‘नायब तहसीलदार’ को ‘अंग्रेजी’ ही नहीं ‘आती’!

 

‘नायब तहसीलदार’ को ‘अंग्रेजी’ ही नहीं ‘आती’!

बस्ती। सरकार को अब उर्दू अनुवादक की तरह अंग्रेजी अनुवादक की भी नियुक्ति करनी चाहिए, क्यों कि राजस्व के अधिकांष अधिकारियों को अग्रेंजी ही नहीं आती हैं, जिसके चलते साहब निर्णय नहीं ले पा रहे है। ऐसा ही एक मामला सदर तहसील का सामने आया हैं, अधिवक्ता प्रदीप चंद्र पांडेय जब नायब तहसीदार के सामने 1905 का अंग्रेजी में लिखा हुआ रजिस्टर्ड बैनामा ले गए, तो नायक साहब ने पहले दिन तो वकील साहब से कुछ नहीं कहा, दूसरे दिन भी कुछ नहीं कहा, लेकिन तीसरे दिन जब वकील साहब ने कहा कि नायब साहब कब आर्डर करेगें, तब हिचकिचाते हुए एनटी साहब ने वकील साहब से कहा कि बुरा न मानिएगा, आप का आर्डर इस लिए नहीं हो पा रहा है, क्यों कि यह अंग्रेजी में लिखा हुआ है, और हमको अंग्रेजी आती नहीं, अगर आप इसका हिंदी अनुवाद करवा कर दे दें तो निर्णय हो जाएगा, वरना ऐसे ही पड़ा रहेगा। मुवक्किल ने वकील साहब को मेहनताना तो दिया, लेकिन हिंदी अनुवाद करने का पैसा नहीं दिया, जिसके चलते साल भर हो गए, कोई निर्णय नहीं हो पाया। वकील साहब जितनी बार एनटी के पास जाते उतनी बार एनटी ही वकील साहब से पूछ लेतें कि अनुवाद कराकर लाए कि नहीं? अब सवाल उठ रहा है, कि एनटी साहब निर्णय कैसे करें, या रिपोर्ट कैसे लगाएं? रिपोर्ट तभी लगेगा जब एनटी को हिंदी अनुवाद मिलेगा। असलियत तो यह है, कि अगें्रजी न आना तो एक बहाना है, मुवक्किल की कंजूसी के चलते मामला एक साल से नायब साहब की आलमारी में धूल खा कर रहा है। एक सच और भी हैं, चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा हुआ है, इस लिए कोई भी इसमें हाथ नहीं डालना चाहता। एनटी साहब सोचते हैं, जब कमिष्नर, डीएम और एसडीएम ने निस्तारित नहीं किया तो हम क्यों करें?

यह मामला चर्च से जुड़ा हुआ है। लगभग एक साल पहले चर्च आफ इंडिया सीआईपीबीसी के बाबी विलिएम ने प्रमुख सचिव को एक पत्र लिखा, जिसमें चर्च की प्रापर्टी को एक ऐसे चर्च आफ नार्थ इंडिया सीएनआई के अनिल लाल के द्वारा अवैध रुप से दुकान निर्माण करवाकर बेचे जाने के बारे में लिखा, जिसे सुप्रीम कोर्ट असंवैधानिक करार दे चुका है। प्रमुख सचिव ने कमिष्नर को जांच कर कार्रवाई करने का आदेष दिया, कमिष्नर ने मामला सुप्रीम कोर्ट का जब देखा तो उन्होंने जांच डीएम को सौंप दिया, डीएम ने भी वहीं किया जो कमिष्नर ने किया, उन्होंने भी खुद न जांच करके एसडीएम सदर को सौंप दिया। एसडीएम सदर ने भी वहीं किया, जो डीएम ने किया, उन्होंने भी खुद न जांच करके तहसीलदार के रहते जांच नायब तहसीलदार को सौंप दिया। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि जो जांच राजस्व के सबसे बड़े अधिकारी कमिष्नर को करनी चाहिए वह जांच राजस्व के सबसे छोटे अधिकारी को सौंप दिया गया। प्रमुख सचिव का कमिष्नर को आदेष दिए लगभग एक साल हो गए, लेकिन अभी तक जांच पूरी नहीं हुई, और इस बीच निर्माण भी हो गया और दुकान बिक भी गया। ऐसा लगता है, मानो चर्च की संपत्ति से प्रमुख सचिव से लेकर कमिष्नर, डीएम और एसडीएम कोई लेना-देना नहीं है। किसी को इस बात की परवाह नहीं कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा हुआ, हर कोई पल्ला झाड़ रहा है। अधिवक्ता प्रदीप कुमार पांडेय का कहना है, कि सब पैसे का खेल हैं, चूंकि हमारा मुवक्किल पैसे से कमजोर हैं, और विपक्ष चर्च की संपत्ति बेच-बेचकर बड़ा आदमी बना हुआ है, मेरे मुवक्किल के सारे आवेदन विपक्ष पैसे से दबवा दे रहा है। सबका झुकाव चर्च की प्रापर्टी बेचने वालों पर है।

