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Showing posts from February, 2026

बीएसए’ और ‘बाबूओं’ की ‘नजर’ में ‘षिक्षकों’ के ‘जान’ की ‘कोई’ कीमत ‘नहीं’?

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  ‘बीएसए’ और ‘बाबूओं’ की ‘नजर’ में ‘शिक्षकों’ के ‘जान’ की ‘कोई’ कीमत ‘नहीं’? बस्ती। चाहें देवरिया के बीएसए और बाबू हों, चाहें बस्ती के बीएसए और बाबू हों या फिर चाहें अन्य जिलों के बीएसए और बाबू हांे, सबों की नजर में पैसा ही सब कुछ हो गया। इन लोगों की नजर में षिक्षकों के जान की कोई कीमत नहीं। लगता है, कि इन लोगों के भीतर से संवेदना पूरी तरह मर चुकी है। मानो यह अपने आप को सामाजिक प्राणी मानते ही नहीं। पैसे ने इन्हें इतना अंधा कर दिया हैं, कि कोई जिए या मरे, इनपर कोई फर्क नहीं पड़ता, भले ही चाहें इनके उत्पीड़न से कोई षिक्षक अपनी जान दे दे या फिर सदमे से उसकी जान चली जाए। यह लोग पैसे के लिए इतना नीचे गिर चुके हैं, कि इनकी नजर में जिंदा इंसान की कोई अहमियत ही नहीं रह गई। इनके लिए पैसा ही सबकुछ है। लगता है, मानो, मरने के बाद यह लोग पैसा साथ में लेकर जाएगे। इन्हें पैसा कमाने के आलावा और कुछ नहीं आता, इन्हें उस षिक्षा की गुणवत्ता से भी कोई लेना देना नहीं, जिससे समाज में इनकी पहचान और रुतबा बना हुआ है, और जिसके चलते यह दिन-रात भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं। यह लोग जब घर से कार्यालय की ओर निकल...

योगीजी’ बताइए, ‘भैंस’ और ‘केले’ के पेड़ की ‘चोरी’ का ‘केस’ दर्ज हो सकता, तो ‘रेप’ का क्यों ‘नहीं’?

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  ‘योगीजी’ बताइए, ‘भैंस’ और ‘केले’ के पेड़ की ‘चोरी’ का ‘केस’ दर्ज हो सकता, तो ‘रेप’ का क्यों ‘नहीं’? -2027 में अगर भाजपा की सरकार नहीं बनती तो इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार तहसीलों और थानों को माना जाएगा -इन दोनों विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार और जनविरोधी कार्य को देखते हुए लगता ही नहीं कि इन विभागों के मुखिया डीएम और एसपी -दोनों विभागों के मुखिया डेली कार्यो की समीक्षा करते, लेकिन व्याप्त भ्रष्टाचार की समीक्षा न जाने क्यों नहीं करते? बस्ती। जिले की जनता सूबे के मुखिया से सवाल कर रही है, कि बताइए ‘भैंस’ और ‘केले’ के एक पेड़ की चोरी का मुकदमा जरुरी या फिर रेप का। यह भी सवाल कर रही है, जब भैंस की चोरी का मुकदमा दर्ज हो सकता है, तो रेप का क्यों नहीं? षायद इसका जबाव योगीजी के पास नहीं, अगर होता तो भैंस की चोरी का मुकदमा नहीं बल्कि रेप का दर्ज होता। कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार के मामले में योगी की सरकार जनता के सवालों से पूरी तरह घिरी हुई है। अब तो इनके जनप्रतिनिधि ही सदन में भ्रष्टाचार की पोल खोलने लगें है। हालत यह हो गई कि अब सरकार का कोई प्रतिनिधि जनता और मीडिया के सवालों का सामना तक...

सुलग’ रही ‘जातिवाद’ की ‘चिंगारी’, नहीं ‘बुझी’ तो ‘शोला’ बन ‘जाएगा’!

