अनूप खरे’ और ‘दिप्ती खरे’ के खिलाफ ‘एनबीडब्लू’

 

‘अनूप खरे’ और ‘दिप्ती खरे’ के खिलाफ ‘एनबीडब्लू’

बस्ती। सीजेएम न्यायालय से अनूप खरे बनाम केके सिंह मामले में अनूप खरे और दिप्ती खरे के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी हुआ। यह एनबीडब्लू अदालत में गैर हाजिर होने के कारण जारी हुआ, हालांकि उस दिन दोनों की ओर से हाजीरी माफी की दरखास्त दी गई, थी, चूंकि उस दिन न्यायालय के द्वारा आरोप पत्र बनना था, इस लिए सीजेएम ने हाजरी माफी के दरखास्त को रिजेक्ट करते हुए एनबीडब्लूडी जारी कर दिया। इसी मामले में दिव्याषुं खरे भी मुजरिम हैं, चूंकि यह हाजिर हो गए, और इनका आरोप पत्र तय हो गया, इस लिए इनके खिलाफ एनबीडब्लूडी जारी नहीं हुआ। सवाल उठ रहा है, कि जब एक ही तारीख को तीनों को उपस्थित होना था, और उस दिन तीनों के खिलाफ आरोप पत्र बनना था, तो क्यों सिर्फ दिव्याषुं खरे तारीख पर आए, और क्यों नहीं अनूप खरे और दिप्ती खरे आए। ‘कृष्ण कुमार सिंह’ ने चाचा-भतीजा पर नौकरी के नाम पर 38 लाख की ठगी करने का आरोप लगाकर न्यायालय से न्याय की गुहार लगाई है। सीजेएम के यहां से दोनों को समन भी जारी हुआ, जिस पर दोनों को जमानत भी करानी पड़ी। इसी मामले में नौ अप्रैल 26 को तारीख थी, और इसी दिन तीनों के खिलाफ आरोप-पत्र बनना था, चूंकि आरोप-पत्र बनने के दौरान मुल्जिम को न्यायालय में उपस्थित रहना आवष्यक होता है। लेकिन अनूप खरे और दिप्ती खरे हाजिर नहीं हुई, और दिव्याषुं खरे हाजिर हो गए। चेक बाउंस के मामले में अनूप खरे के साथ में उनकी भाभी दिप्ती खरे को पार्टी बनाया गया है। सीजेएम न्यायालय में दो मुकदमें कायम किए गए, एक में केके सिंह पुत्र षमसेर सिंह बनाम अनूप खरे और उनकी भाभी दीप्ति खरे और दूसरे में केके सिंह बनाम दिव्यांषु खरे पुत्र आषीष खरे का है। दिव्याषुं खरे के मामले में 23 लाख और अनूप खरे के मामले में 15 लाख का मामला है।

