14’ का ‘44’ लाख ‘दिया’, फिर भी ‘सूदखोंरों’ से ‘नहीं’ बची ‘जान’
‘14’ का ‘44’ लाख ‘दिया’, फिर भी ‘सूदखोंरों’ से ‘नहीं’ बची ‘जान’
बस्ती। कहना गलत नहीं होगा, कि सूदखोंरों का अगर कोई ईमान-धरम हैं, तो वह है, पैसा। यह पैसे के लिए इस हद तक जा सकते हैं, कि जिसे कोई सोच भी नहीं सकता, किसी की जान जाने तक का यह कारण बनते जा रहे है। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि आखिर बाबू साहब के कारण ही लोग आत्महत्या क्यों करते जा रहे हैं? आखिर यह इतने बेरम क्यों होते जा रहे है। ब्याज पर पैसा लेने वाले अगर यह जान जाए कि यही पैसा उनके मौत का कारण बनेगा तो षायद ब्याज पर पैसा कभी न ले।
ब्याज पर पैसा देने वालों का कोई वसूल नहीं होता है, वरना अगर कोई 14 लाख के स्थान पर 44 लाख चुकाता है, तो उसे जिंदा रहना चाहिए, यानि तीन साल में तीन सौ फीसद से अधिक ब्याज देकर भी मुंडेरवा के व्यापारी उमेषचंद्र अग्रहरि को अपनी जान सूदखोरों के चलते गवानी पड़ी। मृतक के पुत्र राहुल अग्रहरि की ओर से मुंडेरवा में दर्ज कराए एफआईआर में कहा गया है, कि उसके पिता ने 2023 में रामपुर रेवती निवासी गंगा सिंह उर्फ लोटन सिंह पुत्र चंद्रप्रकाष से कारोबार के लिए 14 लाख ब्याज पर लिया, कितने फीसद ब्याज पर लिया, सह नहीं बताया गया, लिखा कि मेरे पिता समय-समय पर मूलधन और ब्याज का पैसा चुकाते रहें, अब तक लगभग 44 लाख चुकता कर चुके, फिर भी पिता से लगातार पैसे की मांग करते रहें। फोन पर गालीगलौज भी करते रहे। मानसिक प्रताड़ना देते रहे, जान से मारने की धमकी भी देते रहे। धनराषि चुकाने के बाद भी गंगा सिंह के चचेरे भाई अमित सिंह उर्फ बबलू ने मिलकर पिता को निरंतर मानसिक आर्थिक एवं सामाजिक रुप से प्रताड़ित किया। कहा कि दोनों व्यक्तियों के द्वारा पिता अत्यधिक तनाव में रहते थे, इसी तनाव में आकर पिता ने 21 जून 26 को सुबह साढ़े छह बजे आत्महत्या कर लिया। षिकायत करने पर जान से मारने और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी देते थे। कहा कि पिताजी की जेब से दो पत्र मिले जिसमें उन्होंने अपनी मौत के लिए दोनों को जिम्मेदार बताया। बाक्स में
‘क्यों’ नहीं ‘करोड़ों’ बकाए वाले ‘आत्महत्या’ कर ‘रहें’?