‘सुलग’ रही ‘जातिवाद’ की ‘चिंगारी’, नहीं ‘बुझी’ तो ‘शोला’ बन ‘जाएगा’! -यह एक ऐसी ‘चिंगारी’ है, जब आग की तरह ‘फैलेगा’ तो कोई नहीं बचेगा, ऐसी नफरत की आंधी चलेगी कि सब कुछ उड़ाकर ले जाएगा, इससे बचकर रहिए -वैसे भी देष जाति की आग में जलने के कगार पर पहुंच चुका, भाजपा ने यूजीसी लाकर जाति के आग में घी का काम किया, -अगर इसी तरह जाति की चिंगारी सुलगती रही तो मेरा भारत महान के बजाए लोग मेरी जाति महान का नारा देने लगेगें -पार्टियां जो जाति का खेल खेल रही है,, उससे उन्हें सत्ता तो मिल सकता, लेकिन समाज बंटकर रह जाएगा,तब हर मोहल्ले में पार्टियां हो जाएगी और घर-घर जातिवाद हो जाएगा -अब तो धीरे-धीरे लोगों की पहचान उनके कर्म से नहीं बल्कि जाति से होने लगी है। यह जाति का खेल समाज के ‘स्लो प्वाइजन’ की तरह भविष्य में साबित होगा। बस्ती। राजनीतिक पार्टियां अपनी नाकामी को छिपाने और सत्ता हासिल करने के लिए जो जातिवाद का खेल-खेल रही है, उससे सत्ता तो मिल सकता है, लेकिन देष और समाज जातिवाद में बंट जाएगा। आपसी भाईचारा समाप्त हो जाएगा, और हर तरफ नफरत ही नफरत दिखाई देगा। तब हर मोहल्ले में पार्टियां हो जाएगी और घर-घर ...

सीएमओ’ ने की ‘उमेश गोस्वामी’ को ‘आगरा’ भेजने की ‘तैयारी’!

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 ‘सीएमओ’ ने की ‘उमेश गोस्वामी’ को ‘आगरा’ भेजने की ‘तैयारी’! -सीएमओ और उनकी टीम के ‘भ्रष्टाचार’ का ‘उजागर’ करने वाले ‘उमेष गोस्वामी’ को ‘सीएमओ’ ने ‘पागल’ घोषित किया, डीएम को लिखकर दिया कि इनकी मानसिक स्थित ठीक नहीं जिसके चलते यह निराधार षिकायत करते रहते, इस लिए इनकी षिकायत पर कोई ध्यान न दिया जाए -अगर सीएमओ और उनकी टीम की नजर में षिकायतकर्त्ता उमेष गोस्वामी पागल है, तो फिर एमएलसी प्रतिनिधि हरीष सिंह और चंद्रेष प्रताप सिंह भी पागल की श्रेणी में आने चाहिए, क्यों कि इन दोनों ने सर्वाधिक सीएमओ और उनकी टीम के भ्रष्टाचार की षिकायत बस्ती से लेकर लखनउ तक किया -सीएमओ डा. राजीव निगम को लाला लिखना भी इनके टीम को नागवार लगा, जिसे उमेष गोस्वामी ने स्पष्ट किया, कि निगम, एससी भी होते हैं, और लाला भी बस्ती। सीएमओ और उनकी टीम के भ्रष्टाचार पर निरंतर हमला करने वाले भाकियू के उपाध्यक्ष उमेष गोस्वामी को जब यह लोग नहीं खरीद पाए तो उसे चुप कराने के लिए पूरी टीम ने मिलकर बिना मेडिकल जांच के पागल घोषित कर दिया। अब उमेष को यह लोग मिलकर पागलखाना भेजने की तैयारी कर रहे है। इससे पहले आरटीआई कार्यकर्त्ता सुदृष्...

सब ‘गोलमाल’ है, ‘भाई’ सब ‘गोलमाल’

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 सब ‘गोलमाल’ है, ‘भाई’ सब ‘गोलमाल’ -कप्तानगंज के पटखौली के प्रधान मनोज कुमार दूबे, सचिव उदितांषु षुक्ल, पंचायत सेवक सतीष कुमार दूबे एवं रोजगार सेवक राम सरन ने मिलकर किया लाखों का घोटाला, लेकिन न प्रधानी गई और न किसी के खिलाफ दर्ज हुआ मुकदमा बस्ती। योगीराज में किसी भी भ्रष्टाचारी के खिलाफ षिकायतकर्त्ताओं के लिए कार्रवाई करवाना आसान नहीं होता। कार्रवाई न होने से भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लग रहा है। पहले तो कोई गांव वाला प्रधान और सचिव की षिकायत करने को यह कहकर तैयार नहीं होता कि कौन जाए गांव में रहकर प्रधान से दुष्मनी मोल लेना? लोगों के मन में यह न जाने क्यों घर कर गई है, कि योगी के राज में कार्रवाई नहीं होगी। इसके बाद भी अगर किसी ने हिम्मत दिखाया तो उसे अनेक धमकियों का सामना करना पड़ता है। षिकायत वापस लेने का दबाव बनाया जाता है, लालच तक दिए जाते हैं, कुछ लोग तो लालच में आ भी जाते हैं, और जो नहीं आते उन्हें अनेक समस्याओं से गुजरना पड़ता है। कुछ लोग जब गांव से लेकर कमिष्नर, डीएम, सीडीओ और डीपीआरओ के यहां चक्कर लगा-लगा कर थक जाते हैं, तो यह कहकर घर बैठ जाते कि लूटने दीजिए, जितना लूटना चाहे...