दाखिल मुकदमें में कहा गया है, कि दिव्यांषु खरे और इनके सगे चाचा अनूप खरे जो कई विधालयों के प्रबंधक हैं, एवं भाजपा के कदावर नेता भी है। अनूप खरे की पत्नी सीमा खरे नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव भी लड़ चुकी है। कहा कि विपक्षी के चाचा का सीबीएससी इंटर मीडिएट तक का विधालय जो द सीएमएस के नाम से है। चूंकि हमारा ठेका-पटटी का भी काम होता है, जिसके चलते अनूप खरे से काफी अच्छा संबध रहा। चुनाव में हम और हमारा लड़का खूब प्रचार किया। लिखा कि चाचा ने हमारे लड़के की नौकरी लगाने के नाम पर 38 लाख की मांग कीं, चुनाव बाद नौकरी लगवाने की बात कही, भरोसा करके 29 अक्टूबर 24 को दिव्यांषु खरे के खाते में आरटीजीएस के जरिए दस लाख भेज दिया। कहा कि जो हमने दस लाख दिया, वह अपने दोस्तों और षुभचिंतकों से उधार लेकर दिया। लिखा कि जब इनकी पत्नी चुनाव हार गई, तो पार्टी में इनकी पकड़ कमजोर हो गई, इसी लिए यह न तो लड़के को नौकरी दिला सके और न पैसा ही वापस किया। कहा कि जब काफी दबाव बनाया तो 18 अगस्त 25 को 23 लाख का चेक दिया, अवषेष 15 लाख का चेक अनूप खरे ने दिया। लिखा कि जब हम 18 और 19 सितंबर 25 को बैंक में चेक डाला तो पता चला पर्याप्त धन न होने के कारण चेक बाउंस हो गया, जब इसकी जानकारी विपक्षी को दी गई, तो उन्होंने 24 सितंबर 25 को पुनः चेक लगाने को कहा, लेकिन 25 सितंबर को फिर पता चला कि खाते में पैसा न होने के कारण चेक दूसरी बार बाउंस हो गया। जिसकी जानकारी फिर विप़क्षी को देना चाहा, तो फोन नहीं उठाया, पुनः 25 को चेक डाला, लेकिन तीसरी बार 30 सितंबर 25 को भी चेक डिस्आनर हो गया। लिखा कि मजबूर होकर विप़क्षी को तीन अक्टूबर 25 को लीगल नोटिस भेजा, नोटिस तो ले लिया, लेकिन समय अवधि बीत जाने के बाद भी भुगतान नहीं किया, और न ही नोटिस का कोई जबाव दिया। तब इसे सीजेएम के यहां परिवाद दाखिल हुआ। जिसमें दिव्यांषु खरे से 23 लाख मय ब्याज सहित वापस दिलाने की मांग न्यायालय से की गई। इस पर न्यायालय की ओर से पहले सम्मन जारी हुआ, जिसमें दोनों को जमानत करवानी पड़ी। इसी तरह का एक अन्य मुकदमा अनूप खरे और उनकी भाभी दीप्ति खरे बनाम केके सिंह के नाम से दाखिल हुआ। इसमें भी वही बाते कही गई, न्यायालय से इस मामले में अनूप खरे से 15 लाख मय ब्याज के वापस दिलाने की मांग की गई, इसमें भी सम्मन जारी हुआ और जमानत करानी पड़ी। अब इसी मामले में अनूप खरे और दिप्ती खरे के खिलाफ सीजेएम ने गैर जमानती वारंट जारी किया। अब अगली सुनवाई 20 अप्रैल 26 को है। 

कहां ‘गुम’ हो गए, ‘पार्टी’ को ‘षून्य’ से ‘षिखर’ तक ‘पहुंचाने’ वाले ‘कैडर’!

