डिप्टी सीएम’ ने पकड़ी ‘सीएमओ’ के ‘नौ करोड़’ ‘की’ ‘चोरी’!

 

‘डिप्टी सीएम’ ने पकड़ी ‘सीएमओ’ के ‘नौ करोड़’ ‘की’ ‘चोरी’!

बस्ती। जिस मंत्री पर 30 लाख लेकर सीएमओ बनाने का आरोप हो, अगर वही मंत्री सीएमओ के नौ करोड़ के घोटाले का खुलासा करता है, तो इसे हम और आप क्या मानेगें और क्या समझेगें? कोई सीएमओ बिलकुल यह न समझे कि उसने 30 लाख दे दिया तो मंत्रीजी उन्हें बख्स देगें, किसी भी सीएमओ को अपने आप को तब तक सुरक्षित महसूस नहीं करना चाहिए, जब तक वह कमाई का हिस्सा मंत्रीजी को पहुंचाते रहेगें। जिस दिन हिस्सा देना बंद हो गया, उस दिन मंत्रीजी जैसा कोई ईमानदार नहीं होगा। वरना षोले के बंसती जैसा हाल हो जाएगा, जिसमें गब्बर सिंह बंसती को कहता है, कि ‘जब तक तेरे पैर चलेगें तब तक तेरे सांस चलेगी’। यह सच मंत्रीजी ने बस्ती के सीएमओ के मामले में साबित कर दिया। मंत्रीजी ने अब तक के सबसे बड़े घोटाले पर से न सिर्फ पर्दा हटाया, बल्कि जांच का आदेष भी दिया, इतना ही नहीं सीएमओ के नौ करोड़ के भुगतान पर भी रोक लगा दिया। कहने का मतलब मंत्रीजी ने सीएमओ पर चैतरफा हमला किया। स्वास्थ्य विभाग में इस तरह का चैतरफा हमला बहुत कम देखने को मिलता है। वह भी डिप्टी सीएम के द्वारा। कहते हैं, कि मंत्रीजी का यह हमला ऐसे ही नहीं हुआ होगा, इसके पीछे कहीं न कहीं सीएमओ की मंत्रीजी के प्रति वफादारी की कमी रही होगी। वरना, कोई मंत्री नहीं चाहता कि उसके विभाग की बदनामी हो। सीएमओ को अभी बहुत कुछ झेलना बाकी है। कहने का मतलब जितना बस्ती से कमाया होगा, उसका मंत्रीजी को एक-एक रुपये का हिसाब-किताब देना पड़ेगा। सीएमओ की चढढी और बनियाइन दोनों जब तक मंत्रीजी उतरवा नहीं लेगें, तब तक कार्रवाई चलती रहेगी। अभी तो सीएमओ को जांच और निलंबन का दंष झेलना बाकी है। सीएमओ साहब निलंबित होने के बाद बहाल भी होना चाहेगें, और यह तब तक बहाल नहीं होगें, जब तक सीएमओ की कुर्सी से अधिक भुगतान नहीं कर देगें। कहने का मतलब ‘चित्त भी मंत्रीजी की और पटट भी मंत्रीजी की’।


जाहिर सी बात हैं, कि जो सीएमओ 30 लाख देगा, उससे हम आप क्या ईमानदारी की उम्मीद कर सकते हैं? यही कारण है, कि कोई भी सीएमओ आते ही भ्रष्टाचार पर हथौड़ा मारने के बजाए अधिक से अधिक भ्रष्टाचार करने लगता हैं, और अगर किसी सीएमओ को भ्रष्ट डिप्टी सीएमओ डा. एके चैधरी और डा. एसबी सिंह एवं आरसीएच प्रभारी डा. बृजेष षुक्ल, स्टोर प्रभारी अजय मिश्र, एनएचएम बाबू स्ंादीप राय एवं स्टेट के प्रेम बहादुर सिंह का उसाथ मिल जाए तो समझो सीएमओ का सीएमओ होना सफल हो गया। फिर सीएमओ को यह नहीं सोचना पड़ेगा कि माल किधर से आएगा। अगर कहीं सीएचसी और पीएचसी के भ्रष्ट एमओआईसी की टीम मिल गई तो सीएचसी और पीएचसी बिकने से कोई रोक नहीं पाएगा। तब यह लोग बिना सामानों की आपूर्ति के आपूर्ति करने का प्रमाण-पत्र दे देगें। जब भी बस्ती से कोई सीएमओ गएं हैं, वह सात पुस्तों का इंतजाम करके गएं। फिर चाहें वह सालों निलंबित ही क्यों न रहें, कोई फर्क नहीं पड़ता। जब तक दोनों डिप्टी सीएमओ, आरसीएच प्रभारी और स्टोर प्रभारी, एनएचएम के बाबू जैसे लोग सीएमओ टीम का हिस्सा रहेगें, तब तक जिला बर्बाद होता रहेगा। भले ही चाहें एमएलसी प्रतिनिधि हरीष सिंह, चंद्रेष प्रताप सिंह, उमेष गोस्वामी जैसे लोग सीएमओ और उनके भ्रष्ट टीम के खिलाफ चिल्लाते रहेगें, जांच कराते रहेगें, फिर भी लूट खसोट बंद नहीं होगा।