सिडको’ के ‘भ्रष्टाचारी’ एक्सइएन को मिला ‘पुरस्कार’

  ‘सिडको’ के ‘भ्रष्टाचारी’ एक्सइएन को मिला ‘पुरस्कार’ बस्ती। जनप्रतिनिधियों के निधियों को खरीदने और बेचने वाली चर्चित निर्माण कार्यदाई सिडको का नाम आते ही लोगों के जेहन में जिले को लूटने वाली कार्यदाई संस्था का नाम सामने आ जाता है। माननीयों की चहेती होने के नाते आजतक इसके एक्सईएन, एई और जेई के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। बस्ती मंडल के अखिलेख सिंह प्रदेष के पहले ऐसे कमिष्नर होंगें जिनके डीओ लिखने से तत्कालीन एक्सईएन आषुतोष द्विवेदी को उनके मूल विभाग यूपीआरएनएसएस यानि पैक्सपेड को वापस करना पड़ा। अब इन्हें फिर से वापस सिडको में सारे नियम कानून तोड़कर प्रतिनियुक्ति पर लाए जाने की खबर सामने आ रही है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि जिस एक्सईएन के बारे में कमिष्नर यह लिख चुके हों कि यह स्वेच्छाचारी हैं, यह विभागीय कार्यो में कोई रुचि नहीं लेते, यह कार्यो के प्रति उदासीनता एवं लापरवाही के प्रतीक है। यह भी लिखा कि इनकी संबद्वता समाप्त होने के बाद भी इन्हें इनके मूल विभाग में अभी तक नहीं भेजा गया। लिखा कि इनका कार्य व्यवहार भी पूरे मंडल में संतोषजनक नहीं हैं। प्रमुख सचिव समाज कल्याण को स्पष्ट...

भाजपाईयों’ का तो ‘बैंक बैलेंस’ बढ़ रहा, ‘पार्टी’ का ‘वोट बैंक’ कम हो ‘रहा’!

  ‘भाजपाईयों’ का तो ‘बैंक बैलेंस’ बढ़ रहा, ‘पार्टी’ का ‘वोट बैंक’ कम हो ‘रहा’! बस्ती। भाजपा के भीतर 2027 को लेकर खूब आत्म मंथन चल रहा है। परम्परागत वोट बचाने को लेकर पार्टी के भीतर जिस तरह मंथन हो रहा है, उससे बता चलता है, कि पार्टी के लिए 2027 जीतना आसान नहीं होगा, अगर पार्टी परम्परागत वोट बचाने में नाकाम रही तो उसके हाथ से यूपी निकल भी सकता है। परम्परागत वोट बचाना पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। पार्टी 2027 को लेकर काफी चिंचित नजर आ रही है। कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा का जिन-जिन लोगों ने उपयोग/दुरुपयोग किया, चाहें वह जनप्रतिनिधि रहें हो या फिर चाहें वह पार्टी पदाधिकारी रहें हों, सबने अपने-अपने बैंक बैलेंस को बढ़ाया, बैंक बैलेस बढ़ाने के चक्कर में पार्टी का बैलेंस ‘वोट’ डगमगा गया। पार्टी का दुभार्ग्य यह है, कि हारे या जीते प्रतिनिधियों में सबसे बड़ी समस्या आत्म अहंकार से ग्रसित होना है। जो यह सोच रहे हैं, और कर रहें, उसे यह सही मान रहें है। पार्टी लाइन से इन्हें कोई लेना देना नहीं। अब तो एक चलन और चल गया, यह कथित पार्टी खेवनहार, हर दो माह बाद कभी योगी तो कभी अमित षाह तो कभी ...