बस्ती। बार-बार यह सवाल उठ रहा है, कि भाई वह कैडर वाले कहां गुम हो गए, जिन्होंने अपने खून-पसीने से पार्टी को षून्य से षिखर तक पहुंचाया। पार्टी ने ऐसे लोगों को क्यों किनारा कर दिया? जिनके रग-रग में भाजपाई बसा हुआ हैं, और जो आज भी पार्टी के लिए कुछ भी करने को तत्पर है। क्यों नहीं पार्टी ऐसे लोगों की सेवाएं ली जा रही है? जब कि इनमें भाजपा की डूबती नैया को पार लगाने की पूरी काबिलियत हैं। यह वही भाजपा के सच्चे सिपाही लोग हैं, जिन्होंने अपने त्याग, बलिदान और मेहनत से जिले में पांच-पांच विधायक और एक सांसद को जीताया। लेकिन जैसे ही इनके स्थान पर आयातित लोगों को पलकों पर बैठाना षुरु हुआ, वैसे ही चार विधायक और एक सांसद हार गए। उसके बाद भी पार्टी की आंख नहीं खुल रही है, ऐसा लगता कि मानो पार्टी की आंख तब खुलेगी, जब जिले से भाजपा का सफाया हो जाएगा। वैसे सफाया करने का इंतजाम हो भी चुका है। कहना गलत नहीं होगा कि आज जिन आयातित लोगों को पलकों पर बैठाया जा रहा है, उनका एक मात्र उद्वेष्य भाजपा के नाम पर अधिक से अधिक पैसा और नाम कमाना है। अगर पार्टी ऐसे लोगों से 2027 की नैया पार लगाने की आषा करती है, तो पार्टी की यह एक और बड़ी भूल होगी, जिन लोगों को पार्टी पद से नवाज रही हैं, और पलकों पर बैठा रही है। अगर उनमें एक दो को छोड़ दिया जाए तो अन्य लोगों में इतनी भी कूबत नहीं कि वे अपने गांव से भाजपा को जीता सके, या फिर इनके कहने पर 40-50 वोट भी भाजपा को मिल सके। इस सच को स्थानीय, क्षेत्रीय और प्रदेष के नेता भी अच्छी तरह जानते और समझते हैं, और इसका अनुभव भी इन लोगों को विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में हो भी हो चुका है। उसके बाद भी कैडर के लोगों की उपेक्षा की जा रही है। यह तो खुद के पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसी बात होगी। यह एक गंभीर सवाल है, कि वे कौन लोग हैं, जो कैडर के लोेगों को किनारा करके ऐसे लोगों को पद से नवाज रहें और सम्मान दे रहें हंै, जो पार्टी के प्रति न तो कभी वफादर रहें हैं, और न इन्हें पार्टी के विचारधारा से ही कोई सरोकार रहा, तो फिर ऐसे लोगों को क्यों पलकों पर बैठाया जा रहा हैैं? और क्यों पार्टी के आन-बान और षान रहे कैडर के लोगों की उपेक्षा की जा रही है? अगर पार्टी, जिले के वर्तमान कैबिनेट के भरोसे 2027 फतह करने की सोच रही है, तो पार्टी को अपनी सोच को पार्टी हित में बदलना होगा, और ऐसे कैडर के लोगों की टीम खड़ी करनी होगी, जिस पर पार्टी पूरी तरह भरोसा कर सकें। इन्हीं भरोसे में एक नाम हैं, अभय पाल का। सारी योग्यता के बावजूद भी यह इस लिए जिलाध्यक्ष नहीं बन पाए, क्यों कि यह किसी के मनई-तनई नहीं बन सके। जिस कोर कमेटी के 10 में से आठ-नौ सदस्यों ने इनके नाम पर मोहर लगाया, और जिसे पूरा जिला जानता था, कि इस बार जिलाध्यक्षी का ताज अभय पाल के सिर पर ही सजेगा। लेकिन दिल्ली के एक फोन ने इनके सिर से ताज उतारकर एक ऐसे व्यक्ति के सिर पर सजा दिया, जो कार्यकत्र्ता की पहली पसंद तक नहीं रहे। जिसका नतीजा आज सबके सामने है। कहा भी जाता है, कि जब तक दिल्ली का फोन आता रहेगा, तब तक योग्य और कैडर लोगों की उपेक्षा होती रहेगी।

बहरहाल, सबसे पहले हम आप लोगों को भाजपा के उन ‘हीरा’ कहे जाने वाले कैडर के बारे में बताने जा रहा हैं, जिनके चलते आज भाजपा में कुछ लोग मलाई काट रहे है। यह ऐसे भाजपाई हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जवानी भाजपा के नाम कुर्बान कर दिया। भाजपा के प्रति इन लोगों का जूनून देखते बनता है। चाहते तो यह लोग भी अपनी निष्ठा बदल सकते थे, लेकिन नहीं। अगर किसी हीरा का नाम भूल से छूट गया हो तो वह माफ करेगें। रविंद्र गौतम, चंद्र षेखर मुन्ना, अरविंद गोला, पवन कसौधन, सुषील सिंह, राम चरन चैधरी, दिवाकर मिश्र, चंद्रभान गुप्त, चतुरगुन राजभर, गणेष नरायन मिश्र, राजेंद्र गौड़, चुनमुन लाल, नंद किषोर, ष्याम मणि त्रिपाठी, विष्वदत्त षुक्ल, लालजी प्रसाद, षोभी सोनकर, अवधेष सिंह, मनमोहन श्रीवास्तव उर्फ काजू श्रीवास्तव सहित कई ऐसे संर्घषषील भाजपा कार्यकत्र्ता हैं, जिन्होंने भाजपा को षून्य से षिखर तक पहुंचाया। अगर आज आप लोगों को इन्हें तलाषना हो तो बड़ी मुस्किल से इनका पता मिलेगा।