‘क्या’ कोई ‘पादरी’ और ‘बेटी’ गांजा भी बेच ‘सकते’?

बस्ती। गिरजाघर सेंट जेम्स की अरबों की प्रापर्टी पर सबकी नजर है। हर कोई चर्च की प्रापर्टी को नीजि समझकर इस्तेमाल करना चाह रहा हैं, जो नहीं कर पा रहे हैं, वे छटपटा रहे हैं, और जो कर रहे हैं, वह मलाई काट रहे है। इस मलाई काटने में विषप का भी नाम सामने आ रहा है, कहा जा रहा है, कि अनिल लाल ने विषप दान को ठीक उसी तरह कब्जे में कर लिया, जिस तरह चर्च की संपत्ति को। इनके रास्ते में जो भी आया, उसे लाल साहब ने विषप का सहारा लेकर हटा दिया, इसके षिकार पूर्व पादरी रेमंड स्टरलिगं हो चुके है। जब अनिल लाल ने देखा कि पादरी तो उनकी काली कमाई के रास्ते में रोड़ा बन रहे हैं, तो पहले उनपर और उनकी बेटी पर गांजा की पुड़िया बेचने का आरोप लगाया, जिसकी जांच चल रही है। पुलिस को पैसा खिलाकर पादरी से हट जाने का दबाव बनाया। फिर विषप के सहयोग से पादरी को यह कहते हुए हटवा दिया कि यह पुराने हो गए हैं, जब कि कोई पादरी कम से कम पांच साल और अधिकतम दस साल तक एक चर्च में पादरी रह सकता है। लेकिन स्टरलिगं को सात साल में ही हटवा दिया, पहले तो अनिल लाल ने स्टरलिगं को भी पैसे का लालच दिया और कहा कि चलो मिल बांटकर खाते हैं, लेकिन जब यह लाल की बात नहीं माने, तब लाल ने जाल बुनना षुरु कर दिया। जब-जब भी लाल ने अवैध काम करना चाहा, स्टरलिगं आवेदन लेकर डीएम के पास चले जाते हैं, काम रोंकवा देते, लाल ने जब यह देखा कि उसकी तो सारी कमाई आवेदन को डस्टबिन में डलवाने में चली जा रही है, तो उन्होंने स्टरलिगं को ही रास्ते से हटाने की साजिष रची और जिसके सहयोगी बने विषप। एक तरह से देखा जाए तो बस्ती के चर्च की संपत्ति को बेचने में अनिल लाल के साथ विषप का भी बड़ा योगदान है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि क्या कोई पादरी और उसकी बेटी गांजे की पुड़िया बेच सकती है? चर्च से जुड़े कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो अनिल लाल और बाबी विलिएम में कोई फर्क महसूस नहीं करते। कहते हैं, कि बाबी विलिएम, अनिल लाल पर हावी होना चाहते हैं, ताकि चर्च की संपत्ति को जैसा चाहें वैसे उसका उपयोग/दुरुपयोग कर सके।

