रिजेंट’ खरीद ‘में’ हुआ ‘500’ करोड़ का ‘घोटाला’

 

‘रिजेंट’ खरीद ‘में’ हुआ ‘500’ करोड़ का ‘घोटाला’

बस्ती। योगीजी के नाक के नीचे हर साल पांच सौ करोड़ से अधिक का घोटाला ‘रिजेंट’ की खरीद में हो रहा है, और योगीजी घूम-घूमकर जीरो टालरेंस का ढोलक बजा रहे है। इस रिजेंट का इस्तेमाल मरीजों के खून की जांच के लिए होता है। हर साल लगभग पांच सौ करोड़ के रिजेंट की खरीद प्रदेष के विभिन्न जनपदों के उन अस्पतालों के सीएमएस और एसआईसी करते हैं, जहां पर पीओ सिटी का लैब संचालित हो रहा है। इस फर्म का लैब बस्ती के जिला महिला अस्पताल, जिला अस्पताल, टीबी अस्पताल और 100 बेड एमजीएच हर्रैया अस्पताल में स्थापित है। यही लोग मिलकर पीओ सिटी से रिजेंट की खरीद और भुगतान करते है। इसे घोटाला कहिए या फिर सरकार को चूना लगाना मानिए, यूपीएमएससीएल यानि उत्तर प्रदेष मेडिकल सप्लाई कारपोषन लि. के एमडी और पीओ सिटी सर्विसेज कानपुर मिलकर कर रहे है। एक साजिष के तहत जेम पर पीओ सिटी को लैब में इस्तेमाल होने वाले रिजेंट आपूर्ति का अनुबंध किया गया। आप लोगों को जानकर हैरानी होगी कि लगभग पांच हजार करोड़ की खरीद खरीद का अनुबंध 10 साल के लिए किया, जबकि नियमानुसार हर साल टेंडर निकलना और अनुबंध होना चाहिए। सवाल उठ रहा है, कि क्यों दस साल के लिए एक ही फर्म से अनुबंध किया गया, यह जांच का गंभीर विषय हो सकता है। इतना ही नहीं पीओ सिटी के नाम 163 सामानों की आपूर्ति का एग्रीमेंट हुआ, जबकि यह अनुबंध कई फर्मो से होना चाहिए। यह एक बहुत बड़ा सवाल हैं, कि क्यों एक ही फर्म के नाम अनुबंध किया गया? सबसे अधिक चैकानें वाली बात यह है, कि जो अनुबंध किया गया, वह बाजार से 16 से लेकर 20 गुना अधिक दर से निर्धारित किया गया। उदाहरण के तौर पर खुले बाजार में अगर 500 एमएल का ‘फरटीन’ नामक केमिकल 500 रुपये में मिल रहा है, तो उत्तर प्रदेष मेडिकल सप्लाई कारपोषन लि. के एमडी ने एक बोतल का रेट 3600 रुपया निर्धारित किया, यानि एक बोतल ‘फरटीन’ में 3100 रुपया का बंदरबांट, इसी तरह एक बोतल ‘कैलसिएम’ खुले