अब जरा आज की टीम को देख लीजिए, अंदाजा लग जाएगा, कि इन लोगों की और पार्टी के विचारधारा में कितना अंतर है। कोई मोदी, षाह और योगी का नारा लगाकर और भक्त बताकर भाजपाई नहीं बन सकता। भाजपाई बनने के लिए कैडर के लोगों जैसा त्याग और बलिदान करना होगा। जिस टीम में ब्रहृमदेव उर्फ देवा, अनिल दूबे, अरविंद पाल, पिंटू तिवारी, दिलीप पांडेय और अभिषेक कुमार और भोलू सिंह जैसे लोग रहेगें, तो समझ सकते कि भाजपा कहां जाएगी। भाजपा के प्रति इन लोगों की निष्ठा किसी से छिपी हुई नहीं रह गई। अनेक भाजपाई कहते भी हैं, कि अगर 2027 में कहीं सत्ता परिर्वतन हो गया तो इनमें में से न जाने कितनों को वाहन में झंडा बदलते देर नहीं लगेगा। दयाषंकर मिश्र आज भी कहते हैं, कि हमने पार्टी भाजपा की नीतियों के कारण नहीं बल्कि हरीष द्विवेदी के कारण छोड़ा। यह उस दयाषंकर मिश्र का दर्द हैं, जिन्होंने जिलाध्यक्ष रहते सिर्फ और सिर्फ हरीष द्विवेदी का नाम प्रत्याषी के रुप में भेजा था, और इन्हीं के कार्यकाल में सबसे अधिक वोटों से जीतें भी। अगर कोई व्यक्ति पार्टी छोड़ने का कारण बनता है, तो पार्टी को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।

‘रत्नाकर’ ने ‘दिव्याष्ंाु’ को लगाया ‘दो करोड़’ का ‘चूना’!

बस्ती। अगर दिव्याषुं खरे पर करोड़ों का चूना लगाने का आरोप लग सकता है, तो दिव्याषुं खरे भी रत्नाकर श्रीवास्तव पर लगभग दो करोड़ कर चूना लगाने का आरोप लगा सकते है। कहने का मतलब चूना लगाने का आरोप सिर्फ दिव्याषुं खरे पर ही नहीं लग रहा है, बल्कि अन्य पर भी लग रहा है। आरोप लगाने और चूना लगाने वाले कोई अंजान नहीं हैं, कभी दोनों में गहरी दोस्ती थी, एक दूसरे के घर आना जाना और दावतें करना होता था, अचानक न जाने क्या हुआ कि दिव्याषंु खरे की नजर में रत्नाकर श्रीवास्तव एवं उनकी पत्नी वर्षा श्रीवास्तव चोर हो गई। जितने भी लेन-देन के मामले अब तक सामने आए, उनमें कहीं न कहीं घरेलू संबध रहें, नमन श्रीवास्तव की पत्नी षिवांगी श्रीवास्तव तो अनूप खरे की सगी भांजी है। रही बात दिव्याषुं खरे और रत्नाकर श्रीवास्तव की तो दोनों में दांत काटों वाली दोस्ती कभी थी। दोनों कभी एक दूसरे के बिना रह नहीं सकते थे। अब तक जितने भी रिष्ते खराब हुए, वे सभी लेन-देन में ही हुए। इसी लिए कहा भी जाता हैं, कि दोस्ती और रिष्ता तब तक बरकरार रहता है, जब तक लेन-देन नहीं होता। कहावत भी हैं, कि अगर रिष्ते को पहचानना हैं, तो लेन-देन करके देख लो। लेन-देन करना कोई बुरी बात नहीं हैं, बुरी बात है, नीयत खराब होना। अब जरा अंदाजा लगाइए कि कितने लोग ऐसे होगें, जिनके पास करोड़ों होगा, अधिकांष लोगों ने तो लाख दो लाख तक ही देखा होगा, करोड़ तो खबरों में पड़ने को मिलता है। लेकिन षहर में खरे जैसे न जाने कितने लोग होगें, जो करोड़ों रुपया सूद पर देते और लेते हैं। मामला तब प्रकाष में आता है, जब लेन-देन में बेईमानी या फिर सूसाइड या फिर हत्या जैसे मामले सामने आते है। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि क्या इंसान कम पैसे में नहीं गुजारा नहीं कर सकता या फिर ईमानदारी से नहीं रह सकता। माना जाता है, कि जितना सुखी एक गरीब आदमी रहता और आराम से सोता है, उतना बेईमान नहीं। यह कहना भी गलत होगा, कि बेईमान ही राज करते हैं, और बेईमानों का ही बोलबाला। जरा उन लोगों के परिवार को भी देखिए, जो ईमानदारी से जीवन यापन कर रहे है। देखा जाए तो समाज को ऐसे लोगों के ईमानदारी पर नाज करना चाहिए, जिन्हें अपनी मेहनत और किस्मत पर भरोसा है। ऐसे लोगों पर नहीं जिनका पूरा का पूरा परिवार आईफोन लेकर घूमता वह भी उधार का लेकर।