पादरी स्टरलिगं ने अनिल लाल पर सीधा आरोप लगाया कि चर्च की संपत्ति को बेचने के लिए ही उन्होंने हमको अपने रास्ते से हटा दिया, और गोरखपुर के संजय विंसेंट का बस्ती का प्रभार दे दिया, जो माह में एक दो बार जाते हैं, कहते हैं, कि अनिल लाल को संजय विंसेंट जैसा पादरी चाहिए, जो चुपचाप चर्च की संपत्ति को बर्बाद होते देखता रहें। कहते हैं, कोई चर्च के विकास के लिए नहीं लड़ रहा है, बल्कि किस तरह अधिक से अधिक सपत्ति बेचा जा सके उसके लिए लड़ाई लड़ रहा है, विषप को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए, लेकिन वह भी चुप है। कहते हैं, कि अनिल लाल और बाबी विलिएम के बीच वर्चस्व की लड़ाई हो रही हैं, और यह लड़ाई चर्च के विकास के लिए नहीं बल्कि चर्च को लूटने के लिए हो रही है। समाज जिसे सबसे अधिक ईमानदार और पाक-साफ समझता है, वही सबसे बड़ा बेईमान दिखाई दे रहा है। सवाल उठ रहा है, कि बस्ती के चर्च में एक साल से किसी पादरी की नियुक्ति क्यों नहीं हो रही? यह भी कहा जा रहा है, कि आज अनिल लाल एंड पार्टी को लूटने का मौका मिला, कल को बाबी विलिएम एंड पार्टी को मिल सकता है। यह भी कहा जाता है, कि विषप दान से पहले अनिल लाल की नहीं चलती थी, लेकिन जैसे ही दान साहब चेयरमैन बने अनिल लाल पूरे फार्म में आ गए। चर्च के जुड़े अनेक लोगों का कहना और मानना है, कि जब तक वर्चस्व की लड़ाई समाप्त नहीं होगी, तब तक चर्च का विकास नही होगा, बल्कि दुरुपयोग होगा। कहते हैं, कि जिस तरह एक मंदिर की रखली और देखभाल पुजारी ईमानदारी से करता है, ठीक उसी तरह चर्च के कथित अनिल लाल और बाबी विलिएम को चर्च का देखभाल ईमानदारी से करना चाहिए, जिस तरह आए दिन मीडिया में चर्च की संपत्ति को बेचने की खबरें आ रही है, उससे लोगों का चर्च और उससे जुड़े लोगों पर से विष्वास उठता जा रहा है। स्टरलिगं कहते हैं, कि हम अपनी बात विषप से कहने प्रयागराज गए भी थे, लेकिन उन्होंने हमारी बात सुनी ही नहीं, अनिल लाल के खिलाफ एक भी षब्द नहीं न सुनना चाहते। कहते हैं, कि एक विषप होकर भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा देगें तो समाज क्या हम लोगों के बारे में सोचेगा?  

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‘सिखों’ के ‘हीरो’ बने कुलविंद्र सिंह ‘मजहबी’

बस्ती। बादषाही अखाड़ा के सरदार कुलविंद्र सिंह मजहबी सिख समाज के हीरो बन गए है। देष के यह पहले सिख हैं, जिन्होंने मानसरोवर की यात्रा की। सरकार इन्हें इसके लिए सम्मानित करने जा रही है। यह सम्मान मुख्यमंत्री योगीजी 17 मार्च 26 को लोकभवन लखनउ में करेगें। इन्हें सम्मान के साथ एक लाख की धनराषि भी मिलेगी। कैलाष मानसरोवर सेवा समिति के अध्यक्ष केके सिंह की ओर से इन्हें सम्मानित करने का आमंत्रण मिला है। कैलाष मानसरोवर की यात्रा 28 जून से 19 जुलाई 25 तक चली। यह सम्मान सिर्फ सरदार कुलविंद्र सिंह मजहबी की नहीं बल्कि पूरे सिख समाज की है। सिक्किम के नाथूला दर्रा मार्ग से यात्रा करने वाले सरदार कुलवेन्द्र सिंह जब अपने जिले में आए तो इनका स्वागत समाज के विभिन्न संगठनों और इनके षुभचिंतकों के लरिए किया गया। इनका स्वागत किसी विजेता की तरह किया गया। सबसे पहले इनका स्वागत पटेल एस.एम.एच. हास्पिटल गोटवा में प्रबध्ंाक वरिष्ठ चिकित्सक डा. वी.के. वर्मा द्वारा फूल माला, अंग वस्त्र, रोली चंदन के साथ स्वागत किया गया। ऐसे अवसर पर डा. वी.के. वर्मा ने कहा कि मानसरोवर यात्रा सबसे दुर्गम माना जाता है।



