आज’ का ‘गांजा-‘स्मैक’ तस्कर, ‘कल’ का ‘सांसद’, ‘विधायक’ और ‘प्रमुख’!
‘आज’ का ‘गांजा-‘स्मैक’ तस्कर, ‘कल’ का ‘सांसद’, ‘विधायक’ और ‘प्रमुख’!
बस्ती। भाजपा के लोगों को गन्ना माफिया, गांजा और स्मैक के तस्करों को चेयरमैन एवं सभासद बनाने में कोई परहेज नहीं हैं, बस इनकी जेबें भरनी चाहिए। भाजपा के लोगों को तो छुटभैया और आयातित नेताओं के मनई, तनई, हरवाह, चरवाह, चालक और चपरासी को नगर पंचायतों का चेयरमैन और प्रमुख बनाने से भी परहेज नहीं हैं, इन्हें परहेज हैं, तो सिर्फ उन खाटी कार्यकत्र्ताओं से जिन्होंने अपनी जवानी को भाजपा के लिए दरी बिछाने और झंडा ढ़ोने में समर्पित कर दिया। कहा जाता है, कि जब तक भाजपा के स्थानीय संगठन के लोग अपने कार्यकत्र्ता और पार्टी के प्रति ईमानदार नहीं होगें, तब तक गन्ना माफिया, गांजा और स्मैक तस्करों को कुर्सी मिलती रहेगी। अगर भाजपा इनमें किसी को कल को सांसद, विधायक या फिर प्रमुख बना दे तो चैकिएगा मत। क्यों कि नेता ऐसे लोगों को ही टिकट देने की पैरवी करते हैं, या फिर उनका नाम भेजते हैं। इन्हें इस बात से कोई लेना-देना नहीं रहता कि पार्टी के कार्यकत्र्ता इससे कितने नाराज और हताष होगें, और पार्टी की छवि कितनी खराब होगी? वोटर क्या सोचेगें, तक कि इन्हें परवाह नहीं रहती।
जिले के लोग यह देख चुके हैं, कि किस तरह नीजि लाभ और अपने ही लोगों को पटकनी देने के लिए भाजपा के लोगों ने ही पार्टी को दांव पर लगा दिया, खुद की मंषा तो पूरी हो गई, लेकिन पार्टी को कितना नुकसान हुआ, इसका अंदाजा जेबें भरने वालों को नहीं होगा। जो प्रदेष अध्यक्ष पार्टी के कार्यकत्र्ताओं को ही सबकुछ मानता हो, अगर उसके रहते कार्यकत्र्ता उपेक्षित होते हैं, और उनके स्थान पर गन्ना माफिया, गांजा और स्मैक के तस्करों को तरजीह दी जाती है, तो ऐसे प्रदेष अध्यक्ष के होने और न होने से प्रदेष की जनता और कार्यकत्र्ताओं से क्या मतलब? जब हानि ही होनी है, और पार्टी को गर्त में ही जाना है, तो चाहें पंकज चैधरी हों या फिर चाहे भूपेंद्र चैधरी हों, क्या फर्क पड़ता है? जिस राज्य का मुखिया, प्रदेष अध्यक्ष और जिलाध्यक्ष कमजोर होतें हंै, उस राज्य और जिले में सबसे अधिक भ्रष्टाचार होता है, उस राज्य और जिले की जनता परेषान रहती है, और सबसे अधिक उपेक्षा का षिकार पार्टी के खाटी कार्यकत्र्ता होते हैं। कहने को भले ही नेता कार्यकत्र्ताओं को पार्टी की रीढ़ कहें, लेकिन सच्चाई यह है, कि आज पार्टी का कार्यकत्र्ता रीढ़विहीन हो गया, और इसके लिए कार्यकत्र्ता