चैकिंए’ मतः ‘जनरेटर’ और ‘कम्बाइन’ लाइए, ‘ईधन’ ले ‘जाइए’!


‘चैकिंए’ मतः ‘जनरेटर’ और ‘कम्बाइन’ लाइए, ‘ईधन’ ले ‘जाइए’!

बस्ती। चैंकिए मत, बड़े-बड़े जनरेटर का इस्तेमाल करने वाले प्रतिष्ठानों के मालिकों और किसानों को ईधन के लिए अपने जनरेटर और कम्बाइन मषीन को पेटोल पंप तक ले जाना पड़ेगा। तभी उन्हें ईधन मिलेगा। किसी भी दषा में डम और जरकिन में ईधन नहीं मिलेगा। प्रतिष्ठान खुले या बंद हो जाए, या फिर कम्बाइन मषीन चले या न चले। डीएसओ को इससे कोई सरोकार नही। डीएसओ साहब ने बैनर के जरिए डीजल और पेटोल वाहनों के स्वामियों से कहा हैं, कि डीजल और पेटोल की कोई कमी नहीं हैं, आवष्यकतानुसार ही वाहनों में ईधन भरवाएं, स्पष्ट कहा गया है, कि किसी भी दषा में डम और जरकिन में ईधन नहीं मिलेगा। अगर किसी पंप वालों ने दिया तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी, डीएसओ साहब की नजर में डम और जरकिन में ईधन देने का मतलब भंडार करना। फरमान जारी करने से पहले डीएसओ साहब यह भूल गए, कि वे प्रतिष्ठान जिनके यहां बड़े-बड़े साइलेंसरयुक्त जेनरेटर लगे हैं, उन्हें कैसे ईधन मिलेगा? क्या वह लोग जनरेटर को क्रेन से पंप तक ले जाएगें? क्यों नहीं ऐसे प्रतिष्ठानों के लिए ईधन की कोई व्यवस्था की गई? सवाल उठ रहा है, कि आखिर ऐसे प्रतिष्ठानों का कारोबार कैसे होगा? जो बिना जनरेटर के चल ही नहीं सकते। सबसे बड़ा सवाल यह है, कि अगर प्रतिष्ठान जनरेटर को और बिना ईधन के किसान कम्बाइन मषीन को पेटोल पंप तक ले कैसे जाएगें? जाहिर सी बात हैं, कि इतना बड़ा जनरेटर बिना के्रन के पंप तक जा ही नहीं सकता, और रही कम्बाइन मषीन की तो उसे पंप तक ले जाने के लिए ईधन की आवष्यकता पड़ेगी, एक बार जनरेटर क्रेन से पंप तक जा सकता है, लेकिन बिना ईधन के कम्बाइन मषीन नहीं जा सकता। सवाल तो क्रेन के चलने पर भी उठेगा, क्यों कि उसे भी ईधन चाहिए।