बाजार में 100-300 रुपए में मिल रहा है, लेकिन उसका आरसी यानि अनुबंध रेट 1624 रुपया किया गया। यह अनुबंध पांच जुलाई 2033 तक का है। यानि पीओ सिटी लैब से 10 साल में पांच हजार करोड़ का अनुबंध हुआ, इसमें अगर वास्तविक दर से रिजेंट की खरीद की जाए तो दस सालों में एक हजार करोड़ से अधिक की नहीं होगी, यानि दस साल में चार हजार करोड़ के बंदरबांट का खुलासा होने की पूरी संभावना। रेट एग्रीमेंट देखकर आप लोगों को भी लग रहा होगा, कि यह तो सरकारी धन का बंदरबांट करने वाला है। अगर राजधानी में राज्य सरकार के अंडरटेकिगं वाले यूपीएमएससीएल के एमडी पर सरकारी धन के बंदरबांट करने का आरोप लग रहा ह, तो यह योगीजी के लिए बहुत गंभीर विषय है। यह उस संस्था का हाल हैं, जिसके एमडी एक आईएएस अधिकारी है। एमडी पर सबसे ब़ड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि जब पीओ सिटी सर्विसेज लैब मषीन का निर्माण नहीं करती तो उसकी मषीन भी अस्पतालों में नहीं लगनी चाहिए। सवाल उठ रहा है, कि क्यों नहीं उस मैनुफैक्चरर से रिजेंट की खरीद की जाती, जो जांच मषीन बनाती है? क्यों उससे खरीद की जाती है, जो मषीन ही नहीं बनाती, जबकि भारत सरकार की गाइड लाइन में स्पष्ट लिखा हैं, कि रिजेंट उन्हीं निर्माता से खरीदी जाए जो लैब मषीन का निर्माण करती है। यानि मषीन और रिजेंट एक ही निर्माता का होना चाहिए। सवाल उठ रहा है, कि जब पीओ सिटी मषीन निर्माण नहीं करती तो कैसे उसके नाम दस साल का रिजेंट खरीद का अनुबंध हो गया? अब आ जाइए पीओसीएल लैब पर। 100 बेड एमजीएच हर्रैया अस्पताल और जिला महिला अस्पताल के सीएमएस से जनता जानना चाहती है, कि जब आरसी यानि रेट अनुबंध पीओ सिटी से हुआ तो कैसे और क्यों पीओसीएल को करोड़ों का आर्डर दिया जा रहा है, और भुगतान किया जा रहा है? इनसे किस दर पर खरीद की जा रही है, और क्यों की जा रही है? जो चार हजार करोड़ के बंदरबांट की बात कही जा रही है, उसे लेकर सबसे अधिक सवालों के घेरे में यूपीएमएससीएल के एमडी, पीओ सिटी के संचालक, पीओसीएल लैब के षुभग अग्रवाल और जिला महिला अस्पताल, जिला अस्पताल, टीबी अस्पताल और 100 बेड एमजीएच हर्रैया अस्पताल के सीएमएस और एसआईसी ही आ रहे है।

आखिर ‘फंस’ ही गए, ‘पिपरा गौतम’ के ‘सूदखोर’

बस्ती। जिन सूदखोरों के चलते न जाने कितने को जान गवांनी पड़ी और न जाने कितने घर को बर्बाद होना पड़ा, उन सूदखोरों की जगह खुला आसमान नहीं बल्कि जेल की काल कोठरी है। यह सूदखोर समाज और गरीबों के दुष्मन होते है। इनसे इस बात से कोई मतलब नहीं रहता है, कि उनके ब्याज की भरपाई न करने के चलते किसी का घर बर्बाद हो रहा है, कोई सुसाइड कर रहा हैं, एक ब्याज चुकाने के लिए दूसरा कर्ज लेना पड़ता, जेवर और जमीन तक बिक जाते हैं। यह इतने क्रूर और असंवेदनषील होते हैं, कि इनके भीतर मानवता नाम की कोई चीज नहीं होती। ब्याज का धन देते-देते न जाने लोग कर्ज में डूबते जा रहे है। लेकिन सूदखोरों का ब्याज नहीं समाप्त होता। मूलधन से हजार गुना ब्याज के रुप में ले लेते हैं, फिर भी मूुलधन वहीं का वहीं रहता है। यह सूदखोर अच्छी तरह जानते हैं, कि उनके खिलाफ कोई पुलिस में नहीं जा सकता और न एफआईआर ही दर्ज करवा सकता, इसी का यह लोग नाजायज फायदा उठाते है। जिस दिन पिपरा गौतम के विपिन सिंह पुत्र स्व. रामजतन सिंह की तरह अन्य हो जाएगें तो सूदखोरों का सफाया हो जाएगा। समस्या यह है, कि इनकी दंबगों के आगे पुलिस भी पीड़ितों की नहीं सुनती, अब जरा अंदाजा लगाइए कि जब विपिन सिंह ने एसपी से पिपरा गौतम निवासी पुनीत सिंह पुत्र तेज बहादुर सिंह से जानमाल की गुहार लगाई तो एसपी ने भी यह कहकर अनसुनाकर कर दिया कि हम कैसे मान लें कि तुम्हारे साथ पुनीत सिंह ने ऐसा अमानवीय व्यवहार किया होगा, वह तो भला हो डीआईजी साहब का जिन्होंने दर्द को समझा और एफआईआर दर्ज कराने का आदेष दिया।