उन नेताओं को जिम्मेदार मान रहें हैं, जिन्होंने कार्यकत्र्ताओं को न सिर्फ ठगा बल्कि उनका राजनैतिक भविष्य भी बर्बाद कर दिया। यह भी सही है, कि जिस पार्टी और जिन नेताओं का सहयोगी गांजा और स्मैक के माफिया जैसे लोग हों, उस पार्टी को गर्त में जाने से कोई रोक नहीं सकता। जब से मीडिया में हुड़वा कुंवर के बाबू साहब का नाम सुखर््िायों में आया, तब से यह चर्चा का केंद्र बने हुए है। जानता तो इन्हें हर कोई था, और तबी जबान से जिक्र भी करता था, लेकिन खुले आम इनका नाम लेना नहीं चाहता, कारण कभी बड़े तो कभी छोटे माननीय का चहेता होना। इन्होंने पार्टी और अपने आकाओं का इतना नुकसान किया, जिसकी भरपाई संभव नहीं। जो और बातें बाबू साहब के बारे में छन कर आ रही है, वह और भी लोगों के लिए हैरान करने वाली हो सकती है, वैसे इसकी भी जानकारी हर्रैया के बच्चे-बच्चे और नेताओं एवं मीडिया को है। मीडिया में आने के बाद बाबू साहब के बारे में जो अन्य बातें छन कर आ रही है, अगर वह सच है, तो पूरे समाज और भाजपा के लिए हानिकारक है। बताया जाता है, कि बाबू साहब के एक जीजाजी है, जो अंबेडकरनगर में सिपाही हैं, और जो काफी चर्चित सिपाही है। बताते हैं, कि साले को गांजा और स्मैक के कारोबार में लाने का श्रेय जीजा को ही जाता है। यह भी कहा जाता है, कि यह जो कभी सांसद और विधायक का स्टीकर लगाकर चलते थे, उसके पीछे भौकाल बनाना नहीं, बल्कि उस स्टीकर की आड़ में गांजा और स्मैक की तस्करी करना रहा। उड़ीसा को गांजे का भंडार माना जाता है, उड़ीसा से ही सांसद और विधायक का स्टीकर लगे हुए कार से गांजा वाया सोनभद्र होते हुए अबेंडकरनगर लाया जाता, चूंकि वाहन पर कभी सांसद तो कभी विधायक का स्टीकर लगा रहता था, इस लिए कोई रोकता नहीं था, टोल प्लाजा वाले भी माननीय होने के नाते टोल टैक्स नहीं लेतें। अबेंडकरनगर से ही पूर्वांचल के जिलों में गांजा की सप्लाई होती है। अब आप समझ गए होगें कि अगर ऐसा व्यक्ति जो बड़े और छोटे माननीय का इतना करीबी रहा, कि जो सांसद और विधायक का स्टीकर लगाकर गांजा की तस्करी करता हो, वह व्यक्ति कैसा होगा? और अगर भाजपा वाले ऐसे व्यक्ति को सांसद, विधायक और प्रमुख बना देगें तो क्या होगा? इसे आसानी से सोचा और समझा जा सकता है। ऐसे लोगों के कारण ही बड़े माननीय को हार का सामना करना पड़ा, वह तो अच्छा हुआ कि छोटे माननीय ने इन्हें मुक्त कर दिया, वरना इन्हें भी 2027 में खामियाजा भुगतना पड़ता।
‘डीडी’ साहब बताइए, रिपोर्ट ‘लगाने’ में ‘कितने’ में ‘बिके’?