उन प्रतिष्ठानों के मालिकों के लिए तो और भी मुसीबत हैं, जिनका जनरेटर तीसरी या चैथी मंजिल के छत पर लगा है। प्रतिष्ठानों के मालिक पंप तक जनरेटर ले नहीं जा सकते और पंप वाले डम और जरकिन में ईधन दे नहीं सकते तो प्रतिष्ठानें कैसे संचालित होगी? इसका मतलब प्रतिष्ठानों के मालिकों को अपने-अपने प्रतिष्ठानों में ताला लगाना पड़ेगा। ऐसे प्रतिष्ठानों में सबसे अधिक प्रभावित नर्सिगं होम वाले ही होगें, क्यों कि ऐसे लोगों का कारोबार पूरी तरह जनरेटर पर आधारित होता है, कोई भी आपरेषन बिना जनरेटर चलाए नहीं किया जा सकता हैं, क्यों कि अगर आपरेषन के दौरान बिजली चली गई तो मरीज की जान भी जा सकती है? न जाने कितने मरीज वेंटिलेटर पर रहते हैं, उनका क्या होगा? यह भी सवाल उठ रहा है, कि अगर डीएसओ के फरमान के चलते किसी मरीज की जान चली गई, तो क्या डीएसओ साहब इसकी जिम्मेदारी लेंगे? अनेक प्रतिष्ठानों के मालिकों का कहना है, कि अगर डीएसओ साहब को ऐसा लगता है, कि जो भी डम और जरकिन में ईधन ले जा रहा है, वह स्टोर करने या फिर जमाखोरी के लिए ले रहा है, तो डीएसओ साहब को उन्हीं लोगों को डम और जरकिन में ईधन देने का फरमान जारी करना चाहिए, जो प्रतिष्ठान का आईडी दिखाएं। आईडी के आधार पर डम या जरकिन में ईधन देने का आदेष/निर्देष पंप स्वामियों को देना चाहिए। कहते हैं, कि जिस तरह बिना हेलमेट के ईधन न देने की व्यवस्था हैं, ठीक उसी तरह बिना आईडी के डम और जरकिन में ईधन न देने की भी व्यवस्था बनानी चाहिए। अनेक लोगों का यह भी कहना है, कि प्रतिष्ठानों को ईधन बिना इस लिए नहीं बंद किया जा सकता है, क्यों कि वह लोग डम और जरकिन में ईधन ले जा रहे हैं? ऐसे में प्रषासन और डीएसओ को प्रतिष्ठानों की मजबूरी को भी समझना होगा, और यह समझना होगा, कि कोई भी प्रतिष्ठान जनरेटर को क्रेन से पंप तक ईधन भराने के लिए नहीं ले जा सकता। डीएसओ के फरमान के चलते अनेक पंप मालिकों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा। नौबत मारपीट और बाताकाही तक आ जा रही है। प्रतिष्ठानों को आईडी के जरिए डम और जरकिन में ईधन देने की व्यवस्था बनाने के लिए संगठन के पदाधिकारियों को भी पहल करनी चाहिए, ताकि वह भी समस्याओं से बच सके। अगर आईडी वाली व्यवस्था नहीं बनाई गई, और ईधन का संकट यूंही बना रहा, तो जिले के सैकड़ों प्रतिष्ठान बंदी के कगार पर पहुंच जाएगंी।

‘डीएचओ’ के ‘चलते’ किसान ‘आत्म हत्या’ करने ‘को’ ‘मजबूर’!