अब जरा दिव्याषुं खरे का दर्द भी सुन लीजिए। एसपी को दिए गए प्रार्थना बंद में इन्होंने रामेष्वरपुरी निकट बजाज एजेंसी कंपनीबाग के दवा के कारोबारी रत्नाकर श्रीवास्तव पुत्र प्रेम चंद्र श्रीवास्तव पर आरासेप लगाया है, कि इन्होंने कारोबार के लिए एक करोड़ 90 लाख लिया, और जो भी रकम दिए गए, सभी एकाउंट में दिए। कहा कि 2021 से आनलाइन लेन-देन होता रहा। व्यवसायिक में मेरा विष्वास रत्नाकर श्रीवास्तव और उनकी पत्नी वर्षा श्रीवास्तव से हो गया। रत्नाकर ने उसे दो मंजिला मकान खरीदने के लिए प्रेरित किया। जमीन और मकान की कीमत तीन करोड़ से अधिक बताई गई। रत्नाकर ने यह भी कहा कि अगर तुम खरीदोगे तो 2.50 करोड़ में दे देगें। अगस्त 2025 में बैनामा करने को कहा। अपनी बात को पुख्ता करने के लिए वार्ता के समय अपने मित्र अनुभव श्रीवास्तव पुत्र राकेष श्रीवास्तव एवं सूरज श्रीवास्तव पुत्र सतीष चंद्र श्रीवास्तव को गवाह बनाया। दस्तावेज के रुप में नगर पालिका का एसेसमेंट दिया,? इसी आधार पर अपने बैेंक एचडीएफसी के खाता 501000350290511 एवं चाचा अनूप खरे के आईसीआईसीआई बैंक के खाता 066205500427 से 15 जुलाई 25 को एक करोड़ 90 लाख रत्नाकर और उनकी पत्नी वर्षा के बैंक में टांसफर कर दिया। पैसा देने के बाद मकान और जमीन का बैनामा करने को कहा। जिस पर पति और पत्नी हीलाहवाली करने लगें। लिखा कि जब उसने पालिका जाकर एसेसमेंट की सत्यतता पता किया तो पता चला कि उक्त मकान तो रत्नाकर की माता कृष्ण मोहनी के नाम पर है। इसके बाद जब बैनामा करने का दबाव बनाया तो कहा कि माताजी बैनामा करने को तैयार नहीं है। तब कहा कि ठीक हैं, पैसा वापस कर दो, बहाना करते रहे। मजबूर होकर दोनों दोस्तों के साथ रत्नाकर के पास नौ नवंबर 25 को सांयकाल छह बजे गए, पैसा मांगने पर नाराज हो गए, और गाली देते हुए कहा कि जाओ पैसा नहीं मिलेगा, जो करना हो कर लो। लिखा कि पैसा मांगने पर उल्टा कानूनी कार्रवाई करने और जान से मारने की धमकी देते है। लिखा कि वह इसकी जानकारी कोतवाली में थी, लेकिन एफआईआर नहीं लिखा गया। लिखा िकवह दस माह से पैसा और एफआईआर लिखाने के लिए परेषान हूं, लेकिन न तो एफआईआर दर्ज हो रहा है, और न पैसा ही वापस मिल रहा।