बस्ती। प्रदेष में बिकने का रिकार्ड बनाने वाले उप निदेषक कृषि कितनी बार बिकेगें और कितनी बार बिकने का रिकार्ड बनाएगें, यह सवाल बना हुआ है। वेतन, योजना और मलाईदार पटल बेचने के मामले में तो इनकी चर्चा हो ही रही हैं, लेकिन अब तो इनकी चर्चा जांच रिपोर्ट और आरोपियों को बचाने के मामले में बिकने की भी चर्चा हो रही है। डीडी साहब ने वरिष्ठ लिपिक पुनीत पांडेय के स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति के मामले में जो रिपोर्ट लगाया, उससे पता चलता है, कि इन्होंने मामले का निस्तारण नहीं किया और न इस बात का निस्तारण किया कि जो स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति दी गई, वह नियम से दी गई, या नियम विरुद्व दी गई। बजाए ऐसी आख्या दे दी जिसका निस्तारण ही इन्हें नहीं करना था, षिकायत और जांच इस बात की हो रही हैं, कि क्या तत्कालीन प्रभारी जिला कृषि अधिकारी डा. राज मंगल चैधरी ने पुनीत पांडेय को जो स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति देने का निर्णय लिया, वह सही है, या गलत? अब जरा इनके उस जांच आख्या पर नजर डालिए। उच्चधिकारीगण, डीडी साहब से स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति के मामले में रिपोर्ट मांग रहे हैं, और यह डा. राजमंगल चैधरी के बचाव वाला रिपोर्ट दे रहें है। यह ऐसे अधिकारी के बचाव में रिपोर्ट दे रहें, जिन्होंने असवेंदनषीलता का परिचय दिया। 155 दिन का अर्जित अवकाष होने के बावजूद इन्होंने अवकाष को स्वीकृति नहीं किया, बल्कि अस्वीकृति करते हुए नियम विरुद्व और जबरिया स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति कर दिया, सेवा निवृत्ति करने से पहले नोटिस भी जारी नहीं किया, और न जांच कमेटी का गठन ही किया। इन्होंने लिपिक के माताजी की बीमारी को महत्वपूर्ण नहीं माना, जबकि कोई भी सरकारी कर्मचारी इसी दिन के अलिए अर्जित अवकाष को सुरक्षित रखता है, ताकि उसे आवष्यकतानुसार इस्तेमाल कर सके।
खास बात यह है, कि इन्होंने सेवा निवृत्ति करने का आदेष देने से पहले निदेषालय से भी अनुमति नहीं ली और न उन्हें इस मामले में अवगत ही कराया, जब इस मामले में निदेषालय की ओर से इस बात का स्पष्टीकरण मांगा गया कि स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति करने से पहले इस प्रकरण को उच्चाधिकारियों के संज्ञान में क्यों नहीं लाया गया? इसका जबाव आज तक न तो जेडीए और न डीडी की ओर से दिया गया।
अब जरा डीडी साहब के उस रिपोर्ट के निष्कर्ष के बारे में जान लीजिए। इन्होंने लिखा कि पुनीत कुमार पांडेय के द्वारा स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति की औपचारिक नोटिस नहीं दी गई, जैसा कि अभिलेखों से स्पष्ट होता है। अंत में इन्होंने लिखा कि पुनीत पांडेय के अनिवार्य सेवा निवृत्ति के लिए स्क्रीनिगं कमेटी की संस्तुति के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है। अब जरा देखिए, पीड़ित व्यक्ति स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति करने को चुनौती दे रहा है, और बार-बार लिख रहा है, कि उसे मनमाने तरीके से स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति दी गई, और डीडी साहब यह रिपोर्ट लगा रहे हैं, कि इनके अनिवार्य सेवा निवृत्ति के लिए स्क्रीनिगं कमेटी गठित की जाए। बात और लिखा पढ़ी स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति की हो रही है, निस्तारण