इधर जितने भी सूदखोरों के चलते बकाएदार आत्महत्या कर रहे हैं, उनमें लाखों और हजारों वाले ही कर रहे हैं। सवाल उठ रहा है, कि वे लोग क्यों नहीं आत्महत्या कर रहे हैं, जो करोड़ों के बकाएदार है? क्या इन्हें समाज और इज्जत की कोई चिंता नही है? क्या इन्हें इस बात की भी चिंता नहीं हैं, कि इन्हें उधार भी चुकता करना है? क्या लाखों और हजारों वाले बकाएदारों को ही चिंता है? षहर में एक ऐसा परिवार भी है, जिनके उपर न जाने कितने का कर्ज हैं, कर्ज अदा न कर पाने के कारण कई बार लोगों को सड़क पर भी उतरना पड़ा, धरने पर भी बैठना पड़ा, लाइव पर आकर उधार का पैसा मांगना पड़ा, न्यायालय तक लोगों का जाना पड़ा, न्यायालय को एनबीडब्लू तक जारी करना पड़ा, फिर भी परिवार के सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। परिवार को जरा भी इस बात का एहसास नहीं हुआ, कि लोग उनके बारे में क्या-क्या कह रहे हंै। जो लोग कोर्ट गए हैं, या फिर नहीं गएं हैं, उन लोगों का कहना है, कि अगर इस परिवार को जरा भी इज्जत का डर होता तो कब का बकाया चुकता कर दिया होता, ऐसा भी नहीं कि परिवार के पास धन और अचल संपत्ति की कोई कमी हो, कमी है, तो सिर्फ नीयत साफ न होने की। कहा भी जाता है, कि जिस व्यक्ति का नीयत खराब होता है, उसके लिए मान-सम्मान और इज्जत जाने का कोई डर नहीं रहता है। ऐसे लोग भी है, जिन्हें हजार रुपया भी चुकता न कर पाने के कारण रातभर नींद नहीं आती। वहीं कुछ लोग ऐसे भी जो करोड़ों का बकाएदार हैं, फिर भी वह आराम की नींद ही नहीं सोते बल्कि ऐसो आराम की जिंदगी भी जीते है। हैरानी की बात यह है, कि ऐसे लोगों को करोड़ों उधार देने को भी लोग यह जानकर तैयार हो जाते हैं, कि आदमी ठीक नहीं हैं, या फिर मार्केट में रिकार्ड खराब है। बैंक वाले भी ऐसे लोगों का स्वागत करते है। लोग एक दूसरे से पूछते हैं, कि ऐसे लोगों को नींद कैसे आती होगी? कहा भी जाता है, कि जिस व्यक्ति ने विष्वास खो दिया, समझो उसने दौलत खो दिया। विष्वास ही एक ऐसी चीज है, जो कुछ भी करा सकती है, और कर सकती। अक्सर लोगों को कहते हुए सुना जाता है, कि भलां व्यक्ति पर कभी विष्वास मत करना, नहीं तो धोखा मिलेगा। अब फिर सवाल उठ रहा है, कि जब सभी लोगों को मालूम हैं, कि फंला परिवार विष्वास के लायक नहीं हैं, तो फिर क्यों विष्वास करके लाखों नहीं करोड़ों दे देतें है। आखिर वह किस विष्वास पर करोड़ों देते हैं, इसका सीधा सा जबाव होता है, करोड़ों देने वाले को वापस लेना भी आता है, सूद समेत लेना आता हैं, और लेते भी है, नहीं देने पर कभी स्कूल लिखवा लेगें तो कभी जमीन अपने नाम करवा लेगें।
‘जागो’ प्रषासन ‘जागो’ नहीं तो ‘लखनउ’ से ‘बड़ी’ घटना हो ‘जाएगी’
बस्ती। जिले के लोग और मीडिया प्रषासन से बार-बार जागने को कह रहा है, लेकिन प्रषासन है, कि जागने का नाम ही नहीं ले रहा, लखनउ अग्निकांड का हवाला देकर कहा जा रहा है, कि अब तो जाग जाइए, नहीं तो जिले में लखनउ से भी बड़ी घटना हो सकती है, क्यों कि मैरिज हाल और होटलों में सुरक्षा के नाम पर खिलवाड़ किया जा रहा है? हर पल बारातियों और होटलों में रहने वालों को यह डर सताता रहता है, कि कब उन्हें आग की लपटों का सामना करना पड़े। षासन और प्रषासन वाले तभी जागते हैं, जब कोई बड़ी दुर्घटना होती है। उससे पहले मीडिया और जनता कितना भी चिल्लाए लेकिन इन लोगों के कान में जूं तक नहीं रेगंता। सालों से मीडिया कहती और लिखती आ रही कि साहब उन मैरिज हाल और होटल की जांच करवा लीजिए, जहां पर फायर