कुलवेन्द्र सिंह ने इसे कर दिखाया। कहा कि प्रथम सरदार कैलाशी सरदार कुलवेन्द्र सिंह ने साबित कर दिया कि यदि दृढ इच्छा शक्ति हो तो कुछ भी असंभव नहीं हैं और उम्र मायने नहीं रखती। कहते हैं, अब सरकार इनका सम्मान करने जा रही है, यह ऐसा सम्मान हैं, जिसे बहुत कम लोगों को मिलता। इससे पहले चीफ एक्ज्यूटिव आफिसर सिक्किम टूरिज्म डवलपमेंट कारपोरेषन राजेंद्र क्षेत्री, टूरिज्म एंड सिविल एविऐषन मिनिस्टर टीषेरटिगं टी भूटिया और एडिषन चीफ सेके्रटरी टूरिज्म आईएफएस अधिकारी सीएस राव इन्हें मानसरोवर की यात्रा करने वाले देष के प्रथम सिख का प्रमाण-पत्र दिया। हरीष सिंह, डा. वीके वर्मा, डा. प्रमोद चैधरी, चंद्रेष प्रताप सिंह, लाडले हैदर रिजवी, डा. अरुण लारेंस, विष्णु प्रसाद भटट, पूर्व एडीजीसी प्रेम प्रकाष श्रीवास्तव, इंतजार अहमद, षंषाक रजगड़िया, प्रहृलाद मोदी, मजोज दूबे, राजेंद्र तिवारी और प्रदीप चंद्र पांडेय, केसरी नरायण त्रिपाठी, जगदीष षुक्ल, अर्जन उपाध्याय, किषन गोयल, खादिम हुसैन, भगवान सिंह मामा, डाक्टर सिद्वीकी, बिन्नू, अभिषेक वर्मा, जसबीर सिंह, विक्की बाब किरतू,, इंदर पाल सिंह षैकी, विनीत दूबे, षुभांसु पांडेय पुलक, राजेंद्र सिंह राजावत, विमल पांडेय, संदीप गोयल, बबलू गौड़, गणेष गौड़ एवं अर्जन जायसवाल सहित अन्य ने बधाई दी है।

‘ओझाजी’ कुछ तो ‘मरीजों’ पर रहम ‘कीजिए’!

बस्ती। जिस तरह मरीजों और उनके परिजन के जान को जोखिम में डालकर बेसमेंट में ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर संचालित हो रहा, उसका सील होना अति आवष्यक हैं, वरना, ऐसी घटना घट सकती है, जिसकी भरपाई ओझाजी ने नहीं कर पाएगें। वैसे भी उस बेसमेंट में कोई भी डायग्नोस्टिक सेंटर संचालित नहीं हो सकता और न उसे लाइसेंस ही दिया जा सकता है, जिसके जाने और आने का एक ही रास्ता होता। ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर का बखान करने वाले मीडिया को एक बार अवष्य जाकर देखना चाहिए, क्या ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर तारीफ के लायक है। यकीन मानिए, अगर किसी मीडिया ने उस बेसमेंट को देख लिया, जहां पर तिल रखने की जगह नहीं हैं, तो उनकी राय ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर के बारे में बदल जाएगी। आप लोग अंदाजा लगाइए कि अगर बेसमेंट में आगजनी जैसी कोई घटना हो जाएगी तो कैसे कोई वहां से निकलकर अपनी जान बचा पाएगा। चार-पांच फीट के आने-जाने रास्ते से क्या कोई निकल पाएगा? इसी लिए कहा जाता है, कि मीडिया को काफी सोचसमझकर किसी सेंटर या फिर नर्सिगं होम के बारे में राय बनानी चाहिए, वरना मीडिया पर अगुंली उठते देर नहीं लगेगी। जिले का सबसे अधिक पैसा कमाने वाले ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर को अगर मरीजों के सुरक्षा की कोई चिंता नहीं है, तो ऐसा पैसा कमाने से क्या फायदा जो किसी के जान को जोखिम में डालकर कमाया जाए। ओझाजी एक अच्छे इंसान, व्यक्ति और डाक्टर हो सकते हैं, लेकिन एक अच्छा संचालक नहीं हो सकते, यह उनके सेंटर को देखकर कहा जा रहा है।