भी इसी को करने के लिए अधिकारी लिख रहे हैं, लेकिन डीडी साहब ने जो रिपोर्ट लगाया, वह अनिवार्य सेवा निवृत्ति के बारे में लगाया, इससे साफ पता चलता है, कि डीडी साहब आरोपी को बचा रहे हैं, कहने का मतलब डीडी ने जो रिपोर्ट लगाया, उससे पुनीत पांडेय के षिकायत का निस्तारण नहीं हुआ, बल्कि इन्होंने ऐसी राय दे दी, जिसे विभाग ने मांगा ही नहीं था। ऐसा लगता है, कि यह रिपोर्ट डीडी साहब की बनाई हुई नहीं हैं, बल्कि आरोपी की बनाई हुई, क्यों कि मामले का निस्तारण करने के बजाए और घुमा दिया। डीडी साहब को षायद यह नहीं मालूम होगा, कि जो रिपोर्ट उन्होंने लगाया, अगर उसे हाईकोर्ट में चैलेंज कर दिया गया तो उनका क्या होगा? जिस डीडी को स्वेच्छिक और अनिवार्य सेवा निवृत्ति के बारे में जानकारी न हो, वह अधिकारी बनने के लायक ही नहीं। डीडी साहब को जांच रिपोर्ट फिर से पढ़नी चाहिए, ताकि उन्हें अपनी गलती का एहसास हो जाए, और स्वेच्छिक और अनिवार्य सेवा निवृत्ति की परिभाषा समझ में आ जाए। डीडी साहब डा. राज मंगल चैधरी को बचाने के चक्कर में कहीं आप न फंस जाए।
‘बनकटी’ के ‘खोरिया’ के बाद ‘सूरापार’ में ‘निकला’ बड़ा ‘घोटाला’
बस्ती। यूंही नहीं बनकटी ब्लाॅक को घोटाले का केंद्र कहा और माना जाता है। इस ब्लाॅक का एक ग्राम पंचायत सूरापार हैं, यहां की प्रधान मीरा देवी है, जिनके नाम से कुरियार में देषी षराब की दुकान भी है, इनके एक पुत्र जिनका नाम षरद कुमार षर्मा जो कुदरहा ब्लाॅक के ग्राम पंचायत रसूलपुर स्थित प्राथमिक विधालय के बेलवाडाड़ी के प्रभारी प्रधानाचार्य हैं, और यह अन्वी कांस्टक्षन एंड सप्लार्य के प्रोपराइटर भी है। प्रधानजी के दूसरे पुत्र का नाम रजनीष षर्मा हैं, और यह भी एक अन्य आन्वी कास्टक्षन एंड सप्लार्य के प्रोपराइट है। प्रधान और इनके दोनों पुत्रों ने बीडीओ, एडीओ, सचिव, जेई, रोजगार सेवक के साथ मिलकर पिछले पांच सालों में लगभग चार करोड़ का मनरेगा घोटाला किया। बनकटी ब्लाॅक के खोरिया के बाद सूरापार में मनरेगा में सबसे बड़ा घोटाला सामने आया। प्रधान एंड फेमिली ने गांव के विकास के नाम पर सरकारी धन को लूटने के आलावा लगता है, कि और कोई काम ही नहीं किया, अब जरा अंदाजा लगाइए कि जिस प्रधान के दो पुत्र और दोनों करोड़पति हो, अगर पुत्रों की माता को देषी षराब बेचनी पड़े तो, समझा जा सकता है, कि इस परिवार को पैसे की कितनी भूख होगी। जिन पुत्रों ने फर्जी तरीके से बिल और बाउचर लगाकर करोड़ों का भुगतान अपने फर्म में करवाया, अगर वह फर्म जीएसटी की चोरी करती है, और जिसके एक फर्म के खिलाफ जीएसटी की 17 लाख की रिकवरी का आदेष होता हो, वह परिवार भ्रष्टाचार में कितना डूबा होगा, इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है। अगर यह परिवार करोड़ों रुपये का घोटाला करता है, और लाखों रुपये के जीएसटी की चोरी करता है, तो इस परिवार को कैसे ईमानदार कहा जा सकता है? इस परिवार को भ्रष्ट और बेईमान बनाने में सबसे बड़ा हाथ बीडीओ, एडीओ, जेई, सचिव, रोजगार सेवक राम किषुन का है। अगर किसी ब्लाॅक में भ्रष्टाचार होता है, तो उसके छीटें असली/नकली प्रमुखों के दामन पर भी पड़तें हंै। सूरापार के जुझारु षिकायतकत्र्ता राजेंद्र प्रसाद षुक्ल, प्रधान और उसके परिवार के भ्रष्टाचार के खिलाफ पिछले चार साल से कमिष्नर, डीएम, सीडीओ और राज्यकर विभाग का चक्कर लगा रहे है। जब भी कोई जांच टीम बनती या फिर बीडीओ से रिपोर्ट मांगी जाती, बीडीओ सहयोग ही नहीं करते, इससे पता चलता है, कि इतने बड़े घोटाले में पूरे ब्लाॅक की क्या भूमिका रही है? जिस ब्लाॅक के बीडीओ अगर किसी जांच में सहयोग नहीं करते या फिर अभिलेख नहीं तो यह माना जाता है, कि बीडीओ सहित पूरा ब्लाॅक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, और भ्रष्टाचारियों का सहयोग कर रहा है। यह भी सही है, कि बनकटी को भ्रष्टाचार में नंबर वन बनाने का श्रेय यहां के बीडीओ को ही जाता है। बीडीओ ने ही खोरिया को भ्रष्टाचार में प्रदेष का नंबर वन ग्राम पंचायत बनाने में सहयोग किया। सूरापार प्रदेष का पहला ऐसा ग्राम पंचायत होगा, जहां पर बंधा और नाला नहीं फिर भी 65 से 70 लाख मनरेगा में सफाई और निर्माण के नाम पर निकाल लिया। नहर विभाग ने लिखकर दिया, कि इस ग्राम पंचायत में कोई भी बंधा और नाला नहीं। तीन करोड़ 42 लाख बिना काम कराए निकाल लिया, जिसका जीएसटी भी दोनों भाईयों ने जमा नहीं किया। प्रधान का पूरा परिवार और बीडीओ कार्यालय, सरकारी धन का तो मिलकर बंदरबांट किया ही लाखों रुपये के जीएसटी की चोरी भी की।
‘शिक्षकों’ को ‘मिले’ सामान ‘खरीदने’ का ‘अधिकार’
बस्ती। उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के जनपदीय अध्यक्ष चंद्रिका सिंह व मंत्री बालकृष्ण ओझा के नेतृत्व में शिक्षकों ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को विद्यालयों पर विभिन्न फर्म द्वारा जबरन सामान उपलब्ध कराने के विरोध में ज्ञापन सौपा तथा मांग किया कि शिक्षक को सुविधा अनुसार गुणवत्ता पूर्ण सामान क्रय खरीदने हेतु निर्देशित किया जाए। शिक्षकों के समूह ने बीएसए को बताया कि कुछ फर्म द्वारा विद्यालयों पर जा जाकर शिक्षकों से जबरन सामान खरीदने व उनसे जबरन पीएमएमएस बनवाने तथा कार्य न करने पर बीएसए से कार्यवाही करवाने की बात कह कर सामान लेने का दबाव बना रहे हैं ,जबकि शासन द्वारा विद्यालयों के खातों में धनराशि भेजी गई है और उन्हें पीएमएमएस के माध्यम से भुगतान करने का निर्देश प्राप्त है। परंतु कुछ फर्म द्वारा जो की अन्य जनपदों से आए हैं और बीएसए कार्यालय के शह पर विद्यालयों में जबरन घटिया और खराब गुणवत्ता के सामान उपलब्ध करा रहे हैं और जिन विद्यालयों द्वारा सामान नहीं लिया जा रहा है उसको बीएसए का नाम बताकर जबरन दबाव बनाया जा रहा है ।ज्ञापन लेते वक्त जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा कहा गया कि मामला संज्ञान में आ गया है यदि शिक्षक अपनी सुविधा और नियम के अनुसार सामान ले यदि किसी भी विद्यालय पर जबरन सामान दिया जा रहा है तो उसकी शिकायत करें संबंधित फर्म के खिलाफ उचित कार्यवाही की जाएगी।
ज्ञापन देने वालों में हरेंद्र यादव, डॉक्टर प्रमोद सिंह, दुर्गेश यादव प्रताप नारायण चैधरी, सुरेश गौड़, राकेश पाण्डेय,शिव प्रकाश सिंह, मुरलीधर, संजय यादव, मंगला मौर्य, बृजेश मिश्र, सनद पटेल उपस्थित रहे। परिषद के विद्यालयों तक पुस्तक भेजने हेतु लाखो रुपये का होता है ठेका। उसके बावजूद विद्यालय में कार्यरत अनुचरध् चपरासी को खंड शिक्षा अधिकारी अपने कार्यालय पर सम्बद्ध कर पहुचावते है पुस्तकें। शासन से आया पैसा स्वंय ले लेते है अनुचर का करते है शारिरिक व मानसिक शोषण। विद्यालय की साफ सफाई,भोजन के सामान लाने, गैस सिलिंडर भरवाने व अन्य कार्य करते है अनुचर। दो माह तक अनुचरों को कार्यालय से सम्बद्ध कर करवाएंगे काम।
...आखिर ‘क्यों’ हर ‘एनकाउंटर’ के बाद सवाल ‘उठतंे’?