बिग्रेड की गाड़ी तक नहीं पहुंच सकती, जिले में एक फीसद भी मैरिज हाल और होटल मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं, फिर भी यह धड़ल्ले से चल रहे है। षहर में ही अनगिनत ऐसे मैरिज हाल और होटल हैं, जो सुरक्षा के मानकों की धज्जियां उड़ा रहें हैं। किसी दिन जब लखनउ जैसी बड़ी घटना हो जाएगी, तो आनन-फानन में गलती निकाली जाएगी। तब होटल एवं मैरिज हाल के मालिक को हिरासत में लिया जाएगा। हैरानी होती है, कि इतने सालों में भी प्रषासन सराय एक्ट के तहत न तो मैरिज हाल और न होटल का ही पूरी तरह पंजीकरण करा पाया। बार-बार यह कहा जा रहा है, कि प्रषासन उस समय कोई जबाव नहीं दे पाएगा, जब कोई घटना हो जाएगी। कहा भी जाता है, कि जब तक सराय एक्ट के तहत मैरिज हाल और होटल का पंजीयन नहीं हो जाता, तब तक असुरक्षा की भावना रहेगी।
फारमेल्टी निभाने के लिए सराय एक्ट के तहत एडीएम कार्यालय से पंजीकरण कराने के लिए नोटिस तो जारी कर दिया जाता है, लेकिन यह नहीं देखा जाता कि कितने लोगों ने आवेदन किया और कितने का पंजीकरण हुआ। पिछले कई सालों से नोटिस भेजने का खेल देखा जा रहा है। फायर बिग्रेड से लेकर एडीएम कार्यालय तक पंजीकरण के नाम पर मैरिज हाल और होटल वालों का षोषण कर रहें हैं। जो पंजीयन कराना भी चाहते, उनका भी नहीं कर रहें। मैरिज हाल और होटलों का संचालन करने वालों को यह समझना होगा, कि सबसे पहले उन्हीं के खिलाफ प्रषासन मुकदमा दर्ज कराएगा और जेल भेजेगा। इस लिए जिन लोगों का पंजीकरण नहीं हैं, उन सभी को अगर जेल जाने से बचना है, तो प्रषासन पर पंजीकरण करने का दबाव बनाना होगा, क्यों कि एडीएम कार्यालय पंजीकरण न करने का आरोप बार-बार लग रहा है। सच जो यह है, कि किसी को भी कोई परवाह नहीं चाहें कोई जिए या मरे, कोई मतलब नहीं, अगर मतलब होता तो सबसे अधिक संवेदनषील मैरिज हाल और होटल जहां पर हूजूम रहता है, में सुरक्षा की व्यवस्था कराते, और यह तभी होगा जब सराय एक्ट के तहत पंजीकरण होगा, और पंजीकरण तभी होगा, जब एडीएम और उनका कार्यालय चाहेगा। एडीएम कार्यालय को तो सिर्फ नोटिस के नाम पर दोहन करना आता है, पंजीकरण करना नहीं, बड़ेबन के पास तीन ऐसे मैरिज हाल है, जिनकी दूरी एक दूसरे मैरिज हाल से मात्र 10 फीटर भी नहीं, और इन तीनों मैरिज हाल तक जाने के लिए 15 फीट का भी रास्ता नहीं हैं, अब जरा अंदाजा लगाइए कि एक ही साथ तीन बारात की अगुवानी होती है, और अगर कहीं पटाखा जलाते समय कोई आगजनी की घटना हो गई तो कोई भाग भी नहीं पाएगा। यह तीनों मैरिज हाल बीडीए के मानक के विपरीत है। इन तीनों मैरिज हाल की फोटो भी कई डीएम और एडीएम मीडिया दिखा चुकी है, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। बीडीए वाले अलग से पैसा लेकर किनारे हो गए, फायर बिग्रेड वालों ने अलग से अपनी जेबें भरी, रही बात एडीएम कार्यालय की तो सबका केंद्र यही है। यहीं पर पंजीकरण होता और यहीं पर सौदा भी होता है। यह सौदेबाजी इंसानों की जान की कीमत पर होती है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि जितने भी मानक विहीन मैरिज हाल और होटल का संचालन हो रहा है, उन लोगों के खिलाफ प्रषासन और फायर बिग्रेड ने आज तक क्या कार्रवाई की, अगर की तो क्यों नहीं उसे सार्वजनिक किया? अगर नहीं की तो उसकी जबावदेही तय होना चाहिए। लगभग छह माह पहले सीओ सिटी ने आधा दर्जन से अधिक बदनाम होटलों पर छापा मारा, लगभग सभी में गैरकानूनी कार्य करते मिला, कार्रवाई करने के लिए रिपोर्ट डीएम को की गई, डीएम ने एडीएम को थमा दिया, जानकर हैरानी होगी कि आज तक उन बदनाम होटलों के संचालकों के खिलाफ न तो कोई कार्रवाई हुई, और न एक भी होटल को सील किया गया, नतीजा पहले से अधिक बदनाम होटलों में गैरकानूनी काम होने लगें। जानकर हैरानी होगी कि बलात्कार की षिकार लड़कियों ने कोर्ट के सामने उन होटलों का नाम बताया, जहां पर उनसे गलत काम करवाया जाता है, इनमें सबसे अधिक बयान रोडवेज स्थिति एक नेताजी के होटल का भी नाम है। अब आप समझ गए कि जब प्रषासन ही नहीं चाहेगा तो कैसे गैरकानूनी काम रुकेगा? और कैसे मैरिज हाल एवं होटलों का पंजीकरण होगा? प्रषासन के सामने अभी भी अपंजीकृत मैरिज हाल और होटलों का पंजीकरण कराने का समय है। हो सकता है, कि प्रषासन के प्रयास से कईयों की जान बच जाए। कहने का मतलब आम जन की जान बचाना प्रषासन और फायर बिग्रेड के हाथ में है। भगवान इन दोनों को जितना जल्दी हो सके सदबुद्वि दे। इसी में हम सब की भलाई है।
‘देष’ की शिक्षा ‘व्यवस्था’ बना वसूली ‘तन्त्र’ःपुनीत पाठक
बस्ती। कांग्रेस कार्यालय पर पत्रकारों से वार्ता के दौरान प्रदेश प्रवक्ता पुनीत पाठक ने कहा कि पेपरलीक मामलों में केन्द्र सरकार की चुप्पी दुर्भाग्यपूर्ण है। कुछ छात्रों की आत्महत्या और शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के त्याग पत्र की मांग को अनसुना कर देना चिन्ताजनक है। कहा कि कांग्रेस लगातार शिक्षा के सवाल को लेकर संघर्षरत है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पेपरलीक के मामले को प्रमुखता से उठाया, छात्रों का हौसला बढाया और आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिजनों से मिले किन्तुं परीक्षा में सुझाव देने वाले प्रधानमंत्री खामोश हैं और अनगिनत खामियों के बावजूद केन्द्रीय शिक्षा मंत्री द्वारा त्याग पत्र न दिया जाना लोकतांत्रिक नैतिकता के विरूद्ध है। पत्रकारों के प्रश्नों का उत्तर देते हुये पुनीत पाठक ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली नीट परीक्षा के अलावा सीबीएससी की उत्तर पुस्तिका मूल्यांकन में गड़बड़ियों के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में चाहे लेखपाल भर्ती परीक्षा हो, यूपीएसआई, पुलिस सिपाही भर्ती परीक्षा हो, आरओ-एआरओ भर्ती परीक्षा हो. एसएससी जीडी भर्ती परीक्षा हो, सहायक प्रोफेसर भर्ती परीक्षा हो, ऐसी तमाम प्रतियोगी परीक्षाएं पेपर लीक के माध्यम से भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयीं। हाल ही में हुई नीट परीक्षा के पेपर लीक के बाद कांग्रेस पार्टी द्वारा आवाज उठाने एवं सड़कों पर संघर्ष करने के चलते सरकार को पुनः परीक्षा कराने का निर्णय लेना पड़ा।
कांग्रेस जिलाध्यक्ष विश्वनाथ चैधरी ने कहा कि नीट पेपर लीक से पैदा हुए मानसिक तनाव के कारण देश के विभिन्न राज्यों से अब तक 12 छात्र अपनी जान गंवा चुके हैं। कांग्रेस पार्टी इसे आत्महत्या नहीं बल्कि सरकार उत्प्रेरित हत्या मानती है। राजस्थान में प्रदीप मेघवाल, दिल्ली में अंशिका पाण्डेय, उ०प्र० में रितिक मिश्रा व शिवानी यादव, गोवा में सिद्धार्थ हेगडे, कर्नाटक में भाग्यश्री, मध्य प्रदेश में आकांक्षा चतुर्वेदी, राजस्थान में उमेश माली और रेणु मीणा, उत्तराखण्ड में रिया कुमारी थापा, तमिलनाडु में अनुकीर्तना, गुजरात में कहान पटेल ने मानसिक तनाव में अपनी जान दे दी।दुर्भाग्यपूर्ण है कि परीक्षा के प्रश्नपत्र छपने के बाद बिचैलियों के जरिए परीक्षा से पहले बड़ी संख्या में प्रश्नपत्र बेंचे जाते हैं। जांच में कुछ छात्रों ने बताया है कि उन्होने लीक पेपर के लिए 25हजार से 40 लाख रूपये तक चुकाये। पिछले 12 वर्षों में 23 राष्ट्रीय परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं यानी लगभग हर वर्ष दो पेपर लीक हुए हैं। अब तक देश भर में लगभग 90 से अधिक पेपर लीक हो चुके हैं लेकिन दोषियों को सजा मिलने के मामले न के बराबर है। कांग्रेस इन सवालों को लेकर लगातार संघर्ष कर रही है।