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पूरी ‘दुनिया’ मानती है, कि ‘पीएम’ हो तो ‘मोदीजी’ जैसाःअनिल दूबे

बस्ती। कुदरहा ब्लाॅक के प्रमुख अनिल दूबे ने कहा कि सरकार का लक्ष्य अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाना है, जिसे लगातार पूरा किया जा रहा है। कहा कि मोदी और योगी के राज में देष और प्रदेष का जितना विकास हुआ, उतना पिछले 75 सालों में भी नहीं हुआ। एक तरह से दोनों नेता देष और प्रदेष में विकास की गंगा बहा रहे है। मोदीजी की लोकप्रियता न सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में है। पूरी दुनिया मानती है, कि पीएम हो तो मोदीजी जैसा। यह बाते उन्होंने भाजपा के 47वें स्थापना दिवस के अवसर पर कुदरहा गांव में घर-घर जाकर जनसंपर्क अभियान के दौरान कहा।


इस दौरान उन्होंने केंद्र व प्रदेश सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और उपलब्धियों की जानकारी ग्रामीणों को दी। उनके साथ मंडल अध्यक्ष दुर्गेश अग्रहरी, महंथ पाल, ग्राम प्रधान प्रतिनिधि इंद्र कुमार, पूर्व मंडल अध्यक्ष मनोज पासवान और सचिदानंद यादव भी मौजूद रहे। ब्लॉक प्रमुख ने बताया कि सरकार द्वारा गरीबों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत योजना, किसान सम्मान निधि और मुफ्त राशन जैसी योजनाओं से लाखों लोगों को सीधा लाभ मिला है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार का लक्ष्य अंतिम व्यक्ति तक हर हाल में सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना है। जिसे लगातार पहुंचाया जा रहा है। मंडल अध्यक्ष दुर्गेश अग्रहरी ने कहा कि भाजपा सरकार ने गांव, गरीब और किसानों के उत्थान के लिए ऐतिहासिक कार्य किए हैं। सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य सेवाओं में अभूतपूर्व सुधार हुआ है। कार्यक्रम के दौरान कार्यकर्ताओं ने जनता से सरकार की योजनाओं का लाभ उठाने की अपील की और भाजपा को और मजबूत बनाने का आह्वान किया। ग्रामीणों ने भी सरकार की योजनाओं पर संतोष जताया।

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सैकड़ों ‘सीजनल’ कर्मचारी ‘भुखमरी’ से जूझ ‘रहें’ःचंद्रेष प्रताप सिंह