बस्ती। जिस किसान का डीएचओ 42 लाख डुबो देगें, वह किसान आत्महत्या नहीं करेगा तो और क्या करेगा? बैंक से लोन लेकर अगर कोई किसान पाली हाउस के लिए इतनी बड़ी रकम जमा करता है, और तीन साल बाद भी उसे एक रुपये का लाभ नहीं होता, बल्कि बैंक का कर्ज चुकाने के लिए दूसरा लोन लेना पड़ता है, तो किसान कैसे जिंदा रहेगा? ऐसे में किसानों की आय दोगुना कैसे होगी? किसान और उसका परिवार कैसे समृद्विषाली बनेगा? इस सवाल का जबाव योगीजी को देना है। यह किसान विकास खंड कप्तानगंज के बढ़नी गांव का रहने वाला और इसका नाम आलोक रंजन वर्मा है। आज यह किसान अपने आप को देष का सबसे अभागा किसान महसूस कर रहा है। क्यों कि अगर इस किसान को पता होता कि सरकार योजना तो किसानों के लिए बनाती है, लेकिन उसका लाभ विभाग के अधिकारी और फर्मे उठाती हैं, तो वह कभी न बैंक से लोन लेकर पाली हाउस का सपना देखता। डीएचओ ने कहा कि 58 लाख के इस प्रोजेक्ट पर सरकार 29 लाख का अनुदान देगी, इसी लालच में किसान 42 लाख लगा चुका, रही 29 लाख के अनुदान की तो वह तब मिलेगा जब प्रोजेक्ट पूरा होगा, जो प्रोजेक्ट तीन साल में नहीं पूरा हुआ, वह कब पूरा होगा, यही सोच-सोचकर किसान और उसके परिवार की रातों की नींद हराम हो गई। परिवार को अनेकों संकट का सामना करना पड़ रहा है। सवाल उठ रहा है, कि जब डीएचओ ने ‘नैतिक एग्री नामक फर्म’ नामक कार्यदाई संस्था से लाखों कमीषन खा लिया तो निर्माण कहां से और कैसे पूरा होगा? यह सवाल बना हुआ है। जिस डीएचओ ने ‘नैतिक एग्री नामक फर्म’ की गांरटी ली थी, वही डीएचओ फर्म से भी बड़ा बेईमान निकले। फर्म ने किसान को विष्वास में लेकर लखनउ वाला अपना कार्यालय भी दिखाया, लेकिन कुछ दिन बाद जब किसान पुनः लखनउ गया, उसे सिर्फ फर्म का बोर्ड मिला, कार्यालय कई दिनों से बंद बताया गया। यानि डीएचओ और कार्यदाई संस्था दोनों बेईमान, एक ने सरकारी अधिकारी बनकर किसान को ठगा तो दूसरे ने कार्यदाई संस्था बनकर किसान को धोखा दिया। कहने का मतलब सभी ने किसान को धोखा दिया, जिसके चलते किसान का 42 लाख डुबता नजर आ रहा है। जिस किसान का 42 लाख लगा हो, और उसे तीन साल में एक रुपये का भी लाभ न मिला हो तो किसान उसे डूबा ही मानेगा।  


देशभर में किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से चलाई जा रही एकीकृत बागवानी विकास मिशन पर उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद से गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। यहां एक किसान ने आरोप लगाया है कि पॉलीहाउस स्थापना में अनुदान का झांसा देकर उससे लाखों रुपये वसूले गए, लेकिन तीन साल बाद भी परियोजना अधूरी है और जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। किसान आलोक रंजन वर्मा का कहना है कि एकीकृत बागवानी विकास मिशन के तहत वर्ष 2023 में उन्हें 4000 वर्ग मीटर क्षेत्र में हाईटेक पॉलीहाउस स्थापित करने के लिए योजना के तहत चुना गया। परियोजना की कुल लागत लगभग 58 लाख रुपये आंकी की गई, जिसमें 50 प्रतिशत अनुदान का आश्वासन दिया गया था। किसान के अनुसार, उद्यान विभाग की ओर से नैतिक एग्री नामक फर्म को कार्यदायी संस्था नियुक्त किया गया। आरोप है कि फर्म ने बैंक के माध्यम से अलग-अलग किस्तों में करीब 42 लाख रुपये वसूल लिए, लेकिन आज तक पॉलीहाउस का निर्माण पूरा नहीं किया गया। अब फर्म के प्रतिनिधि संपर्क में भी नहीं हैं। मामले में सबसे बड़ा सवाल विभागीय जवाबदेही को लेकर उठ रहा है। किसान का आरोप है कि उसने कई बार जिला उद्यान अधिकारी और मंडलीय स्तर के अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन तीन साल में भी न तो जांच पूरी हुई और न ही फर्म के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई हुई। इससे विभाग और फर्म के बीच संभावित मिलीभगत की आशंका जताई जा रही है। पॉलीहाउस में जरबेरा जैसी व्यावसायिक फसल उगाने की तैयारी में किसान पहले ही भारी निवेश कर चुका है। खेत में गोबर की खाद, लगभग 50 क्विंटल नीम खली और अन्य पोषक तत्व डाले जा चुके हैं। अब निर्माण अधूरा होने के कारण खेती शुरू नहीं हो पा रही है, जबकि खेत में अत्यधिक खरपतवार उग आने से अतिरिक्त खर्च बढ़ गया है। किसान का कहना है कि जब तक फर्म द्वारा कार्य पूर्ण कर आधिकारिक रसीद नहीं दी जाती, तब तक अनुदान की राशि जारी नहीं होगी। ऐसे में उसकी पूरी पूंजी फंसी हुई है और आजीविका पर संकट गहरा गया है। उसके सामने आत्म हत्या करने के आलावा और कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा।