कांग्रेस नेता वृजेश आर्य, शौकत अली नन्हू, डा. वाहिद अली सिद्दीकी , संदीप श्रीवास्तव ने कहा कि भारत की शिक्षा व्यवस्था आज सिर्फ एक वसूली तन्त्र बनकर रह गया है। इन्हीं पीड़ाओं को लेकर राहुल गांधी पूरे देश में छात्रों की गूंज कार्यकम अभियान के माध्यम से निष्पक्ष और सस्ती-बेहतर शिक्षा प्रणाली की आवाज बनेंगे। छात्रों की गूंज अभियान पूरे देश में कांग्रेस पार्टी के अग्रिम संगठन एनएसयूआई और युवा और युवा कांग्रेस के माध्यम से चलाया जाएगा। प्रेस वार्ता में मुख्य रूप से साधू शरन आर्य, अलीम अख्तर, सुधीर यादव, राहुल चैधरी, प्रशान्त पाठक, संजय कुमार, अवनीश पाण्डेय आदि उपस्थित रहे।
देख लीजिए ‘50’ फीसद ‘कमीषन’ वाले ‘गेट’ का ‘हाल’!
बस्ती। अगर किसी को 50 फीसद कमीषन वाले गेट का हाल देखना हो तो वह कंपनीबाग के पास पीडब्लूडी और माननीयों की चहेती कार्यदाई संस्था और विधायक दूधराम के विधायक निधि से बनाए कलवारी के पास के गेट को देख सकते है। जिस पीडब्लूडी के मानक को पूरा जिला मानकर निर्माण कार्य करता है, अगर उसी विभाग का गेट दो माह में ही जमींदोज हो जाए तो इसे कमीषन का खेल ही माना जाएगा। जो लाखों रुपये का गेट हवा का झांेका भी बर्दास्त नहीं कर पाए, उसे आप क्या कहेगें, यह दोनों गेट जान लेवा भी हो सकता है, घायल तो हुएं हैं, अभी तक प्रषासन कार्यदाई संस्था पीडब्लूडी और सिडको के खिलाफ एफआईआर तक नहीं दर्ज कराया, और न विधायकजी ने ही कार्यदाई संस्था की जांच कराने को लिखा। जिस गेट का फाउडेषन ही कमजोर हो, वह तो भरभराकर गिरेगा ही। पता नहीं क्यों प्रषासन जब भी कार्यदाई संस्था सिडको की बात आती है, तो न जाने क्यों असवेंदनषील हो जाती है, इस कार्यदाई संस्था के खिलाफ प्रषासन ने हरीष द्विवेदी के सांसद निधि से निर्माणधीन भानपुर के मिनी इंडोर कस दज्जा गिर गया था, जिसमें एक मजदूर की जान चली गई थी, तब भी एफआईआर नहीं दर्ज कराया, तो गेट गिरने में क्या दर्ज कराएगा।
रही बात माननीयों की तो तो इनमें भी इतना भी षर्म नहीं बचा कि यह उनके निधि का दुरुपयोग करने वाली कार्यदाई संस्था सिडको के खिलाफ लिख सके। ऐसा लगता है, कि मानो कार्यदाई संस्था और माननीयों के बीच कोई गुप्त समझौता हो, तभी तो आजतक एक भी माननीय ने इस कार्य दाई संस्था के खिलाफ न तो जांच के लिए लिखा और न एफआईआर दर्ज कराने को। यह लोग एक बाबू के खिलाफ पत्र लिख देगें, लेकिन निधि का दुरुपयोग करने वाले सिडको के खिलाफ कुछ भी नहीं लिखेगें, रही बात प्रषासन की तो इनकी भी हालत माननीयों के सामने भीखी बिल्ली जैसी हो जाती है। जब कि कमिष्नर, डीएम और सीडीओ को कार्यदाई संस्था का चयन करने का पूरा अधिकार है, लेकिन यह लोग भी अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं करते, और जिसे माननीय कहते हैं, उसे कार्यदाई संस्था बना देते है। बतादें कि माननीयों का कार्य सिर्फ कार्यो का प्रस्ताव भर ही देना होता है, कार्यदाई संस्था का निर्धारण करना नहीं। माननीयों को भी सिडको जैसी कार्यदाई संस्था नहीं मिल सकती, क्यों कि इनके अधिकारी