बस्ती। जिले की फेनिल (बजाज) सुगर मिल लिमिटेड गोविंदनगर वाल्टरगंज बस्ती के लगभग 270 सीजनल श्रमिक अपने बकाया देयक के भुगतान को लेकर वर्ष 2018 से संघर्षरत व धरनारत है वाल्टरगंज चीनी मिल को बिना किसी सूचना व नोटिस के वर्ष 2018 में बंद कर दिया गया बंदी की सूचना न महाप्रबंधक कारखाना को दी गई न जिला प्रशासन को न ही मिल कर्मचारियों को जनसूचना अधिकार के तहत सीजनल मिल कर्मचारी चंद्रेश प्रताप सिंह ने जब कारखाना महाप्रबंधक लखनऊ व जिला प्रशासन जिला गन्ना अधिकारी से सूचना मांगा की क्या बस्ती जिले की वाल्टरगंज चीनी मिल को बंद करने का अनुज्ञा दिया गया है किसी मिल कारखाना को तब तक बंद नहीं किया जा सकता जबतक कारखाना महाप्रबंधक से अनुज्ञा व जिलाधिकारी द्वारा आदेश न हो सब मिलाकर वाल्टरगंज चीनी मिल कागजों में चल रही है।


वहीं जिला गन्ना अधिकारी ने सूचना नहीं दिया बस्ती के सत्ता व विपक्ष दोनों के जनप्रतिनिधि व प्रशासनिक अधिकारी पूंजीपतियों उद्योगपतियों के लिए खड़े हैं बेरोजगार किए लोगों और जिले के विकास से इनका कोई वास्ता सरोकार नहीं है लगभग 270 सीजनल कर्मचारी भुखमरी तंगी आर्थिक संकटों से जूझ रहे हैं जिले के प्रथम नागरिक व जिला प्रशासन मिल प्रबंधन तंत्र के साथ वाल्टरगंज चीनी मिल को कटवाकर बेचवाना चाहते हैं श्रम विभाग ने सीजनल कर्मचारीयों के बकाया देयक भुगतान हेतु 12 करोड़ का मिल प्रबंधन तंत्र को नोटिस भी जारी किया है नियमित कर्मचारियों को बीआर एस दिया जा रहा है व नौकरी करने के इच्छुक लोगों को फेनिल से बाजाज हिंदुस्तान सुगर मिल के विभिन्न यूनिटों में ट्रांसफर किया जा रहा है वहीं आर्थिक तंगी संकटों से जूझ रहे सीजनल कर्मचारीयों के साथ घोर अन्याय किया जा रहा है चीनी मिल मालिक प्रबंधन तंत्र जिला प्रशासन एक मत होकर सीजनल कर्मचारीयों के साथ अत्याचार अन्याय कर रहे हैं सीजनल कर्मचारी तब तक धरना रत रहेंगे जब तक इनके बकाया व भविष्य का निर्धारण नहीं होता जिलाधिकारी महोदया सीजनल कर्मचारीयों के बकाया देयक बीआर एस की बात करती है वहीं चीनी मिल वाल्टरगंज के विषय को निस्तारण करने के लिए नामित अपर जिलाधिकारी बस्ती सीजनल कर्मचारीयों के बकाया व भविष्य निर्धारण को नाकार रहे हैं चीनी मिल वाल्टरगंज के सीजनल श्रमिक चीनी मिल गेट पर रोस्टर बनाकर रात दिन धरना रत है अध्यक्ष जिला पंचायत बस्ती व जिला प्रशासन चीनी मिल को कटवाकर बेचने में लगे हैं।चीनी मिल कर्मचारियों ने तय किया है कि अपने माता-पिता बीबी बच्चों सहित चीनी मिल पर धरना आंदोलन करेंगे यदि शीघ्र अतिशीघ्र बकाया देयक बीआर एस अन्य यूनिटों में ट्रांसफर कारवाई शीघ्रता से नहीं हुआ तो रेलवे पटरी पर सोकर सभी कर्मचारी अपने माता-पिता बीबी बच्चों सहित अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेंगे। बस्ती के जनविरोधी रोजगार विरोधी और पूंजीपतियों उद्योगपतियों के हाथ बिके नेता जनप्रतिनिधि जिम्मेदार होंगे।रोस्टर के हिसाब से आज धरना पर चंद्रेश प्रताप सिंह, विकास सिंह सुनील राव सिपाही यादव राम गोपाल चैधरी सत्य राम मौर्य शिवचरन वीरेंद्र कांशीराम जमुना पांडेय सहित तमाम लोग उपस्थित रहे।

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