डीआईजी को लिखे मार्मिक पत्र को पढ़कर किसी का भी दिल भर आएगा, अगर नहीं भरेगा तो वह सूदखोर जिसने विपिन सिंह का सबकुछ छीन लिया। नषीली दवा खिलाकर जमीन जायदाद लिखवा लिया। मारापीटा और बंदूक दिखाकर कहा कि गांव से भाग जाओ नहीं तो जान से हाथ धोना पड़ेगा। इस तरह का अमानवीय व्यवहार करने वाले सूदखोर ही हो सकते है। डीआईजी से मिलकर कहा कि बहुत ही दुखी मन से न्याय की आस लिए आपके दरबार में आया हूं। जिस एसपी साहब से पीड़ित की बात तक पहीं सुनी, उस व्यक्ति को डीआईजी साहब ने पहले पानी पिलाया, फिर उसकी सुनी है। डीआईजी साहब जैसे पुलिस अधिकारियों के कारण ही जनता का विष्वास अभी पुलिस पर से पूरी तरह नहीं टूटा। कहा कि पिपरा गौतम निवासी पुनीत सिंह ने उसे दस फीसद ब्याज के दर पर तीन हजार पहली जुलाई 25 को उधार दिया। पैसा लेकर वह हरियाणा कमाने चला गया, लेकिन उसकी तबियत खराब हो गई। दस हजार रुपया फिर उसके खाते में पुनीत ने डाल दिया। एक रिष्तेदार को भेज कर कहा कि यह ठीक करवा देगें, दिल्ली 3-4 दिन रहा। उसके बाद उसे कोई नषीला पदार्थ खिलाकर बस्ती ले आए, दो-तीन दिन तक बंधक बनाए रखा, इनके तीन चार आदमियों ने मारापीटा भी। बंदूक निकालकर कहा कि तुम पागल हो तुम्हारा भाई भी पागल है, दोनों को मार दूंगा। मेरा कुछ नहीं कर पाओगे। कहा कि एक सुनियोजित तरीके से 18 दिसंबर 25 को रजिस्टी कार्यालय ले गए, वहां क्या लिखया पढ़ाया हम्हें कुछ नहीं मालूम। फिर हमको डरा धमकाकर कार से अयोध्या ले गए, वहां डरा धमकाया और हरियाणा भेजवा दिया। कहा कि किसी तरीके से जान बचाकर गांव आए और 27 फरवरी 26 को दोपहर में कालर पकड़कर मारापीटा, कहा कि हफतेभर में गांव छोड़ दो, नही ंतो जान से हाथ धोना पड़ेगा। उसके बाद छिपकर अपने घर में रहने लगा। 16 मार्च 26 को फिर पुनीत सिंह मारापीटा। कहा कि इसी हफते तुमको जमीन में तोप देगें। अब आप समझ गए होगें कि यह सूदखोर कितने क्रूर और अमानवीय होते है। षहर में कुछ और भी सूदखोर हैं, जिनके चगुंल से निकलने के लिए न जाने कितने दिनों से छटपटा रहे है। हालही में एक कायस्थ और षुक्लाजी का मामला सामने आ चुका, जिसमें भारी रकम का लेन-देन हुआ, फिर भी मूलधन रह ही गया। लोगों को सूदखोरों के खिलाफ आगे आना होगा, तभी समाज से सूदखोर रुपी कोढ़ समाप्त होगा।

‘फर्जीवाड़ा’ः सरकारी ‘अस्पतालों’ में ‘भी’ बिना ‘हस्ताक्षर’ के ‘मिल’ रही ‘रिपोर्ट’

