बीएसए’ और ‘बाबूओं’ की ‘नजर’ में ‘षिक्षकों’ के ‘जान’ की ‘कोई’ कीमत ‘नहीं’?
‘बीएसए’ और ‘बाबूओं’ की ‘नजर’ में ‘शिक्षकों’ के ‘जान’ की ‘कोई’ कीमत ‘नहीं’? बस्ती। चाहें देवरिया के बीएसए और बाबू हों, चाहें बस्ती के बीएसए और बाबू हों या फिर चाहें अन्य जिलों के बीएसए और बाबू हांे, सबों की नजर में पैसा ही सब कुछ हो गया। इन लोगों की नजर में षिक्षकों के जान की कोई कीमत नहीं। लगता है, कि इन लोगों के भीतर से संवेदना पूरी तरह मर चुकी है। मानो यह अपने आप को सामाजिक प्राणी मानते ही नहीं। पैसे ने इन्हें इतना अंधा कर दिया हैं, कि कोई जिए या मरे, इनपर कोई फर्क नहीं पड़ता, भले ही चाहें इनके उत्पीड़न से कोई षिक्षक अपनी जान दे दे या फिर सदमे से उसकी जान चली जाए। यह लोग पैसे के लिए इतना नीचे गिर चुके हैं, कि इनकी नजर में जिंदा इंसान की कोई अहमियत ही नहीं रह गई। इनके लिए पैसा ही सबकुछ है। लगता है, मानो, मरने के बाद यह लोग पैसा साथ में लेकर जाएगे। इन्हें पैसा कमाने के आलावा और कुछ नहीं आता, इन्हें उस षिक्षा की गुणवत्ता से भी कोई लेना देना नहीं, जिससे समाज में इनकी पहचान और रुतबा बना हुआ है, और जिसके चलते यह दिन-रात भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं। यह लोग जब घर से कार्यालय की ओर निकल...