‘वित्तीय’ अनुमोदन के ‘प्रस्ताव’ को ‘हाईजैक’ कर रही ‘नगर पंचायतें’!

बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि जब कमिष्नर नगर पंचायतों के करोड़ों रुपये के वित्तीय प्रस्ताव का अनुमोदन नहीं दे रहें हैं, तो कौन दे रहा? और बिना अनुमोदन के हर साल करोड़ों खर्च कैसे हो रहें है? क्यों नहीं इसकी जांच एडीएम और डीएम स्तर से होती? सबसे बड़ा सवाल जिस प्रस्ताव का अनुमोदन एडीएम के द्वारा डीएम के माध्यम से कमिष्नर को जाना चाहिए, उस प्रस्ताव को क्यों नहीं नगर पंचायतें जिले पर भेज रही है? आखिर इसका जिम्मेदार कौन हैं? चेयरमैन या ईओ? जब इस मामले में कमिष्नर से पूछा गया तो उन्होंने कहा उनके पास वित्तीय अनुमोदन के लिए प्रस्ताव नहीं आ रहे है। पहले जब कमिष्नर के यहां अनुमोदन के लिए प्रस्ताव आता था, तो उसकी क्वेरी होती थी, जिसमें कई प्रस्ताव का अनुमोदन ही नहीं दिया जाता था।

जानकार बताते हैं, कि जिले में इस लिए अनुमोदन के लिए प्रस्ताव भेजा जाता था, ताकि किसी वित्तीय अनियमितता को रोका जा सके। नियमानुसार अगर बोर्ड के द्वारा किसी काम का प्रस्ताव किया गया तो उसके वित्तीय अनुमोदन के लिए प्रस्ताव को एडीएम के पास भेजा था, एडीएम के हस्ताक्षर के बाद डीएम के माध्यम से अंतिम अनुमोदन के लिए प्रस्ताव को कमिष्नर के पास भेजे जाने का प्राविधान है। हैरानी होती है, हर माह जिले स्तर पर इसकी मानिटरिंग एडीएम की अध्यक्षता में होती है, तो फिर सवाल उठ रहा है, कि पिछले तीन सालों से किसी एडीएम ने यह क्यों नहीं देखा कि नगर पंचायतें क्यों नहीं जिले पर अनुमोदन के लिए प्रस्ताव भेज रही है? आखिर इस विभाग का एलबीसी कार्यालय क्या कर रहा है? इससे साफ होता है, कि एलबीसी कार्यालय वही करता है, जो नगर पंचायतें चाहती हैं, वैसे भी इससे पहले भी एलबीसी कार्यालय पर अनेक गंभीर आरोप लग चुके है। सवाल उठ रहा है, कि जो एलबीसी सीधे एडीएम के अधीन हो वह कार्यालय कैसे मनमानी कर सकता है? और उस कार्यालय के लोगों पर कैसे आरोप लगते रहें हैं? यह सही है, कि एलबीसी कार्यालय भ्रष्ट नगर पंचायतों के बचाव के ढाल का काम कर रही है। जिले भर के नगर पंचायतों में भ्रष्टाचार की लूट मची हुई, लेकिन आज तक एक भी नगर पंचायत के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई, जो षिकायत करता भी है, तो उसकी जांच ही नहीं होती, अगर होती भी है, तो उसे भी लीपापोती कर दी जाती है। नगर पंचायतें जिस तरह बेलगाम हो चुकी है, उसके लिए पूरी तरह एलबीसी कार्यालय को जिम्मेदार माना जा रहा है, एलबीसी कार्यालय को जिम्मेदार मानने का मतलब एडीएम को जिम्मेदार मानना। कहा भी जाता है, कि बजाए दस नगर पंचायतों को सुधारने को अगर एडीएम साहब सिर्फ एलबीसी कार्यालय को सुधार लें तो काफी हद तक भ्रष्टाचार पर लगाम लगाया जा सकता है। हालांकि कमिष्नर ने इसकी जांच करने की बात कही है। नगर पंचायतों का प्रस्ताव को हाईजैक करने के पीछे मनमाने तरीके से धन को खर्च करना, इससे अन्य योजना का धन अन्य योजना में खर्च करने की संभावना बनी रहती है। षायद ही कोई ऐसी नगर पंचायत हो जो प्रस्ताव को हाईजैक न किया हो। एकाद ईमानदार भी हो सकती है।