बस्ती। जिन पैथालाजी की जांच रिपोर्ट पर गर्भवती महिलाओं और गर्भ में पल रहे बच्चों का जीवन-मरन निर्भर रहता है, अगर उसी रिपोर्ट की कोई विधिक मान्यता न हो तो कैसे जज्जा-बच्चा जिंदा रहेगें? बिना पैथालाजिस्ट के हस्ताक्षर के ओझा डायग्नोन्स्टि सेंटर में मरीजों को रिपोर्ट दिए जाने का मामला सोषल मीडिया पर खूब छाया रहा। सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन हैं, कि अगर किसी मरीज की लैब रिपोर्ट बिना पैथालाजिस्ट के हस्ताक्षर के जारी होती है, तो उसकी कोई विधिक मान्यता नहीं होती। इसी लिए सुप्रीम कोर्ट ने लैब की जांच रिपोर्ट पर पैथालाजिस्ट के हस्ताक्षर को अनिवार्य कर दिया, इसके पीछे दायित्व निर्धारण की बात कही गई। आप लोगों को जानकर हैरानी होगी कि जिला महिला अस्पताल और 100 बेड एमजीएच हर्रैया अस्पताल में दो-दो प्राइवेट लैब हैं, पैथालाजिस्ट भी है, लेकिन कोई जांच रिपोर्ट पर हस्ताक्षर नहीं करता, मरीज ऐसे रिपोर्ट को कहीं चैलेंज भी नहीं कर सकता। जिला महिला अस्पताल में पुजारी लाल गुप्त तो हर्रैया में डा. दीपक षुक्ल पैथालाजिस्ट के रुप में कार्यरत हैं, लेकिन जांच रिपोर्ट पर हस्ताक्षर नहीं करते, क्यों नहीं करते यह सवाल दोनों अस्पतालों के सीएमएस भी नहीं करते, ऐसा लगता है, कि दोनों सीएमएस ने मरीजों को भगवान के भरोसे छोड़ दिया, जब कि दोनों पैथालाजिस्ट को एक-एक लाख से अधिक का वेतन सरकार दे रही है, किस लिए दे रही है, यह सीएमएस नहीं पूछ पा रहे हैं। इससे लगता है, कि दोनों अस्पतालों में प्रषासनिक व्यवस्था नाम की कोई चीज ही नहीं रह गई, यहां के लोगों को जितना इंटरेस्ट सरकारी धन को लूटने और मरीजों का षोषण करने में रहता है, उतना दायित्वों के निर्वहन में नहीं रहता। इन दोनों अस्पतालों में एक भी ईमानदार ढूढ़ने से भी नहीं मिलेगा। यह रही पैथालाजिस्ट के गैरजिम्मेदाराना रर्वैए की बात। अब आ जाइए, दोनों अस्पतालों में एलटी यानि लैब टेक्निसिएन की भूमिका पर। हर्रैया में दो पद के सापेक्ष दो एलटी कार्यरत है। इन्हें भी एक-एक लाख मिलता है। सवाल उठ रहा है, कि जब जांच रिपोर्ट पर पैथालाजिस्ट हस्ताक्षर ही नहीं करेगें, तो दोनों एलटी के होने और न होने से क्या मतलब, इस लिए यह दोनों का ध्यान काम पर कम और राजनीति पर अधिक रहता है। यह दोनों तो खातें तो सरकार का नमक, गाते हैं, प्राइवेट पीओ सिटी और पीसीसीएल लैब की। जिला महिला अस्पताल में एक भी एलटी नहीं, यह अस्पताल बिना एलटी के चल रहा है। हर्रैैया अस्पताल में आज भी बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा हो रहा है, मैडम, सीएमएस फर्जीवाड़ा करने के लिए मुख्यालय से फर्जीवाड़ा स्पेसिलिस्ट बाबू को अतिरिक्त अटैच करवा रखा है। जिस अस्पताल में फर्जीवाड़ा करने के लिए बाहर से स्पेसिलिस्ट बाबू को बुलाया जाता है, उस अस्पताल की स्थित को अच्छी तरह से समझा जा सकता है। मरीजों और अस्पताल के असंतुष्ट सुरक्षा कर्मियों का दावा है, कि अगर ओपीडी और दवा काउंटर से मरीजों को दिए गए दवाओं का मिलान करा लिया जाए तो भारी अंतर मिलेगा। ओपीडी में कम और दवा काउंटर पर अधिक मरीजों को दवा देने के मामले का खुलासा हो सकता। अगर डाक्टर ने 20 ओपीडी किया तो 40 मरीजों को दवा देता हुआ मिलेगा। यही दवाएं बाद में फर्जी खरीद के काम आता है। काउंटर पर इतना सबकुछ हो जाने के बावजूद फार्मासिस्ट के द्वारा मरीजों को देखना और बाहर की दवा लिखना बंद नहीं किया गया। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि क्यों नहीं जिला महिला अस्पताल की तरह हर्रैया में भी सीसीटीवी कैमरे लगाए जाते। जबकि दो साल पहले षासन का आदेष सीसीटीवी कैमरा लगाने का है। अब आप समझ गए होगें कि जब से मैडम सीएमएस बनी क्यों नहीं सीसीटीवी कैमरा लगवाया गया। सीसीटीवी कैमरा लग जाएगा तो सबसे पहले मरीज को देखने वाले फार्मासिस्ट की चोरी पकड़ी जाएगी, और दूसरा डाक्टरों की ओपीडी की चोरी पकड़ी जाएगी। जिन डाक्टर्स डा. अनीता वर्मा, डा. रंजू कन्नौजिया और डा. अभय पटेल को जिला महिला अस्पताल में तीने-तीन एवं पांच दिन के लिए अटैच किया गया, वह खूब मजे है। यह डाक्टर वेतन तो हर्रैया से लेते हैं, लेकिन मौज बस्ती में करतें|