अब हम आप को उस घोटाले की साजिष की ओर ले चलते हैं, जो मार्च के अंतिम तीन दिनों में लगभग नौ करोड़ लूटने की योजना सीएमओ की लुटेरे गैंग और पर्चेज कमेटी ने बनाई थी। सच कहा जाए तो इसके लिए विभाग जिम्मेदार हैं, क्यों कि विभाग अगर वित्तीय एवं प्रषासनिक स्वीकृति मार्च के प्रथम सप्ताह में दे देता तो घोटाले की संभावना न के बराबर बनी रहती। जाहिर सी बात जब सीएमओ को जिला महिला अस्पताल और हर्रैया के 100 बेड वाले अस्पताल को उपकरण सहित अन्य सामग्री खरीदने के लिए बजट 27 मार्च यानि मार्च के समाप्त होने के तीन दिन पहले मिलेगा तो बजट का दुरुपयोग होगा ही। हालांकि सीएमओ चाहतें तो बजट को सुरक्षित भी रख सकते हैं, और मार्च के बाद इस्तेमाल कर सकते है, लेकिन ऐसा न तो विभाग चाहता है, और न सीएमओ ही चाहते हैं, क्यों कि किसी को मरीजों की सुविधा से कोई सरोकार नहीं, सरोकार है, तो कमीषन से। अगर सरोकार होता तो यह बजट बहुत पहले आ जाता। विभाग भी अच्छी तरह जानता है, कि कोई भी सीएमओ इतने कम समय में टेंडर की प्रक्रिया को पारदर्षी तरीके से नहीं अपना सकता। उसके बाद सिर्फ फर्जीवाड़ा करने का ही रास्ता बचता है। ऐसे में उन चहेते आपूर्तिकत्र्ताओं की खोज की जाती है, जो अधिक से अधिक कमीषन दे सके। इसी लिए बिना टेंडर, बिना बिल और बिना सामानों की आपूर्ति के करोड़ों का भुगतान हो जाता है। हर्रैया और जिला महिला अस्पताल के मामले में भी इसी तरह की साजिष की गई। सोषल मीडिया के जरिए जब बात डिप्टी सीएम बृजेष पाठक तक पहुंची तो उन्होंने ऐन मौके पर यानि भुगतान होने के एक दिन पहले यानि 27 मार्च 26 को अपर मुख्य सचिव को एक पत्र लिखा जिसमें जिला महिला अस्पताल के उच्चीकरण के नाम पर चार करोड़ 39 लाख से अधिक और हर्रैया के 100 बेड वाले महिला अस्पताल के उच्चीकरण एवं साज-सज्जा और उपकरणों के लिए चार करोड़ 21 लाख से अधिक के भुगतान पर तत्काल रोक लगाने और दोनों मामलों के दोषियों के खिलाफ जांच कर रिपोर्ट तीन दिन में देने का निर्देष दिया। कहने की बात नहीं कि अगर जांच निष्पक्ष हो गई तो किस-किस पर गाज गिरेगी इसका अंदाजा लगाना मुस्किल होगा। बहरहाल, डिप्टी सीएम ने सीएमओ और उनकी टीम एवं आपूर्तिकत्ता के करोड़ों कमाने की मंषा पर पानी फेर दिया, यानि सीएमओ टीम का मार्च खराब हो गया। कहते हैं, कि जब तक स्टोर प्रभारी का बचाव एक राज्यपाल और ब्लाॅक प्रमुख जैसे लोग करते रहेंगे, तब तक मरीजों के दवाओं पर डांका पड़ता रहेगा।