बस्ती। अगर पुलिस की उपलब्धि पर भी सवाल उठने लगे तो सोचना होगा, कि सवाल क्यों उठ रहें? खासतौर पर हर एनकाउंटर के बाद जिस तरह सवाल उठते हैं, उसे लेकर सही और गलत का फैसला करना मुस्किल हो जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण, आम लोगों का पुलिस पर विष्वास का न होना। आजकल हर दूसरे दिन एनकाउंटर की बात होती है। खबरों में देखने को मिलता है कि पुलिस ने किसी अपराधी का एनकाउंटर कर दिया, इनमें से कई एनकाउंटर ऐसे भी होते हैं, जिनको लेकर सवाल भी उठते हैं?बस्ती पुलिस के द्वारा अब तक किए गए कई मुठभेड़ में शानदार प्रदर्शन होने के बावजूद भी किसी थानेदार को ओलंपिक में हिस्सा लेने के लिए नही भेजा जाना सवाल खड़ा कर रहा है? अगर इनके शानदार प्रदर्शन को देखते हुए भारतीय ओलंपिक संघ बस्ती पुलिस के कुछ निशानेबाज थानेदारों को अपने दल में शामिल कर ले व इनको ओलंपिक में जाने का मौका दे दे तो यकीन मानिए पक्का कुछ और मेडल तो तय ही है,
कोई हैरत नहीं होती अगर गोल्ड झोली में आ गिरेगा? दिन हो या रात का घुप्प अंधेरा, या कोई आड़े-तिरछे दौड़ता हुआ भाग रहा हो, या कोई मोटरसाइकिल पर हो, या गाड़ी में, कोई खड़ा हो, बैठा हो, लेटा हो, जिस हाल में हो और कितनी ही दूरी पर या नजदीक हो, मजाल क्या कि पुलिस निशाना चूक जाए? गोली पैर पर ही लगेगी, और वो भी पैर के एक खास हिस्से पर? दोनों तरफ से फायरिंग और सिर्फ अपराधी के पैर में गोली। हां कभी-कभी थानेदार के पास गोली गुजरने से खरोंच जरूर आ जाती है, थानेदार व अधिकारी मीडिया को एक सांस मे ये वाली अपनी सच्ची कहानी सुना देते हैं, क्या मजाल जो साहब बीच में कहीं कॉमा या फुलस्टॉप लगा दे? भला इतना सटीक निशाना कैसे? वो भी पैर पर, और उस पर भी कमाल ये कि सामने से भी गोली चल रही है, यानी अपराधियों की तरफ से, उनका निशाना इतना घटिया कि गोली सिर्फ पुलिस वाले को छू कर ही निकलती है? फर्जी एनकाउंटर ने बस्ती पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं? ऐसे मुठभेड़ देखकर लोगों को ओलंपिक की शूटिंग याद आ जाती है, पुलिस वालों का ये निशाना देख हर कोई दंग रह जाता हैं? ऐसा भी नहीं कि हर एनकांउटर पर सवाल उठें हैं, कई ऐसे एनकाउंटर भी हुए जो देखने ही सही लगते हैं, इसमें पुलिस की कोई थ्यौरी नहीं होती। चूंकि पुलिस को सबसे अधिक डर मानवाधिकार का रहता है, वरना कई अपराधी अब तक मिटटी में मिल गए होते। यकीन मानिए, मानवाधिकार का डर पुलिस को न होता तो जो गोली पैर में खास हिस्से पर लगती है, वही गोली अपराधियों के सीने में भी लग सकती। यह भी सही है, कि अगर पुलिस किसी अपराधी से प्यार से यह भी चाय समोसा खिलाकर सच जानना चाहे, तो नहीं हो सकता, कभी-कभी पुलिस को अधिकार से बाहर जाकर समाज की भलाई के लिए पुलिसिया हथकंडे को इस्तेमाल करना होता है। पहले के अधिकारी समाज के लिए नासूर बन गए अपराधियों का एनकाउंटर करने से पहले मीडिया को भरोसे में लेते थे, बताते थे, कि क्यों एनकाउंटर करना आवष्यक है? जिले में बहुत से ऐसे भी एनकाउंटर हुए, जिस पर मीडिया ने इस लिए सवाल नहीं खड़ा किया कि क्यों कि मीडिया भी समाज के लिए खतरा बन चुके अपराधियों का सफाया होना देखना चाहती।


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