‘अगवाड़ा’ सील, ‘पिछवाड़ा’ ओपेन

बस्ती। सल्टौआ अस्पताल के एमओआईसी डा. अमित कन्नौजिया को मारने पीटने वाले अमित हॉस्पिटल एंड अल्ट्रासाउंड सेंटर के पिता-पुत्र के खिलाफ सीएमओ न तो एफआईआर दर्ज करवा पाए और न ही अपील करने के बावजूद डा. अमित कन्नौजिया का तबादला ही किया, आज भी एमओआईसी अपमान और पीड़ा के साथ नौकरी कर रहे है। सीएमओ की ओर से जो अस्पताल के लिए सीलिगं की कार्रवाई करवाई गई, उसका भी प्रभाव अस्पताल वालों पर नहीं पड़ा। सीएमओ साहब ने भले ही आगे से चारों षटर सील कर दिया, लेकिन पिछवाड़ा खुला हुआ है, और जो कारोबार सील होने के पहले चल रहा था, वह कारोबार सील होने के बाद भी चल रहा है, फर्क इतना है कि सामने नहीं बल्कि पीछे से चल रहा है।


पीछे से अस्पताल संचालित होने की जानकारी सीएमओ कार्यालय को भी हैं, लेकिन अभी तक पीछे वाला दरवाजा सील नहीं किया गया। बताया जाता है, डिप्टी सीएमओ डा. एसबी सिंह के द्वारा की गई कार्रवाई साजिष के तहत की गई, चूंकि मार एमओआईसी खाए थे, इस लिए समाज को दिखाने के लिए बाहर से सील कर दिया गया। आसपास के लोगों का कहना है, कि दिखावे के लिए सीएमओ ने अस्पताल को आगे से सील कर दिया, लेकिन कारोबार तो पीछे से चल ही रहा है। कहते हैं, ऐसा सील करने से क्या फायदा जो अवैध कारोबार को न रोक सके। बताया कि इसकी जानकारी सीएमओ को दी गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। विभाग ने एक तीर से दो निषाना किया, पहला कार्रवाई के नाम पर सील कर दिया, और दूसरा पिछवाड़े से कारोबार जारी रखने के लिए पैसा भी ले लिया। अब आप समझ गए होगें कि जब सीएमओ, पूर्व डिप्टी सीएमओ सीएल कन्नौजिया के पुत्र एमओआईसी अमित कन्नौजिया के मामले में हास्पिटल वालों से समझौता कर सकते हैं, तो यह लोग कुछ भी कर सकते। फिर कहा जा रहा है, कि अगर डिप्टी सीएमओ डा. एसबी सिंह मौके से न भागे होते और एमओआईसी को अकेला न छोड़े होते तो एक एमओआईसी मार खाने से बच जाता। एमओआईसी की मजबूरी हैं, कि वह सीधे एफआईआर नहीं दर्ज करवा सकते, वरना अब तक मारने वालों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज होता और जेल की हवा भी खानी पड़ती, लेकिन वाह रे सीएमओ और डिप्टी सीएमओ।

रोटरी ‘मण्डलाध्यक्ष’ ने बस्ती ‘ग्रेटर’ के ‘कार्यो’ को ‘सराहा’

बस्ती। रोटरी क्लब बस्ती ग्रेटर के अधिकारिक यात्रा पर वाराणसी से आये रोटरी मण्डलाध्यक्ष रोटेरियन डा. आशुतोष अग्रवाल (अध्यक्ष उत्तर प्रदेश अर्थोपेडिक एशोसिएशन) ने क्लब कार्यो की समीक्षा की। स्थानीय होटल में सदस्यों के साथ मिटिंग सम्पन्न हुई। रोटरी मण्डलाध्यक्ष ने बस्ती ग्रेटर के कार्यो की सराहना की और मोहल्ला क्लिनिक के पहल को सराहा। इस अवसर पर एक सदस्य की वृद्धि भी हुई ।


निर्वाचित अध्यक्ष रोटेरियन डा. वी. के. वर्मा ने रोटरी क्लब बस्ती ग्रेटर द्वारा किये जा रहे कार्यो के बारे में मण्डलाध्यक्ष रोटेरियन डा अशुतोष अग्रवाल को जानकारी दिया। बताया कि क्लब द्वारा जन सरोकारों से जुड़े अनेक कार्य किये जा रहे हैं। बैठक की अध्यक्षता क्लब अध्यक्ष राजेश्वरी वर्मा ने किया। सचिव रो. किशन कुमार गोयल, रोटेरियन डा वी. के. वर्मा, डा आलोक रंजन, रो. प्रतिभा गोयल, सुमित गोयल, एम आर वर्मा आदि उपास्थित रहे।

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