‘25 लाख’ के ‘ठगी’ का ‘षिकार’ हुए ‘कटरा’ के ‘कृष्णा मेडिकल एजेंसी’

बस्ती। जिस हिसाब जिले में धोखाधड़ी और ठगी के षिकार लोग हो रहे हैं, उसे देखते हुए लोगों को आवष्यकता से अधिक सावधान होने की जरुरत है। जरा सा भी असावधानी हुई, समझो जीवनभर की पूजीं हाथ से चली जाएगी। फिर रोने और अफसोस करने के आलावा और कुछ हाथ में नहीं आएगा। कोई ऐसा दिन नहीं जाता, जब धोखाधड़ी और ठगी के दो-चार एफआईआर न होते है। पुलिस और साइबर सेल के सामने इस तरह के इतने सारे मामले सामने आते हैं, कि उसका निस्तारण नहीं हो रहा है। अभी भी हमारा साइबर सेल इतना संसाधानों से मजबूत नहीं हैं, कि एक निष्चित समय में फ्राड करने वालों को दबोच सके। जब तक फ्राड पकड़ में आता है, तब तक पैसों का व्यारा-न्यारा हो जाता है। इस तरह के क्राइम करने वाले इतने चालाक और षातिर होते हैं, कि अगर उन्हें एक-दो घंटा भी मिल गया तो करोड़ों कहां गए साइबर सेल के पकड़ना आसान नहीं होता। घर बैठे करोड़ों कमाने का इससे अधिक आसान तरीका साइबर क्राइम करने वालों को नहीं मिलता, बस उन्हें थोड़ा दिमाग लगाना पड़ता। इन लोगों के ठगी करने के इतने तरीके होते हैं, उतना साइबर सेल के पास पकड़ने के नहीं होते। अब तो ठगी करने वाले व्यपारियों को ही सबसे अधिक अपना निषाना बना रहे हैं, क्यों कि इन्हें अच्छी तरह मालूम हैं, अगर इन्होंने एक कारोबारी को षिकार बना लिया तो समझो 20-25 गांव वालों को बना लिया। गांव वालों को तो हजारों में ठगते हैं, लेकिन कारोबारियों को तो लाखों और कभी-कभी तो करोड़ में भी हाथ साफ कर लेतें है। इन्हें अच्छी तरह मालूम रहता है, कि कारोबारी का लेन-देन सबसे अधिक मार्च के माह में ही होता है। कंपनियों का टारटेट भी मार्च में ही पूरा करना होता है, इसका यह खूब फायदा उठाते हैं, वरना कटरा का एक मेडिकल स्टोर की एजेंसी 25 लाख के ठगी का षिकार न होती। राधेष्याम षुक्ल पुत्र श्रीकांत षुक्ल की ओर से दर्ज कराए मुकदमें में कहा गया कि दिन में बैंक से बैलेन्स मैसेज आया उसके बाद बैंक से दोबारा मैसेज आया कि ड्रावर का सिग्नेचर डिफर है, मैसेज आने के बाद पता चला कि फर्म का चेक स0 175 को किसी अज्ञात व्यक्ति ने फर्म से चोरी कर लिया है, जिसपर कुटरचित तरीके से हस्ताक्षर बनाकर 25 लाख का भुगतान कर लिया। पुलिस और साइबर सेल की ओर से जगह-जगह जागरुकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, और उन्हें बताया जाता कि जब कोई मैसेज आए तो उन्हें क्या करना होता है। यह भी बताया जाता है, कि अधिकतर मैसेज लालच वाला आता है, जिसमें आसानी से ग्रामीण क्षेत्र के लोग फंस जाते है। बहुत कम ऐसे भाग्यषाली होते हैं, जिनका पैसा वापस मिल जाता, खोया या चुराया हुआ मोबाइल तो मिल जाता है, गया हुआ लेकिन लाखों नहीं मिलता। ऐसे मौके पर बैंक वाले भी हाथ खड़ा करन देते थे, पहले एटीएम के जरिए टगी होती थी, लेकिन अब तो मैसेज के जरिए ठगी का कारोबार हो रहा है। 


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