बहरहाल, बिना जिम्मेदारों के रिपोर्ट देना को नहीं बात नहीं हैं, इससे पहले भी यह कई बार बिना हस्ताक्षर के रिपोर्ट दे चुके है। 18 जून 22 और 23 फरवरी 25 को भी यह बिना हस्ताक्षर के रिपोर्ट दे चुके है, जिसका साक्ष्य मरीजों ने मीडिया को उपलब्ध कराया। अगर इसके बाद भी इसके संचालक सफाई देते हैं, तो उनकी सफाई में कितना सच्चाई हैं, इसका फैसला खुद मरीज करें। ओझाजी आप मरीज से सौ-दो सौ रुपया अधिक ले लीजिए, लेकिन उनके जीवन के साथ खिलवाड़ मत कीजिए, वरना उपर वाला भी आपको माफ नहीं करेगा। रही बात सीएमओ की तो इसके नोडल डिप्टी सीएमओ डा. एके चैधरी को इससे कोई मतलब नहीं कि मरीज मरे या जिए, इन्हें तो सिर्फ गांधीजी से मतलब है। जिस दिन ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर में कोई घटना हो जाएगी, उस दिन सबसे पहले गाज सीएमओ और डिप्टी सीएमओ पर गिरेगी। अगर वाकई ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर के संचालकों को मरीजों की चिंता है, तो सबसे पहले बेसमेंट से सेंटर को हटाना पड़ेगा, वरना किसी दिन बहुत बड़ी मुसीबत में पड़ सकते हैं, मरीज और सरकार एक बार बिना हस्ताक्षर के रिपोर्ट की तो अनदेखी कर सकती है, लेकिन घटना को नहीं।

इस सेंटर से जांचों की रिपोर्टें मरीजों को जो दी जा रही हैं, उनमें अधिकृत डॉक्टर के हस्ताक्षर नहीं हो रहें है। इसे मरीज की नहीं बल्कि संचालक की गलती मानी जाएगी। हाल ही में सामने आई एक 23 मार्च 2025 की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में डॉक्टर का हस्ताक्षर नहीं पाया गया। इतना ही नहीं, वर्ष 19 अगस्त 2022 की सीटी स्कैन रिपोर्ट में भी किसी रेडियोलॉजिस्ट का हस्ताक्षर नहीं मिला। किसी भी मेडिकल जांच की रिपोर्ट तभी वैध मानी जाती है जब उस पर संबंधित विशेषज्ञ डॉक्टर के हस्ताक्षर हों। लेकिन यहां कई मामलों में नियमों को दरकिनार कर रिपोर्ट जारी कर दिए जाते है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सेंटर में मरीजों की भारी भीड़ रहती है और कई बार जल्दबाजी में रिपोर्ट तैयार कर दी जाती है। ऐसे में रिपोर्ट की सटीकता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बिना डॉक्टर के सत्यापन के रिपोर्ट जारी करना मरीजों के इलाज को गलत दिशा में ले जा सकता है, जिससे उनकी जान को खतरा तक हो सकता है। अब इस पूरे मामले को लेकर स्थानीय लोगों ने स्वास्थ्य विभाग से जांच कर कार्रवाई की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इस पर सख्त कदम नहीं उठाए गए तो मरीजों के जीवन के साथ बड़ा जोखिम बना रहेगा।

‘भ्रष्टाचार’ निवारण के ‘चेयरमैन’ ही ‘भ्रष्टाचार’ में ‘फंसें’!

बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि जब भारतीय भ्रष्टाचार अन्वेषण उन्मुलन के चेयरमैन के खिलाफ धोखाघड़ी के आरोप में मुकदमा दर्ज होगा तो भ्रष्टाचार मिटाएगा कौन? और भ्रष्टाचार मिटेगा कैसे? इसका मतलब यह हुआ कि जो लोग इस तरह का अभियान चलाते हैं, वह लोग खुद भ्रष्टाचार में डूबे रहते हैं, यह लोग संस्था की आड़ में वह सब गलत काम करते हैं, जिसका यह लोग विरोध करते है। मामला राजेश कुमार चैधरी चेयरमैन भारतीय भ्रष्टाचार अन्वेषण उन्मुलन परिसर हर्रैया बस्ती ग्राम खदरा थाना दुबौलिया का सामने आया। इनके खिलाफ घनष्याम मौर्य पुत्र गुरुप्रसाद मौर्य निवासी ग्राम देवखर ने थाना छावनी में एफआईआर दर्ज करवाया। मामला बहुत ही रोचक है।  

दर्ज एफआईआर में कहा गया कि उसकी शादी सन 2010 में प्रिति मौर्या के साथ हुआ। पत्नी लगभग 08 वर्षो सें बेल्सन इण्डिया लिमिटेड कक्ष गुजरात में काम कर रही। पत्नी घर नहीं आ रही थी। इसी बीच राजेश कुमार चैधरी चेयरमैन भारतीय भ्रष्टाचार अन्वेषण उन्मुलन परिसर हर्रैया बस्ती ग्राम खदरा थाना दुबौलिया जनपद बस्ती के निवासी है जो हर्रैया में आफिस खोले हुए हैं, गांव में दुर्गा पुजा समारोह में शामिल हुआ। उसने राघवेन्द्र वर्मा व जयप्रकाश सिंह व मुझे राजेश चैधरी से मिलवाया। जब कहा गया कि उसकी पत्नी घर नहीं आ रही है, तो राजेश कुमार चैधरी ने यह कहा कि तुम्हारी औरत को गुजरात से मंगवा लूंगा जिसमें 12 से 13 लाख रुपया मिलेगा यदि नही रहेगी तो 65 लाख रुपये जुर्माना लगेगा जो तुम्हे मिलेगा। उसने घनष्याम से कहा कि तुम्हे 25,000 रुपया भ्रष्टाचार निवारण परिषद में जमा करना पडेगा तथा 200 रुपया बतौर फाइल बनाने में खर्च होगा। विष्वास करके 29 नवंबर 2025 को आनलाईन के जरिए उसके खाते में 20,000 रुपया व 15 दिसंबर 25 को 5200 रुपया आनलाइन दिया। जब पत्नी नहीं आई तो और पैसा मांगने लगा तो जान से मार डालने के भय में डालकर कोरे कागज पर जबरदस्ती हस्ताक्षर बनवा लिया। फिर उसने पंजाब नेशनल बैंक फेटवा बस्ती के नाम 30,000 रुपये का चेक दिया, जो कैष नहीं हुआ।

‘बुजुर्ग’ को ‘आत्महत्या’ को ‘मजबूर’ कर रही लालगंज ‘पुलिस’

बनकटी। लालगंज थाने के लाकप में शीशे के टुकड़े से गला काटकर आत्महत्या का प्रयास करने वाले युवक के बाद अब एक बुजुर्ग ने सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल कर लालगंज पुलिस द्वारा न्याय ना मिलने पर आत्महत्या करने की धमकी दे रहे हैं ।

थानाक्षेत्र के नडार गांव निवासी राम कुबेर शुक्ल अपनी बहू उसके छोटे छोटे बच्चों के साथ घर पर रहते हैं । बुजुर्ग ने बताया कि मकान के पास एक पुराना गौशाला स्थित है जिसे पड़ोसी के द्वारा दिनदहाड़े जबरन कब्जा करने की नीयत से सब्बल से मकान उजाड़ा जा रहा है जिसका वीडियो बना हुआ है । बुजुर्ग ने लालगंज पुलिस पर आरोप लगाते हुए गौशाला उजाड़ने वालों के खिलाफ तहरीर देने के बाद भी आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही ना करने तथा पीड़ित को ही जेल भेजने की धमकी दे रही है ।  


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