‘राष्ट्रीय’ स्तर पर ‘सम्मानित’ हुए ‘उदय षंकर षुक्ल’

बस्ती। जिले के षिक्षक उदयषंकर षुक्ल को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया। अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ द्वारा बस्ती जनपद के उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ जिलाध्यक्ष उदय शंकर शुक्ल को उनके सांगठनिक योगदान और शिक्षक हितों के लिये निरन्तर संघर्ष को देखते हुये नई दिल्ली के जनकपुरी स्थित राष्ट्रीय कार्यालय पर आयोजित बैठक में अंग वस्त्र भेंटकर सम्मानित किया गया।


शिक्षक संघ के राष्ट्रीय संरक्षक सांसद जगदम्बिका पाल और राष्ट्रीय अध्यक्ष सुशील कुमार पाण्डेय ने माला पहनाकर अग वस्त्र देकर उदय शंकर शुक्ला को सम्मानित किया । कहा कि वे संघर्षशील शिक्षक नेता है और पुरानी पेंशन बहाली के साथ ही टेट के नियमों को वापस कराने के लिये निरन्तर सघर्ष कर रहे हैं। सांसद जगदम्बिका पाल ने सुशील कुमार पाण्डेय को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये जाने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुये कहा कि निश्चित रूप से वे शिक्षक हितों के लिये रचनात्मक प्रयास करेंगे और समस्याओं का प्रभावी समाधान होगा। सांसद जगदम्बिका पाल ने कहा कि पुरानी पेंशन बहाली और टेट के सवाल को लेकर वे अपने स्तर से हर संभव पहल करेंगे। राष्ट्रीय संरक्षक जगदम्बिका पाल ने कहा कि उदयशंकर शुक्ल ने शिक्षकों की समस्याओं के लिए जिस तरह से अपना रचनात्मक संघर्ष जारी रखा है ऐसा काम विरले लोग कर पाते हैं। उन्होने शिक्षक हितों के लिये अपना पूरा जीवन दांव पर लगा दिया है। सम्मानित होने के बाद उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ जिलाध्यक्ष उदय शंकर शुक्ल ने कहा कि उनका पूरा जीवन शिक्षक हितों के लिये समर्पित है। जीवन के आखिरी क्षण तक वे शिक्षक हितों के लिये अपना संघर्ष जारी रखेंगे। बैठक में अनेक राज्यों के पदाधिकारी शामिल रहे। राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित होने के बाद राष्ट्रीय कार्यालय पर प्रथम बैठक सुशील कुमार द्वारा आयोजित किया गया था जिसमें राष्ट्रीय संरक्षक सांसद जगदंबिका पाल, अनुज त्यागी, नरेश कौशिक, गिरीश शर्मा सहित विभिन्न राज्यों के पदाधिकारियों ने उदयशंकर शुक्ल को सम्मानित किये जाने पर प्रसन्नता व्यक्त किया। 

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