वरिष्ठ चिकित्सक डा. वी.के. वर्मा ने कहा कि इस अंचल में शिक्षा क्षेत्र में निरन्तर प्रयास जारी है। इसी कड़ी में श्रीश्यामलाल वर्मा पूर्व माध्यमिक विद्यालय की आधारशिला रखी गई है। निदेशक डा. आलोक रंजन वर्मा ने कहा कि अति शीघ्र विद्यालय अपना आकार ले लेगा। शिलान्यास अवसर पर आयोजित कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कवि डा. रामकृष्ण लाल ‘जगमग’ ने किया। इस अवसर पर मुख्य रूप से राम सुरेश चैधरी, ई. रघुनाथ पटेल, डा. सी.एम. पटेल, चन्द्रशेखर वर्मा, राम प्रसाद चैधरी, ई. चन्द्रशेखर, विजय प्रकाश चैधरी, डा. वीरेन्द्र यादव, आलोक त्रिपाठी, राम पूरन चैधरी, अखिल यादव, घनश्याम यादव, अफजल हुसेन अफजल, जगनरायन वर्मा, शिव प्रसाद चैधरी, वीरेन्द्र वर्मा, अमरेश चैधरी, विशाल गुप्ता, शंकर यादव, अर्जुन के साथ ही बड़ी संख्या मेंस्थानीय नागरिक और शिक्षक उपस्थित रहे।


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