सुबह की चाय माननीयों के आवास पर ही पीते हैं, और वहीं पर उन्हें कमीषन का लिफाफा देते है। माननीयों को ऐसे वफादार कार्यदाई संस्था की जरुरत भी है, जो उनके ठेकेदारों को बिना कार्य कराए भुगतान करे। कहा जाता है, कि जब तक माननीय और सिडको का गठजोड़ रहेगा, तब तक कोई भी निधि सुरक्षित नहीं रहेगा। माननीयों के कमीषन का हालत यह हैं, कि यी लोग ठेकेदारों से जीएसटी में भी कमीषन मांगते है। जाहिर सी बात है, जब ठेकेदार जीएसटी में कमीषन देगा तो वह जीएसटी की चोरी भी करेगा। विधायकजी लोगों का भला होता रहे, भले ही चाहे जीएसटी की चोरी होती रहे।
‘बनकटी’ का पशु ‘चिकित्सालय’ ही ‘बीमार’ चल ‘रहा’!
बनकटी। बस्ती। मुंडेरवा एवं बनकटी क्षेत्र के राजकीय पशु चिकित्सालय इस समय गंभीर प्रशासनिक और व्यावहारिक संकट से गुजर रहे हैं। एक ओर क्षेत्र में पशुओं में तेजी से फैल रही बीमारियों ने पशुपालकों की चिंता बढ़ा दी है, वहीं दूसरी ओर स्टाफ की कमी और हालिया प्रशासनिक बदलावों ने पशु चिकित्सा व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। जानकारी के अनुसार वर्षों से मुंडेरवा और बनकटी दोनों पशु चिकित्सालयों की जिम्मेदारी संभाल रहे पशु चिकित्साधिकारी डॉ. रविंद्र कुमार यादव ने अपने कार्यकाल में दोनों संस्थानों की व्यवस्था को सुचारु एवं सुदृढ़ बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्थानीय लोगों के अनुसार उनके कार्यकाल में उपचार व्यवस्था, पशु सेवाएं और आपातकालीन सहयोग अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से संचालित होते रहे। हालांकि उनके स्थानांतरण के बाद क्षेत्र में पशु चिकित्सा सेवाओं के प्रभावित होने की आशंका गहरा गई है। वहीं 30 जून को मुंडेरवा पशु चिकित्सालय के अनुचर के सेवानिवृत्त होने के बाद अस्पताल संचालन में और भी अधिक अनिश्चितता उत्पन्न हो गई है। इसके चलते यह आशंका भी जताई जा रही है कि आने वाले समय में मुंडेरवा राजकीय पशु चिकित्सालय में ताला लगने जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिससे स्थानीय पशुपालकों में गहरी चिंता व्याप्त है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्तमान समय में क्षेत्र में पशुओं में विभिन्न प्रकार की बीमारियां तेजी से फैल रही हैं, जिससे दूध उत्पादन और पशुधन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे में पशु चिकित्सा सेवाओं का निर्बाध रूप से उपलब्ध रहना अत्यंत आवश्यक है। पशुपालकों ने मांग की है कि जब तक नए पशु चिकित्साधिकारी एवं आवश्यक स्टाफ की तैनाती नहीं हो जाती, तब तक वर्तमान व्यवस्था को यथावत रखा जाए, ताकि पशु उपचार में कोई बाधा उत्पन्न न हो। ग्रामीणों ने प्रशासन से यह भी अपील की है कि बढ़ती पशु बीमारियों को देखते हुए तत्काल विशेष पशु चिकित्सा शिविर लगाए जाएं, दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए तथ ग्रामीण स्तर पर निगरानी व्यवस्था को सक्रिय किया जाए। किसानों का स्पष्ट कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो वे आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे। उनका मानना है कि पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और इसकी अनदेखी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है। अब जिम्मेदार विभाग पर यह दायित्व है कि वह इस व्यवस्था को स्थिर रखते हुए किसानोंऔर पशुपालकों को तत्काल राहत प्रदान करे।




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